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पौराणिक धर्म ग्रंथों में जैवविविधता का महत्व
March 1, 2019 • Dr. Ramlakhan Singh Sikarwar

जैव विविधता शब्द सन् 1992 से अस्तित्व में आया तथापिइस विषय का ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों को प्राचीन काल से था। जैव विविधता एवं पारिस्थिति की तन्त्र के इस महत्व के दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुये ऋषि-मुनियों ने प्रकृति में व्याप्त समस्त जीवित (पेड़-पौधे व जीव-जन्तु) तथा अजीवित (नदी-नाले, पर्वत, भूमि) घटकों के बीच पारस्परिक एंव पारंपरिक सम्बध को हिन्दु सनातन धर्म से जोड़ दिया।

भारत वर्ष की सनातन संस्कृति अनादि काल से प्रकृति पूजक रही है और सम्पूर्ण श्रृष्टि का संचालन प्रकृति में विद्यमान पंच महाभूतों यथा-पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश व वायु द्वारा संचालित होता है और इन्हींपंचमहाभूतों से ही जीव जगत की संरचना हुई है, जैसा कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस में लिखा भी है। छिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित अति अधम सरीरा ॥

प्रकृति से मानव जाति का सम्बध जब से इन पंच महाभूतों के साथ परस्पर पूर्कता, सम्मान व आदर भाव का रहा हैतब से वह मानव जाति का कल्याण व भरण-पोषण करती रही है। वर्तमान में मानव व प्रकृति के इस संबंध को पारिस्थितिकी तन्त्र कहते हैं। यह पारिस्थितिकी तन्त्र जिस क्षेत्र या देश में जितना अधिक सुद्रढ़ होगा उस क्षेत्र या देश की जैवविविधता उतनी ही सघन व सबल होगी। जैव विविधता को विभिन्न प्रकार से परिभाषित किया गया है परन्तु साधारण भाषा में किसी क्षेत्र या देश मे पाये जाने वाले जीवित जीव जिनमें पेड़पौधे, पशु-पक्षी तथा सूक्ष्म जीव शामिल हों, की विविधता एवं भिन्नता को जैव विविधता कहते हैं।'' यद्यपि जैव विविधता शब्द सन् 1992 से अस्तित्व में आया तथापि इस विषय का ज्ञान हमारे ऋषि-मुनियों को प्राचीन काल से था। जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तन्त्र के इस महत्व के दूरगामी परिणामों को ध्यान में रखते हुये ऋषि-मुनियों ने प्रकृति में व्याप्त समस्त जीवित (पेड़-पौधे व जीव-जन्तु) तथा अजीवित (नदी-नाले, पर्वत, भूमि) घटकों के बीच पारस्परिक एंव पारंपरिक सम्बध को हिन्दु सनातन धर्म से जोड़ दिया तथा वेदों एवं पुराणों में इसके महत्व का सटीक वर्णन किया, जिससे प्रकृति के जीवित व अजीवित घटकों के बीच परस्पर संतुलन बना रहे और जीव जगत का कल्याण होता रहे। तभी तो पेड़-पौधों, जानवरों, पशु-पक्षियों, नदियों, तालाबों व पर्वतों की पूजा का हिन्दु धर्म ग्रंथों में विधान किया गया।

वनों को ‘‘प्रकृति के फेफडे'' कहा गया है तथा पेड़-पौधों को ‘‘लिविंग ऑक्सीजन सिलेण्डर''। यही हमें शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध वातावरण, पशु- पक्षियों को आश्रय तथा हमारी सभी बुनियादी आवश्यकताओं जैसे भोजन, वस्त्र, औषधि, चारा, रेशा, गोंद, रंग, लाख, टैनिन, लकड़ी, फर्नीचर, घरेलू उपकरण, कृषि उपकरण, छाजन इत्यादि की पूर्ति करते हैं। मनुस्मृति में कहा गया है कि

यावत् भूमण्डलम् धन्त् समग्र वन काननम्। तावत तिष्ठति मेदिन्यम् संतति पुत्र पौत्रिकी।।

