पं. गिरधर शर्मा 'नवरत्न'
September 25, 2019 • ललित शर्मा

पं गिरधर शर्मा 'नवरत्न' हिन्दी साहित्य में द्विवेदी युग के एक ऐसे स्वनामधन्य व्यक्तित्व थे, जो न केवल एक साहित्यकार थे, अपितु एक सिद्धहस्त अनुवादक और हिन्दी के उत्थान में स्वयं को होम कर देने वाले सच्चे राष्ट्रभक्त थे। उनका जन्म 6 जून 1881 ई. को भारत की प्रथम नगरपालिका वाली नगरी झालरापाटन (जिला : झालावाड़-राज.) में हुआ था। वे झालावाड़ राज्य के झाला राज परिवार के राजगुरु थे।

पं. गिरधर शर्मा 'नवरत्न' ने युवावस्था से अपनी मृत्यु के तीन घण्टे पूर्व तक लेखन कर हिन्दी साहित्य का जो सारस्वत भण्डार भरा, वह अनुपमेय है। वे उत्कृष्ट रचनाओं के शिल्पी, सफल अनुवादक और राष्ट्रीय भावनाओं के रूप में द्विवेदी युगीन विद्वानों की श्रेष्ठ परम्परा का प्रतिनिधित्व करते थे। उन्हें हिन्दी साहित्य का 'मिल्टन' कहा जाता है। मिल्टन की भाँति उनकी अपनी 50 वर्ष की आयु में चक्षु ज्योति चली गई थी। शेष 30 वर्ष तक उन्होंने बोलकर साहित्य और राष्ट्रीय काव्यधारा का सृजन किया। विश्व में ऐसी साधना का उदाहरण कहीं-कहीं ही मिलता है। वे अनेक भाषाओं यथा संस्कृत, हिन्दी, उर्दू, फारसी, अरबी, बांगला, अंग्रेजी, मराठी, गुजराती, ब्रज, फेन्च, जर्मन के ज्ञाता थे। उन्होंने मौलिक रचनाओं के अतिरिक्त अनेक अनुवाद भी किये, जो हिन्दी के क्षेत्र में मील के पत्थर साबित हुए है। उन्होंने योगिराज भतृहिरि, महाकवि माघ, रविन्द्रनाथ टैगोर की क्रमशः नीतिशतक, शिशुपाल वध, गीतांजलि व उमर खैय्याम की रूबाईयों के अनुवाद हिन्दी में करके न केवल अनुवाद क्षमता का परिचय दिया, अपितु हिन्दी व अन्य भाषाओं को आपस में निकट लाने की भी पुरजोर कोशिश की। उनके द्वारा उमर खैय्याम की रूबाईयों का संस्कृत में 'अमर सूक्ति सुधाकर' नाम से किये अनुवाद से तो कवि बच्चन ने प्रेरणा ली थी, जिसका प्रमाण यह है कि हिन्दी काव्य के आंगन में प्रथम बार मधुशाला ने हाला के प्याले ढाल-ढाल कर काव्य प्रेमियों को दिये। पं. नवरत्न की इस अनुवाद पुस्तक का तब वास्तविक मूल्य जाना जर्मन संस्कृतज्ञों ने और उस समय उसकी कीमत 1 पाउण्ड होते हुए भी विद्ववानों ने उसे खरीदा। पं. नवरत्न द्वारा गीतांजलि का जो हिन्दी अनुवाद था, वास्तव में वह साहित्य का प्रथम पद्यानुवाद था, जिसे स्वयं टैगोर ने भरतपुर कला से हिन्दी जगत में एक नया मोड़ आ गया था। महाकवि निराला ने पं. नवरत्न को हिन्दी जगत का ऐसा प्रथम कवि माना था, जिन्होंने अतुकांत शैली को जन्म दिया, जिसका प्रमाण 1911 में उनका प्रकाशित खण्ड काव्य 'सावित्री' है।

