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पुस्तक का गर्भकाल
May 1, 2018 • Vijay Kumar

प्राणीशास्त्र में बताया जाता है कि किस प्राणी का गर्भकाल कितना होता है। अंडे से जन्मे प्राणियों या का विकास माँ के पेट के अंदर तथा फिर का विकास माँ के पेट के अंदर तथा फिर बाहर भी होता है। जो प्राणी सीधे माँ के पेट से जन्मते हैं, उनमें से कोई छह मास गर्भ में रहता है, तो कोई सोलह मास। हो सकता है कोई भौतिकवादी इसे ईश्वर का अन्याय कहे; पर हम तो इसे उस जगन्नियन्ता की माया' कहकर चुप ही रहते हैं।

प्राणियों के गर्भकाल का तो समय तो भगवान् ने निश्चित किया है; पर कुछ चीजों का गर्भकाल निश्चित करना उसके हाथ में भी नहीं है। पुस्तक ऐसी ही चीज है।

अब असली बात पर चलें। बचपन से ही मुझे लिखने की बीमारी लग गयी। सबसे पहले कविता में हाथ आजमाते हुए दादा जी की छड़ी और चश्मे पर कविता लिखी। उसे दीदी को दिखाया, तो उसने वह कागज दादा जी को थमा दिया। फिर क्या था, दादा जी ने चश्मा उतारकर एक हाथ से मेरा कान पकड़ा और दूसरे से छड़ी। यह तो गनीमत हुई कि मेरी चीख-पुकार दादी ने सुन ली। वरना न जाने क्या हो जाता। 

फिर मैंने घर से ध्यान हटाकर कई अध्यापकों पर कविताएँ लिख डालीं; पर उन्हें भी कुछ धूर्त मित्रों ने सार्वजनिक कर दिया। इससे घर के साथ ही विद्यालय में भी मार खानी पड़ी। मारपीट के झंझट से बचने के लिए इस विधा को छोड़कर मैं कहानी, निबन्ध और व्यंग्य के क्षेत्र में उतर गया। ऐसी कुछ रचनाएँ छुपीं भी; पर जिस नाम और दाम की मुझे इच्छा थी, वह पूरी नहीं हुई।

मेरे एक मित्र ने कहा कि साहित्य में प्रायः उपन्यासों का बोलबाला रहता है। अधिकांश बड़े देशी और विदेशी पुरस्कार उन्हें ही मिले हैं। उपन्यासों पर ही फिल्में बनती हैं। अतः मुझे भी एक अदद उपन्यास लिखना चाहिए। यदि वह किसी फिल्म- निर्माता को पसंद आ गया, तो करोड़पति बनते देर नहीं लगेगी। अखबारों और फ़िल्मी पत्रिकाओं में तुम्हारे फोटो अमिताभ बच्चन और रणबीर कपूर के साथ छपेंगे।

बात मेरे भेजे में बैठ गयी। मैं उसी दिन से उपन्यास के बारे में सोचने लगा। मैंने सुना था कि देवकीनन्दन खत्री को चंद्रकांता' जैसे प्रसिद्ध उपन्यास का विचार जंगल और पुराने खण्डहरों में मिला था। अमृतलाल नागर कई बार लाल बत्ती क्षेत्र में गये, तब जाकर ‘कोठेवालियाँ' उपन्यास बना। अतः मैं भी जंगल और खण्डहरों में जा घुसा। जंगल में हाथियों की कृपा से मुझे दो दिन भूखे-प्यासे पेड़ पर बिताने पड़े। खण्डहर में अपनी कमाई का बँटवारा करते चोरों ने मेरे कपड़े उतरवा लिये। लाल बत्ती क्षेत्र की बात सुनते ही मैडम ने तलाक की धमकी दे दी। इसलिए इस विचार को छोड़ना पड़ा।

पर उपन्यास तो मुझे लिखना ही था। इसलिए घूमते-फिरते, सोते-जागते, घरदफ्तर और बाजार में सब जगह उपन्यास ही दिमाग में घूमता रहता था। एक बार खाना खाते समय पूरे परिवार के लिए बना खाना मैं अकेले ही खा गया। एक बार सब्जीवाले को बिना पैसे दिये चल दिया, तो दूसरी बार सौ का नोट देकर पैसे वापस लेना ही भूल गया। गलत नंबर की बस पकड़ना तो आम बात हो गयी। हद तो तब हो गयी, जब एक दिन मैं दफ्तर के बजाय श्मशान जा पहुंचा।

दफ्तर में भी कई बार मैं काम छोड़कर लिखने बैठ जाता। कई सरकारी कागजों के पिछले पृष्ठों पर मैंने उपन्यास के अंश लिख दिये। अतः अधिकारियों से डाँट खानी पड़ी।

आगए और----