अर्थात ‘‘जब तक पृथ्वी पर वन्य जीवों से सम्पन्न वन हैं तब तक धरती मानव वंश का पोषण करती रहेगी। आज वनों और वन्य जीवों पर संकट के बादल मडरा रहे हैंवनों का अंधाधुंध विनाश हो रहा है और वन्य जीवों का अंधाधुंध शिकार। जबकि महाभारत में कहा गया है कि

नस्या द्वान मृते व्याघ्रान व्याघ्रान स्युर्ऋते वनम्।

वनहि रक्षति व्याघ्र व्याघ्रान रक्षति काननम्।।

अर्थात् ‘‘बाघों के बिना वन की रक्षा नहीं हो सकती तथा वन के बिना बाघ भी नहीं रह सकते, क्योंकि बाघ वन की रक्षा करते हैं तथा वन बाघों की''। इसी प्रकार सिंह व वनों के बारे में भी महाभारत में कहा गया है कि

सिंहैर्विहीनं हि वनं विनश्येत्।

सिंहा विनश्येते स्युर्ऋते वनेन् ।।

अर्थात् ‘‘सिंह से सूना हो जाने पर वन नष्ट हो जाता है और वन के बिना सिंह भी नष्ट हो जाते हैं।

पेड़-पौधे हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं करते बल्कि हमारी सनातन संस्कृति के वाहक भी हैं। इन्हें देव स्वरूप माना गया है। इनके प्रत्येक भाग में देवताओं का वास माना गया है। श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वृक्षों की महिमा का वर्णन निम्न प्रकार किया गया है।

पश्यतैतान महाभागान्

पराबैंकान्त जीविताम्।

वात वर्षा तपहिमान् सहन्तो वारयन्ति नः ।।

अहो एषां बरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम्।

सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नाभिनः।

पत्रप पुष्प फलच्छाया

मूला बल्कला दारूभिः।

गंध निर्यासभस्मा स्थितो

क्मैः कामान् वितन्वते।।

एतावज्जन्म साफल्यम देहिनामिह देहिषु ।

प्राणैरथैर्धिया वाचा श्रेय एषाचरेत सदा।।

अर्थात् - ‘‘प्रिय मित्रो, देखो। ये वृक्ष कितने भाग्यवान हैं, इनका सारा कार्य केवल दूसरों की भलाई करने के लिये ही है। ये स्वयं तो हवा, वर्षा, धूप, और पाला सहते हैं, परन्तु उनसे हमारी रक्षा करते हैं। इन्हीं का जीवन श्रेष्ठ है। इनके द्वारा सब प्राणियों को जीवन मिलता है। सज्जन पुरुष की भाँति ये याचक को कभी निराश नहीं करते। पत्ते, फूल, फल, छाया, जड़, छाल, लकडी, गंध, गोंद, राख, अंकुर और कोपलों से ये वृक्ष मनुष्यों की समस्त मनोकामना पूर्ण करते हैं। जीवन की सफलता इसी में है कि हम अपने धन से, विवेक से, अपनी वाणी से तथा प्राणों से ऐसे कर्म करें जिससे दूसरों को कष्ट न हो''।

प्राचीन काल से ही हमारे धर्मग्रंथों में विभिन्न औषधीय पौधों तथा वनस्पतियों का उल्लेख किया गया है। फिर वे चाहे वो हिन्दु, मुस्लिम, इसाई, जैन या बौद्ध हों उन्हें धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर मानव समाज के कल्याण व स्वस्थ वातावरण के निर्माण हेतु किया गया है।

आज हमारे समाज में पुत्र प्राप्ति की इच्छा के लिये अनेकों नैतिक व अनैतिक कर्म किये जाते हैं, परन्तु वृक्ष कोई नहीं लगाना चाहता है। जबकि मत्स्य पुराण में बताया गया है कि

दशकूप समा वापी, दशवापी समो हृदः।

दशहद समः पुत्रो दशपुत्र समोठ्ठम्:।।

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