पं. नवरत्न ने अपने जीवन में मुठ्ठीभर लोगों के लिये नहीं लिखा, अपितु हजारों लोगों के लिये रचा। इसमें हजारों देशवासियों की इच्छायें और सपने समाहित थे। इसलिये उनका सृजन हिन्दी भारती के लिये अनोखे मर मिटने वाले भावों को जाग्रत करता है। पं. नवरत्न ने गुलाम भारत की दुर्दशा को देखकर यह समझा था कि देश को परतन्त्रता से उबारने में हिन्दी का स्थान सर्वोच्च होना आवश्यक है। इसी आशय से उन्होंने देश के अनेक भागों की यात्रायें करके अनेक हिन्दी मंचों, संस्थाओं की स्थापना की व सहयोग दिया ताकि हिन्दी प्रचार कार्य नियमित और निरन्तर होता रहे। पं. नवरत्न का यह विश्वास था कि भारत में ऐसे यह विश्वास था कि भारत में ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना हो जाये, जिसमें प्रत्येक विषय की शिक्षा का माध्यम हिन्दी हो।

1918 में बम्बई में हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय अधिवेशन के अध्यक्ष पं. मदन मोहन मालवीय थे। उसी में पं. नवरत्न ने मंच से ही सिंह गर्जना करते हुए कहा था-"मालवीय जी! दुनियाँ आपको आदर देती है तो दे! लेकिन गिरधर शर्मा से तो आप तभी आदर पायेंगे, जब आप बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय को हिन्दी-विश्वविद्यालय में परिवर्तित कर देंगे।" पं. नवरत्न की इस सिंह गर्जना से उनकी कर्मठता, निडरता और हिन्दी के प्रति अथाह प्रेम का परिचय मिलता है। 1918 ई. में ही दिल्ली में स्थापित प्रथम राजपूताना- मध्य भारत सभा के प्रथम राष्ट्रीय अधिवेशन की अध्यक्षता पं. नवरत्न ने ही की थी, जिसमें उन्होंने देश की जनता को अपना सारा काम हिन्दी में सम्पन्न करने का संदेश दिया था। इस अधिवेशन में तब सेठ जमना लाल बजाज, चांदकरण शारदा और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे स्वतंत्रता के दीवाने मौजूद थे। इससे पूर्व 1915 में बम्बई में पं. नवरत्न कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में राष्ट्रपिता महात्मा गाँधीजी से मिले और विशद चर्चा में उन्होंने गाँधीजी को देश की स्वतंत्रता के लिये हिन्दी अपनाने की सलाह दी और अगले वर्ष ही लखनऊ के कांग्रेस अधिवेशन में देश की राष्ट्रभाषा हिन्दी घोषत कर दी गई।

पं. नवरत्न ने देश में हिन्दी के उत्थान, प्रसार के लिये 1906 में स्वयं के संपादन में 'विद्या-भास्कर' पत्र का प्रकाशन कर इन्दौर से 'वीणा' का आरम्भ करवाया। 1906 में ही उन्होंने चन्द्रधर शर्मा 'गुलेरी' को प्रेरित कर जयपुर में 'साहित्य संसद', 1912 में झालरापाटन में 'राजपूताना हिन्दी साहित्य सभा' व भरतपुर में 'हिन्दी साहित्य समिति', 1914 में इन्दौर में 'मध्य भारत हिन्दी साहित्य समिति' की स्थापना की। देश के कई विश्वविद्यालयों, साहित्य संस्थानों की स्थापना में उन्होंने तन, मन और धन से सहयोग दिया। इस कार्य में उनके सहयोगी था, सेठ बिनोदीराम-बालचन्द (झालरापाटन) का परिवार।

भू-दान प्रणेता विनोबा भावे को उनकी भूदान यात्रा में झालरापाटन आने पर पं. नवरत्न ने अपने परिवार की खस्ता आर्थिक स्थिति की भी परवाह न करते हुए अपने जागीर के चार ग्राम भूदान यज्ञ को समर्पित कर दिये थे। पं. नवरत्न ने हिन्दी भाषा के उत्थान के लिये तत्कालीन भारत की सभी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं, पत्रों में अपनी रचनाओं से क्रान्ति की लौ जगायी थी। हिन्दी को भारत भर में स्थापित करने के लिये उन्होंने अनेक साहित्यकारों से स्वयं सम्पर्क कर उन्हें कलम के संघर्ष द्वारा हिन्दी को स्थापित करने के लिये तैयार किया। पं. नवरत्न की हिन्दी के प्रति अट निष्ठा के कारण आचार्य शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, निराला, दिनकर, पं. सूर्यनारायण व्यास, क.मा. मुंशी जैसे राष्ट्रीय साहित्य साहित्यकारों ने उनकी अपने साहित्य में मुक्तकंठ से प्रशंसा की थी।

