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पत्थों में छिपा रहस्य अंगकोरवाट
October 1, 2016 • Prof. Mahesh Kumar Sharna

दक्षिण-पूर्वी एशिया का कम्बोडिया (कम्बुज देश) विशाल जंगलों और दलदली भूमि से घिरा हुआ है। सदियों पूर्व दक्षिण-पूर्व के देशों में भारतीयों ने अनेक उपनिवेश बसाए थे। हिंदचीन, सुवर्णद्वीप, यवद्वीप, मलाया आदि में भारतीयों ने अनेक राज्यों की स्थापना की थी। इन्हीं में एक कम्बुज देश था जिसका संस्थापक कौण्डिन्य नामक ब्राह्मण था।जिसका उल्लेख वहाँ के एक संस्कृतअभिलेख में मिला है।

आज भी कम्बोडिया के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में भारत की महान् संस्कृति की झलक देखने को मिलती है। यहाँ के 12वीं शती के विशाल अंगकोरवाट मन्दिर को हमारे महान् पूर्वजों ने अपनी वैदिक संस्कृति के 50,000 शिल्पकारों की सहायता से रूप दिया था। इस मन्दिर की विशालता और भव्यता को देखकर कोई भी दर्शक संदिग्ध और विस्मित होकर सोचने लगता है कि यह कदाचित् मनुष्य द्वारा नहीं देवता द्वारा बनाया गया है। 400 वर्ग किलोमीटर में फैला यह विश्व का सबसे बड़ा हिंदूॐ मन्दिर तथा विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक स्मारक है। दिल्ली के अक्षरधाम मन्दिर से यह मन्दिर लगभग 4 गुणा बड़ा है। मिकांग नदी के किनारे सिमरिप नगर में स्थित यह मन्दिर इतना बड़ा है कि इसके परिसर का चक्कर लगाने और एक-एक भाग में जाने में कम-से-कम 2 घंटे लगेंगे। ठीक से घूमने के लिए तो महीनों का समय चाहिये। इस सम्पूर्ण मंदिर में कहीं भी चूने या पलस्तर का प्रयोग नहीं हुआ है। ऐसी मान्यता है कि मन्दिर के निर्माण में 25 मील की दूरी से लगभग 1 टन से अधिक वजन के पत्थर हाथियों की सहायता से यहाँ लाए गए थे। अंकोरवाट की दीवारें जयवर्मन द्वितीय ने 9वीं शताब्दी में अपनी राजधानी बनाने के लिए बनवानी प्रारंभ की थी। पर वे अपने जीवनकाल में इसे पूर्ण न करा सके। पर कालक्र मेण आध्यात्मिक चेतना के कारण यह स्थल विशाल मन्दिर में परिवर्तित होता चला गया। इस विशाल विष्णु मन्दिर को सूर्यवर्मन द्वितीय ने अपने शासनकाल में पूर्ण कराया। फ्रांसीसियों के अधीन कम्बोडिया के आ जाने के कारण फ्रांसीसी यात्री हेनरी मोहट ने सन् 1861 में सियमरीव नगर के जंगलों में घूमते समय एक विशाल चबूतरों की श्रृंखला को देखा था और उसने सरकार की आर्थिक सहायता से उस स्थान का उत्खनन-कार्य प्रारंभ किया। समय के परिवर्तन के साथ एक के बाद एक मंदिर जंगलों में से निकलते चले आये। आध्यात्मिक चेतना के कारण यह स्थल विशाल मन्दिर में परिवर्तित होता चला गया। इस विशाल विष्णु मन्दिर को सूर्यवर्मन द्वितीय ने अपने शासनकाल में पूर्ण कराया। फ्रांसीसियों के अधीन कम्बोडिया के आ जाने के कारण फ्रांसीसी यात्री हेनरी मोहट ने सन् 1861 में सियमरीव नगर के जंगलों में घूमते समय एक विशाल चबूतरों की श्रृंखला को देखा था और उसने सरकार की आर्थिक सहायता से उस स्थान का उत्खनन-कार्य प्रारंभ किया। समय के परिवर्तन के साथ एक के बाद एक मंदिर जंगलों में से निकलते चले आये।

