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पर्यटन पट छाया अपराध की
September 1, 2018 • Dr. Gajendra Pratap Singh

पर्यटन हमेशा से किसी समाज के लिए सामाजिक आयोजन रहा है। । यह प्रत्येक मनुष्य की प्राकृतिक अभिलाषा से अभिप्रेत होता है। यह लोगों में नये अनुभव, कार्य, शिक्षा, ज्ञान और मनोरंजन के लिए होता है। इससे एक दूसरे की संस्कृति और मूल्य को समझने के लिए तथा अन्य सामाजिक, धार्मिक और व्यावसायिक हितों की पूर्ति के लिए पर्यटक और मूल संरचना का विकास हुआ है। वैसे पर्यटन के अनेक आयाम हैं। क्योंकि पर्यटक सांस्कृतिक दूत की भूमिका निभाने के साथ-साथ राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में भी महती योगदान देता है।

भारत के सन्दर्भ में पर्यटन की बात करें, तो जर्मन विद्वान् मैक्समूलर की एक उक्ति याद आती है, अगर मुझसे पूछा जाए। कि इस आसमान के नीचे मानव ने कहाँ पर अपने सबसे खूबसूरत उपहार को पूरी तरह सँवारा है, तो मैं भारत की ओर इशारा करूंगा।' यही है भारत की वैभवपूर्ण विरासत। क्योंकि भारत में, पर्यटन उद्योग का विशेष स्थान है, चूंकि इसमें न केवल उच्च दर पर विकास करने की क्षमता है। अपितु अपने अप्रत्यक्ष और परोक्ष सम्बन्धों और अंतरक्षेत्रीय सहक्रियाशीलताओं के माध्यम से कृषि, बागवानी, हस्तशिल्प, परिवहन, निर्माण आदि के साथ अन्य आर्थिक क्षेत्रों को भी अभिप्रेरित करता है।

अर्थात् यह देश में दूसरे उद्योगों को बल प्रदान कर करता है और अंतरराष्ट्रीय ऋण चुकाने में सहायता करने के लिए पर्याप्त धन का अर्जन कर करता है। क्योंकि यह देश के लिए तीसरा सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा का अर्जक है।

यदि देखा जाए तो पर्यटन आरम्भ से ही राष्ट्रों के मध्य सामाजिक आदान-प्रदान की भूमिका निभाने का मुख्य बिंदु रहा है। हालांकि परम्परागत तौर पर पर्यटन को विलासिता माना जाता रहा है, परंतु बदले वैश्विक परिदृश्य में पर्यटन अपेक्षाकृत बड़े सामाजिक, सांस्कृतिक-धार्मिक परिप्रेक्ष्य में आता है और उसकी रुचियाँ भी अलग अलग होती हैं। आज पर्यटन विलासिता' न रहकर आम व्यक्ति की पहुँच में है। यह सामान्य जीवन-प्रक्रिया का हिस्सा माना जाने लगा है। पर्यटन-स्थल पर पर्यटक नये सामाजिक जीवन के सम्पर्क में आने से वह दूसरों से सीखता है। इस रूप में लोगों के बीच बेहतर समझदारी पैदा करते हुए पर्यटन उसके सामाजिक विकास के एक साधन के रूप में गहरा प्रभाव डालता है।

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