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प्राचीन गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली के अभिनव प्रयोगकर्ता : रवीन्द्रनाथ ठाकुर
May 1, 2017 • Dr. Rajkumar Upadhyay 'Mani'

विश्वविख्यात कवि, साहित्यकार, उपन्यासकार, चित्रकार, पत्रकार, नाटककार, कथाकार, अभिनेता, अध्यापक, दार्शनिक, तत्त्वज्ञानी, संगीतज्ञ, दार्शनिक, शिक्षाशास्त्री गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर (1861-1941) हमारे देश के एक ऐसे गौरवशाली व्यक्तित्व हैं, जिन्हें एशिया के पहले नोबल पुरस्कार प्राप्तकर्ता का गौरव प्राप्त है। उन्हें सन् 1913 में गीताञ्जलि के अंग्रेजी-अनुवाद पर साहित्य का नोबल पुरस्कार मिला। यह कृति धर्म, दर्शन एवं विश्व-मानवता के अनूठे सन्देश से अनुप्रमाणित है। रवीन्द्रनाथ को ‘विश्वकवि' भी कहा जाता है। भारत और बांग्लादेश का राष्ट्रगान उन्होंने ही लिखा है। बंगाल में नवजागृति लाने में उनका अनुपम योगदान है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपनी अनुपम कृतियों के माध्यम मानव-मूल्यों के बारे में जो विचार व्यक्त किए, वे राजनीतिक और शैक्षिक चिन्तन की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण हैं। रवीन्द्रनाथ हालांकि खास अर्थ में शिक्षाविद् नहीं हैं; क्योंकि उन्होंने शिक्षा के बारे में ज्यादा नहीं लिखा, लेकिन शिक्षा के प्रति उनके दृष्टिकोण की झलक उनकी कविताओं, गद्य और निबंधों में मिलती है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर शिक्षा को ‘जीवन के अपूर्व अनुभव के स्थायी हिस्से' के तौर पर देखते थे। उनका कहना था कि शिक्षा छात्रों की संज्ञानात्मक अनभिज्ञता के रोग का उपचार करनेवाले तकलीफ़देह अस्पताल की तरह नहीं है, बल्कि यह उनके स्वास्थ्य की एक क्रिया है, उनके मस्तिष्क के चेतना की एक सहज अभिव्यक्ति है। उन्होंने पाया कि अधिकतर वयस्क, बच्चों को इशारों पर नाचनेवाली कठपुतलियाँ समझते हैं। ऐसी प्रक्रिया से उन्होंने बच्चों को बचपन से वंचित कर दिया है। बच्चों को अपने पाठों के लिए केवल स्कूल की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उनको एक ऐसी दुनिया चाहिए जिसकी मार्गदर्शक चेतना व्यक्तिगत प्रेम हो।

रवीन्द्रनाथ का कहना था कि स्वतंत्रता की मौजूदगी में ही शिक्षा को अर्थ और औचित्य मिलता है। उन्होंने तत्कालीन स्कूलों को शिक्षा की फैक्ट्री, बनावटी, रंगहीन, दुनिया के सन्दर्भ से कटा हुआ और ‘सफेद दीवालों के बीच से झाँकती मृतक के आँखों की पुतली' कहा था। वे मानते थे कि हमारी शिक्षा ने हमें प्रकृति और सामाजिक सन्दर्भ- दोनों से दूर कर दिया है। यह निर्जीव और मूल्यविहीन हो गई है। उन्होंने पाया कि शिक्षा को बच्चों के लिए और ज्यादा अर्थपूर्ण बनाने के लिए पहला कदम बच्चे को प्रकृति के संपर्क में लाना होगा। यह शिक्षा को मात्रा और गुणवत्ता में नैसर्गिक बनाकर हासिल किया जा सकता है। प्रकृति के साथ सम्पर्क से बच्चा विशाल दुनिया की वास्तविकता, निरंतरता और खुशी से परिचित होगा। इस दृष्टि से रवीन्द्रनाथ के विचार प्राचीन भारतीय गुरुकुल शिक्षा-प्रणाली के काफी निकट प्रतीत होते हैं। यद्यपि गुरुदेव ने गुरुकुल- प्रणाली की ओर संकेत नहीं किया है, तथापि उनके विचारों से ऐसा ध्वनित होता है कि वह गुरुकुल-प्रणाली से कहीं-न-कहीं अवश्य प्रभावित थे।

बच्चों के सन्दर्भ में वह स्वतंत्र, मुक्त गतिविधि और उनके स्वास्थ्य व शारीरिक विकास के लिए खेल के हिमायती थे। उन्होंने पाया, यदि बच्चे कुछ नहीं सीखते हैं। तो भी उनको खेलने का पर्याप्त समय मिलना चाहिए। पेड़ों पर चढ़ना, तालाब में तैरना, फूल तोड़ना और छिलना, प्रकृति के साथ हज़ार शरारतें जारी रखने से उनके शरीर को पोषण, मन को खुशी और बचपन की नैसर्गिक प्रेरणाओं को संतुष्टि मिलेगी।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस सच्चाई पर अफ़सोस जताया था कि तत्कालीन शिक्षा व्यवस्था किताबों की गुलामी को प्रोत्साहन देती थी। भारत और दुनिया के तमाम देशों में यह स्थिति आज भी बरकरार है। उन्होंने कहा, हमारी शिक्षा स्वार्थ पर आधारित, परीक्षा पास करने के संकीर्ण मकसद से प्रेरित, यथाशीघ्र नौकरी पाने का जरिया बनकर रह गई है जो एक कठिन और विदेशी भाषा में साझा की जा रही है। इसके कारण हमें नियमों, परिभाषाओं, तथ्यों और विचारों को बचपन से रटना की दिशा में धकेल दिया है। यह न तो हमें वक्त देती है और न ही प्रेरित करती है ताकि हम ठहरकर सोच सकें और सीखे हुए को आत्मसात कर सकें।

शिक्षा का उद्देश्य ।

उन्होंने लिखा कि 'सोचने की शक्ति और कल्पनाशक्ति निःसंदेह वयस्क जीवन के लिए दो महत्त्वपूर्ण क्षमताएँ हैं। इसलिए उन्होंने महसूस किया कि इनके विकास को बचपन से प्रारंभ होना चाहिए। उनके मुताबिक, शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों को वास्तविक जीवन की सच्चाइयों, परिस्थितियों और परिवेश के साथ परिचय और समायोजन था। उन्होंने जोर देते हुए कहा था कि अवास्तविक शिक्षा ही हमारे लोगों में बौद्धिक बेईमानी, नैतिक पाखण्ड और मातृभूमि के प्रति अज्ञानता के लिए जिम्मेदार है। इसलिए उन्होंने तर्क देते हुए कहा कि शिक्षा और हमारी जिंदगी के बीच सामञ्जस्य स्थापित करने का प्रयास होना चाहिए।

इस तरह से रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने शिक्षा की उपयोगिता के बारे में अपने विचारों को सामने रखा, वे मानते थे कि शैक्षिक संस्थाओं का आर्थिक जीवन के साथ गहरा जुड़ाव होना चाहिए।

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