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प्रचलित भारतीय शिक्षापद्धति की विसंगतियाँ
May 1, 2016 • Dr. Rajiv Ranjan Upadhyay

उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में भारतीय शिक्षा 0) की क्या स्थिति थी और शिक्षा प्रदान करने की क्या प्रक्रिया थी, शिक्षा-तंत्र कैसे संचालित होता था- इस पर इण्डिया ऑफिस लन्दन में रखे हुए, अंग्रेजों द्वारा लिखित दस्तावेज, प्रत्येक भारतीय को, जो शिक्षा के प्रति समर्पित है, अवश्य देखना चाहिये।

पर आधुनिक भारत के शिक्षाविदों ने इन तथ्यों को संज्ञान में न लेकर, काँग्रेस-कम्युनिस्टों और उनके द्वारा शिक्षा-संस्थानों में बिकी हुई आत्माओं के शिक्षाविदों ने वह कार्य कर दिखाया जो मैकाले के मानस पुत्र- अंग्रेज़ शिक्षा प्रदाता भी न कर सके थे। इन तथाकथित विद्वानों ने यह झूठा, भ्रामक, द्वेषपूर्ण प्रचार, कि परम्परागत भारतीय शिक्षा मात्र द्विजों तक ही सीमित थी। यह तथ्य साक्ष्यों के पूर्ण विपरीत है। ब्रिटिश दस्तावेज इस बात के प्रमाण हैं कि 18वीं शताब्दी के अन्त तक भारत में जो शिक्षा प्रचलित थी, वह समकालीन इंग्लैण्ड की शिक्षा की दशा से बहुत आगे थी। भारत के प्रत्येक ग्राम में एक पाठशाला होती थी जिसमें सभी वर्ग, जाति के बालक-बालिकाएँ शिक्षा प्राप्त करते थे। उच्च शिक्षा बालक की विशेषज्ञता में विशिष्टताएँ थीं जो समूहगत थीं। बड़े ग्रामों में एक से अधिक पाठशालाएँ होती थीं और नगर में अनेक।

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में वेदों, शास्त्रों, महाकाव्यों सहित जिन-जिन ग्रंथों का अध्ययन-अध्यापन किया जाता था, इसके साक्षी ब्रिटिश दस्तावेज हैं। गणित, खगोलशास्त्र (भूगोल), अनेक प्रकार के शिल्पों, आयुर्वेद से उन्नत ज्ञान का आदान-प्रदान उस शिक्षा में भारतीय परिप्रेक्ष्य में सहज रूप से होता था। इस शिक्षा-पद्धति को प्रयासपूर्वक अंग्रेजों ने समाप्त करने की चेष्टा की, परन्तु यह शिक्षा-व्यवस्था आधे भारतवर्ष में 1947 के अंत तक चलती रही। हम सभी की शिक्षा का प्रारम्भ इसी परिवेश में हुआ था।

परम्परागत इस शिक्षा के विनाश का कार्य 1947 ई. के बाद कम्युनिस्टों-सेक्युलरिस्टोंनास्तिकों के एक समुदाय, जिसे राजतंत्र का समर्थन था, द्वारा प्रारम्भ किया गया। इनका उद्देश्य एक नास्तिक भौतिकवादी समुदाय को विकसितकर बहुसंख्यक हिंदुओं को मानसिक दास बनाकर उनकी मानसिकता को नियंत्रित और परिवर्तित करना था।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए अल्पसंख्यकों, ईसाइयों के शिक्षा-संस्थानों को राजकोष से धन देकर पोषित करने तथा उन्हें संरक्षण देने का कुत्सित प्रयास, इस तथ्य की अनदेखी कर, कि अल्पसंख्यकों का दर्जा संविधान में किस प्रतिशत तक होना चाहिए था, उन्हें प्रत्येक प्रकार के समर्थन देने का अभियान-सा चला दिया गया। यह कृत्य लोकतंत्र की भावना के विरुद्ध है। इस प्रकार की शिक्षा का परिणाम यह हुआ कि बहुसंख्यक भारतीयों को दर्शन, धर्मशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, न्यायशास्त्र, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, विज्ञान, अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल, साहित्य तथा कलाओं के क्षेत्र में भारतीय ज्ञान-परम्पराओं से पूर्णतः वंचित कर दिया गया। इस प्रकार निन्दनीय प्रयास, संसार में अपनी इस शिक्षा की धृतराष्ट बुद्धि की अनोखी मिसाल है। जिसमें नास्तिकों-कम्युनिस्टों द्वारा संपादित सामग्री छात्रों को पढ़ाई जाने लगी। यह सर्वविदित है कि इनके द्वारा लिखे गए भारतीय शिक्षा के जिस इतिहास को पढ़ाया जाता है, वह झूठ और मिथ्या तथ्यों से भरा-पूरा है।

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