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प्रमुखस्वामीजी महाराज
October 1, 2016 • Dr. Rajkumar Upadhyay Mani

विश्वभर में अनूठे मन्दिर-स्थापत्य के लिए प्रसिद्ध स्वामीनारायण अक्षरधाम मन्दिरों की संचालक और स्वामीनारायण संप्रदाय की बोचासणवासी अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था (बी.ए.पी.एस.) के पाँचवें अनुगामी श्री प्रमुखस्वामी जी महाराज विगत 13 अगस्त, 2016 को सायं 06:00 बजे बोटाद के सारंगपुर में 94 वर्ष की उम्र में ब्रह्मलीन हो गये। प्रमुखस्वामीजी ने अपने 65 वर्ष के कार्यकाल में 50 से अधिक देशों के 17 हजार से अधिक गाँव व शहरों में ढाई लाख परिवारों के 8 लाख से अधिक लोगों को अध्यात्म से प्रेरित किया था तथा 800 से अधिक मन्दिरों का निर्माण कराया था (गिनीज बुक ऑफ वर्ल्डरिकॉर्ड्स में दर्ज)। इस दौरान प्रमुखस्वामीजी महाराज ने लगभग पाँच लाख से अधिक लोगों से पत्राचार किया था जो एक कीर्तिमान है। इतना ही नहीं, प्रमुख स्वामीजी ने नशामुक्ति व संस्कार-सींचन के लिए 9,090 संस्कार-केन्द्र व 55,000 स्वयंसेवक तैयार किए जो भूकंप, अकाल, सूखा व अन्य आपदा में लोगों की मदद करने पहुँचते हैं। प्रमुखस्वामीजी ने 800 से अधिक साधु भी इस कार्य हेतु तैयार किए थे।

गुजरात के बड़ौदा जिले में चाणसद नामक गाँव में दिनांक 07 दिसंबर, 1921 (मार्गशीर्ष शुक्ल अष्टमी, वि.सं. 1978) को प्रमुखस्वामीजी का जन्म हुआ था।

बपचन का नाम था शान्तिलाल पटेल। पिता मोतीभाई पटेल तथा माँ दीवालीबहन भगवान् स्वामीनारायण के अनुयायी थे। किसान परिवार के मोतीभाई, शास्त्रीजी महाराज (कार्यकाल : 1898-1951) के मुख्य शिष्यों में से एक थे। परिवार के धार्मिक परिवेश के बीच शान्तिलाल का बचपन सत्संग-पूजा आदि में बीतने लगा। गाँव के स्वामीनारायण मन्दिर में वह प्रतिदिन दर्शन के लिए जाया करते थे। जब संतों का आगमन होता, शान्तिलाल उनकी सेवा में लीन हो जाया करते थे। उन्हें सभी का अपार स्नेह प्राप्त था।

जब 17 वर्ष की अवस्था में एक दिन वह मित्रों के साथ गाँव के मैदान से क्रिकेट का सामान खरीदने हेतु बड़ौदा जाने की तैयारी कर रहे थे, उसी समय उन्हें शास्त्रीजी महाराज द्वारा लिखित आदेशपत्र मिला, 'प्रिय शान्तिभाई, त्यागी होने के लिए तुम अविलम्ब प्रस्थान कर दो।' इस आदेश को सिर आँखों पर चढ़ाकर क्षणमात्र का विलम्ब किए बिना वह लौकिक जगत् का परित्याग कर, अध्यात्म के अलौकिक सागर में गोता लगाने हेतु निकल पड़े।

दिनांक 22 नवम्बर, 1939 को अहमदाबाद के आम्बलीवाली पोल के मकान में शास्त्रीजी महाराज ने उन्हें पार्षद की दीक्षा प्रदान की। तत्पश्चात् दिनांक 10 जनवरी, 1940 (पौष शुक्ल प्रतिपदा, वि.सं. 1996) को गोण्डल में इन्हें भागवती दीक्षा प्रदान करके ब्रह्मस्वरूप शास्त्रीजी महाराज ने इनका नामाभिधान ‘साधु नारायणस्वरूपदासजी' किया।

कुछ ही समय में उनकी अद्भुत प्रतिभा सामने आने लगी। आत्मसंयम, गुरुभक्ति, आदि गुणों से संपन्न आदर्श संत के रूप में वह प्रस्थापित होने लगे। अपने गुरु की दिव्य आभा तथा विलक्षण आत्मनिष्ठा को उन्होंने आत्मसात कर लिया। गुरु ने भी अपनी आर्षदृष्टि से इस युवा शिष्य की प्रतिभा को ठीक पहचाना। सन् 1950 में उन्होंने अरंबलीवाले मुहल्ले के एक छोटे-से मकान में इस युवा शिष्य को विधिवत् बीएपीएस संस्था का प्रमुख चुना। जिस मुहल्ले में इस महान् संत के त्यागी जीवन का आरम्भ हुआ था, उसी मुहल्ले में दस वर्ष के पश्चात्, गुरु ने उन्हें लाखों को प्रेरणा प्रदान करने का महान् दायित्व सौंपा।

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