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पं. दीनदयाल उपाध्याय
November 1, 2016 • Dr. Rajkumar Upadhyay 'mani'

सामान्यतः दर्शन एवं ज्ञान का विषय अत्यंत गूढ़ और नीरस होता है जबकि कथा और सरस-सरल और कहानी सरस-सरल और आनन्ददायक होता है। इसलिए भारतीय जनमानस में लोककथाएँ एवं गाथाएँ अधिक प्रचलित हैं। राम की कथा और कृष्ण की कथा विश्वविख्यात हैं। अनपढ़, गॅवार, मूर्ख भी इन कथाओं से परिचित होते हैं लेकिन वे ज्ञानदर्शन से शून्य रहते हैं। एकात्म मानवदर्शन भी ज्ञान एवं दर्शन से संबंधित है। यह सुखद संयोग है कि हम पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रवर्तित ख्याति चिन्तन एकात्म मानवदर्शन की स्वर्ण-जयंनी अर्थात् उसके प्रादुर्भाव का पचासवाँ वर्ष मना चुके हैं। अब इसी वर्ष इसके समापन के अवसर पर पंडित जी का शताब्दी-वर्ष (25 सितम्बर, 1916 से 2017) मना रहे हैं। पुनः एक वर्ष बाद उनकी 50वीं पुण्य- तिथि होगी। यद्यपि हम जानते हैं कि रजत, स्वर्ण, कौस्तुभ, अमृत जयंती या शताब्दी वर्ष कब मनाते हैं? 25वें वर्ष रजत जयन्ती, 50वें वर्ष स्वर्ण-जयंती, 75वें वर्ष में कौस्तुभ जयन्ती तथा 100वें वर्ष में अमृतमहोत्सव या शताब्दी-वर्ष मनाने की अपनी भारतीय व सनातन परंपरा रही है। उदाहरण के रूप में हमारे स्मृति-पटल पर वर्ष 2013-14 में स्वामी विवेकानन्द की सार्धशती (150वाँ वर्ष) सम्पूर्ण देश ने मनाया। इनके साथ ही पूज्य मदनमोहन मालवीय और गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की भी जयन्ती मनाई गई।

वस्तुतः विश्वविख्यात एकात्म मानवदर्शन विषय को जानने से पूर्व हमें इस दर्शन के प्रवर्तक के जीवन को भी जानना चाहिए क्योंकि किसी व्यक्ति के जीवन की परिस्थितियाँ एवं परिवेश ही उसे महापुरुष बनाती हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय के युगपरिवेश की क्या परिस्थितियाँ थीं जिसके फलस्वरूप एकात्ममानवदर्शन का जन्म हुआ। यह सर्वविदित है कि पं. दीनदयाल उपाध्याय जन्मजात प्रतिभावान् थे किन्तु काल के थपेड़ों ने उन्हें संघर्षों में जीना सिखाया। जन्मोपरांत तीन वर्ष में पिता, सात वर्ष में माता, फिर पालनकर्ता नाना, छोटा भाई, पुनः ममेरी बहन एवं मामा-मामी जी का देहांत हुआ। 25 सितम्बर, 1916 को जन्मे पंडित जी के शिक्षा-ग्रहण के कालखण्ड में उनका सम्पर्क राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ और 1942 में वे संघ के प्रचारक बनकर लखीमपुर (उत्तरप्रदेश) में गए, तत्पश्चात् 1945 में वह सहप्रान्त प्रचारक बनाए गए। इसी बीच 1948 में नेहरू सरकार द्वारा संघ पर गाँधी जी की हत्या का आरोप लगाकर प्रतिबंध लगा दिया गया था, किन्तु जब संघ से प्रतिबंध हटा तो तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोळवळकर ‘श्रीगुरुजी' की प्रेरणा से डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ उन्होंने 21.09.1951 को लखनऊ में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। अक्टूबर, 1952 में भारतीय जनसंघ की अखिल भारतीय बैठक बुलाई गई थी

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