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पाठशाला शिक्षा के नाम पर हो रहे व्यवसाय को प्रदर्शित करने वाली फिल्म
May 1, 2016 • Prafull Chandra Thakur

पाठशाला शिक्षा के नाम पर हो रहे व्यवसाय को प्रदर्शित करनेवाली एक सशक्त फिल्म है। शिक्षण-कर्म से गायब हो रही नैतिकता, शिक्षा को पूरी तरह व्यावसायिक बनाने की प्रक्रिया, विद्यालय-प्रबन्धन की मनमानी, अभिभावकों पर आर्थिक बोझ डालना और बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने को ‘पाठशाला' में रेखांकित करने का सफल प्रयास किया गया है। निर्देशक मिलिन्द यूके अपनी प्रतिभा दिखाने में सफल रहे हैं। मैकेनिकल इंजीनियरिंगकी डिग्रीप्राप्त मिलिन्द को चर्चित निर्देशक संजय लीला भंसाली के साथ काम करने का वर्षों का अनुभव रहा है। मिलिन्द मराठी-फ़िल्म देवकी बनाकर चर्चित हो चुके हैं। 'देवकी' फ़िल्म को 27 पुरस्कार प्राप्त हैं। पेपरडॉल एंटरटेनमेंट द्वारा निर्मित तथा इरोज़ एंटरटेनमेंट द्वारा वितरित फ़िल्म ‘पाठशाला' में मिलिन्द ने अपना काम मज़बूती से किया है। जबकि पटकथाकार अहमद खान ने शिक्षा के विविध मुद्दों को अपने स्तर से उभारा है। फिल्म की कथा लोगों को चिन्तन करने पर मजबूर करती है कि जीवन के आवश्यक अंग को भी बाजार का हिस्सा बनाया जा रहा है। ‘थ्री इडियट्स', 'तारे जमीं पर', 'चल चलें' और ‘चॉक और डस्टर' जैसी फिल्मों में शिक्षा-संबंधी मुद्दों को अपने-अपने ढंग से चित्रित किया गया है।

‘पाठशाला' की कथा मुम्बई के एक उपनगर में स्थित सरस्वती विद्या मन्दिर की है। ट्रस्ट द्वारा संचालित इस विद्यालय को प्रबन्धक उत्पाद (प्रॉडक्ट) बनाना चाहता है जिससे पैसा और सिर्फ पैसा कमाया जा सके चाहे शिक्षा की गुणवत्ता रहे या न रहे। छात्रों की शैक्षणिक, आर्थिक और मानसिक स्थिति की परवाह किए बिना अभिभावकों का आर्थिक शोषण किया जा सके। आर्थिक तंगी से जूझ रहे शिक्षकों एवं कर्मियों की उपेक्षा कर विद्यालय में सुविधाएँ प्रदान कर उसे फाइव स्टार होटल की श्रेणी में लाने की योजना को पूरा किया जा सके। इसके लिए प्रबन्धक प्रिंसिपल को विवश कर काम करवाता है। इस क्रम में मनमाने ढंग से (फीस) शुल्कवृद्धि करना, छात्रों के उपयोग की वस्तुओं को अधिक मूल्य पर विद्यालय से ही खरीदने पर विवश करना, छात्रों को रियलिटी शो में भाग लेने के लिए मजबूर करना, प्रबंधन की मनमानी के सामने प्रिंसिपल एवं शिक्षकों का समर्पण करना आदि को महत्त्वपूर्ण ढंग से दिखाया गया है। 

विद्यालय में अंग्रेजी-शिक्षक के रूप में युवा राहुल प्रकाश उदयावर (शाहिद कपूर) की नियुक्ति होती है। शिक्षिका अंजलि माथुर (आयशा टाकिया) के अनुरोध पर वह संगीत शिक्षक का भी कार्य करता है। अंजलि कई कार्यों को करती है। आर्थिक स्थिति में सुधार लाने के लिए उसने विदेश में नौकरी के लिए आवेदन किया था। विद्यालय-प्रबंधन हर हाल में आय बढ़ाना चाहता है। इसके लिए पुस्तक, पोशाक, खेल के सामान, संगीत के उपकरण और कैंटीन के सामानों पर मूल्य-वृद्धि की जाती है। अभिभावकों द्वारा विरोध होने पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। एक गरीब छात्र और उसके अभिभावक को बढ़ी हुई फीस नहीं देने के कारण अपमानित होना। पड़ता है। उसी समय शिक्षक राहुल ने प्रबंधक को कहा कि उसके वेतन से फ़ीस काट लें। यह दृश्य राहुल के शिक्षा-प्रेम और मानवीय संवेदना को बड़ी गहराई से उजागर करता है। वह छात्र विजय यादव को कड़ी धूप में खड़ा करने की सजा, उसके पिता का अपमान तथा दो घंटे में फीस जमा करने की मोहलत देने की घटना से आहत है। प्रबंधक शर्मा द्वारा छात्र विजय को छोटे स्कूल में ले जाने की धमकी देना तथा अभिभावक को उसकी हैसियत याद दिलाना पूरी तरह से अमानवीय है।
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