शिलाओं पर उत्कीर्ण हिंदू-संस्कृति 

अंगकोरवाट मुख्यतः एक विष्णु-मन्दिर है और रामायण, महाभारत एवं पुराणों की घटनाओं के सैकड़ों दृश्य यहाँ शिलाओं पर उत्कीर्ण हैं। इनमें अप्सराओं की लगभग 2,000 सुन्दर आकृतियाँ हैं। ऐसा रूप भारत के शायद ही किसी मन्दिर में देखने को मिले। भित्तियों पर फूल-पत्तियों, अप्सराओं तथा देवी- देवताओं का अंकन बड़ी बारीकी से हुआ है। मन्दिर के उत्तरी भाग पर भगवान् कृष्ण की लीलाओं का दर्शन है जिनमें माखनचोरी, गोपियों के साथ बाँसुरी-वादन आदि देखने को मिलता है। एक-एक शिलाचित्र अपने में कलापूर्ण है और भारतीय सभ्यता की जीती-जागती कहानी है। मन्दिर के पूर्वी भाग पर समुद्र-मंथन की कथा दिखाई देती है। वाय अंगकोरवाट मुख्यतः एक विष्णु-मन्दिर है और रामायण, महाभारत एवं पुराणों की घटनाओं के सैकड़ों दृश्य यहाँ शिलाओं पर उत्कीर्ण हैं। इनमें अप्सराओं की लगभग 2,000 सुन्दर आकृतियाँ हैं। ऐसा रूप भारत के शायद ही किसी मन्दिर में देखने को मिले। भित्तियों पर फूल-पत्तियों, अप्सराओं तथा देवी- देवताओं का अंकन बड़ी बारीकी से हुआ है। मन्दिर के उत्तरी भाग पर भगवान् कृष्ण की लीलाओं का दर्शन है जिनमें माखनचोरी, गोपियों के साथ बाँसुरी-वादन आदि देखने को मिलता है। एक-एक शिलाचित्र अपने में कलापूर्ण है और भारतीय सभ्यता की जीती-जागती कहानी है। मन्दिर के पूर्वी भाग पर समुद्र-मंथन की कथा दिखाई देती है। वायुके वेग में पर्वत का हिलना और देवताओं व असुरों का शेषनाग द्वारा मंथन का दृश्य हृदयस्पर्शी है। यह बड़े ही अचरज की बात है कि एक-एक चित्र को उस काल के कलाकारों ने कितनी सूझबूझ से बनाया था। के वेग में पर्वत का हिलना और देवताओं व असुरों का शेषनाग द्वारा मंथन का दृश्य हृदयस्पर्शी है। यह बड़े ही अचरज की बात है कि एक-एक चित्र को उस काल के कलाकारों ने कितनी सूझबूझ से बनाया था।

भगवान् शिव द्वारा विषपान का दृश्य दर्शकों को कुल पल के लिए अध्यात्म की ओर ले जाता है। मन्दिर के दक्षिणी भाग पर प्रेम के देवता कामदेव की अनेक चित्रावलियाँ हैं। भगवान् शिव द्वारा कामदेव को भस्म होते एक स्थान पर दिखलाया गया है। आगे बढ़ने पर भस्मासुर और स्कन्दपुराण की कथाओं का चित्रण है। बहुत-से शिलाचित्र टूट भी चुके हैं। चित्रों का रूप कलात्मक और बारीकी को लिए हुए है जिसे देखने में दर्शकों को काफी समय लगता है। पत्थरों को खोदकर जो चित्रावलियाँ बनाई भगवान् शिव द्वारा विषपान का दृश्य दर्शकों को कुल पल के लिए अध्यात्म की ओर ले जाता है। मन्दिर के दक्षिणी भाग पर प्रेम के देवता कामदेव की अनेक चित्रावलियाँ हैं। भगवान् शिव द्वारा कामदेव को भस्म होते एक स्थान पर दिखलाया गया है। आगे बढ़ने पर भस्मासुर और स्कन्दपुराण की कथाओं का चित्रण है। बहुत-से शिलाचित्र टूट भी चुके हैं। चित्रों का रूप कलात्मक और बारीकी को लिए हुए है जिसे देखने में दर्शकों को काफी समय लगता है। पत्थरों को खोदकर जो चित्रावलियाँ बनाई बनाई गई हैं, उनमें केवल देवी-देवताओं के ही चित्र नहीं हैं, बल्कि राजा-रानी और राजकुमारों के चित्र भी उत्कीर्ण हैं। पश्चिमी भाग पर राजा सूर्यवर्मन के अन्तिम शरीर के भगवान् विष्णु में विलय के चित्र को काफी सावधानी से देखा जा सकता है। इसी दीवार पर सेना के साथ हाथी पर राजा सूर्यवर्मन के चित्रों से उस काल के युद्ध की स्मृति है। कुछ चित्र राजदरबार के भी वहाँ उत्कीर्ण कराए गए हैं जिनमें न्याय करते हुए राजा को दिखलाया गया है। अंगरक्षकों के चित्र में भाले और धनुष-बाण लिए हुए उनके चित्र हैं। उनके समक्ष कुण्डल पहने। बनाई गई हैं, उनमें केवल देवी-देवताओं के ही चित्र नहीं हैं, बल्कि राजा-रानी और राजकुमारों के चित्र भी उत्कीर्ण हैं। पश्चिमी भाग पर राजा सूर्यवर्मन के अन्तिम शरीर के भगवान् विष्णु में विलय के चित्र को काफी सावधानी से देखा जा सकता है। इसी दीवार पर सेना के साथ हाथी पर राजा सूर्यवर्मन के चित्रों से उस काल के युद्ध की स्मृति है। कुछ चित्र राजदरबार के भी वहाँ उत्कीर्ण कराए गए हैं जिनमें न्याय करते हुए राजा को दिखलाया गया है। अंगरक्षकों के चित्र में भाले और धनुष-बाण लिए हुए उनके चित्र हैं।

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