पं. नवरत्न ने अपनी अन्यान्य रचनाओं, अनुवादों में तकनीकी तथा प्राचीन पौराणिक गाथाओं पर जहाँ कई पुस्तकें लिखी, वहीं शेक्सपियर, स्कार्ट, फिटराल्ट, गोल्डस्मिथ, बर्डस्वर्थ, टेनिसन की रचनाओं के भी उन्होंने सुन्दर, सटीक हिन्दी काव्यानुवाद किये, जो हिन्दी साहित्य के कंठाहार बने। उन्होंने युवाओं को दिशा निर्देश के लिये जहाँ कठिनाईयों में विद्याभ्यास' पुस्तक लिखी, वहीं नन्हें शिशुओं, बालकों के लिये भी सरल ककहरा, शिशुगीत और अन्य बाल रचनाएँ भी लिखी, जो आज भी प्रासंगिक है। पं. नवरत्न ने अपने जीवनकाल में लगभग 150 ग्रन्थ रचे, जिनमें 125 प्रकाशित- हस्तलिखित रूप में उपलब्ध है। इनमें से तीन चौथाई ग्रन्थ काव्य के है। इनमें खण्ड- काव्य, कविता, संकलन, दोहावलियाँ, नीतिसूक्तिसुधाकर, लम्बी कविताओं का संकलन, प्रकृति सम्बन्धी कविताएँ, नई धारा की रोशनी व स्वच्छन्द शैली की रचनाएं है। उन्होंने अपने चिंतन लेखन में समाज तथा राष्ट्र की कई चेतनाओं को मन से छुआ, जिनमें आत्मोत्सर्ग, जागरण, स्वतन्त्रता, फिरंगियों के प्रति रोष, हिन्दी-भारती का गौरव, प्राचीन आध्यात्मिक नैतिक औदात्य का स्मरण, पतनोन्मुख सांस्कृतिक स्थिति का जीवन्त चित्रण, पाखण्डवाद के विरूद्ध विद्रोह की भावनाएँ, राष्ट्रभाषा रूप में हिन्दी की स्वीकृति, स्त्रियों में नेतिकता की भावना तथा वृद्ध विवाह का विरोध आदि के भाव भी मुखरित हुए है।

पं. नवरत्न की मौलिक कार्य प्रवृतियों में सबसे सशक्त-प्रवृति उनकी राष्ट्रीय काव्यधारा की रही, जो राष्ट्रीय विमुक्ति और राष्ट्रीय गौरव से सम्पन्न थी। उनकी प्रबल मान्यता थी कि 'जब तक वाणी व भाषा की स्वतन्त्रता नहीं होगी, तब तक राष्ट्र की स्वतन्त्रता पूर्ण नहीं होगी। जहाँ स्वभाषा का अपमान और परभाषा का सम्मान होता है, वहाँ के वासी निश्चय ही दास होते है।'

1918 ई. में इन्दौर में आयोजित हिन्दी साहित्य सम्मेलन में जब अध्यक्ष महात्मा गाँधी थे, तब स्वागताध्यक्ष पं. नवरत्न थे। इस सम्मेलन में पं. नवरत्न ने स्वयं के द्वारा रचा राष्ट्रगान सुन्दर स्वर में प्रस्तुत किया था, जो हिन्दी का प्रथम राष्ट्रगान था, जिसमें भारत के सांस्कृतिक वैभव की जीवन्त विवेचना है

यथा

जय-जय प्यारे देश, रम्य हमारे देश।

हग के तारे, जग उजियारे, हिम के प्यारे देश॥

पं. नवरत्न के मन में भारत के लिये असीम भक्तिभाव थे। उन्होंने देश का गुणानुवाद कर भारतीयों की प्रसुप्त अस्मिता को इस प्रकार जगाया था :

सब देश चाकर है भारत के वाह-वाह

एक मात्र सरदार अन्नदाता भारत है।

वे भारत को समृद्धि के ऐसे शिखर पर खड़ा देखना चाहते थे कि विश्व उसके गौरव को निहारा करें। पं. नवरत्न की हिन्दी के प्रति कटिबद्धता और विद्वता से प्रभावित होकर काशी के विद्वान समाज ने उन्हें 'नवरत्न', हिन्दी साहित्य सम्मेलेन प्रयाग ने 'साहित्य वाचस्पति', झालावाड राज्य ने 'विद्या वाचस्पति', सनातन धर्मसभा कलकत्ता ने 'काव्यालंकार', चतुःसम्प्रदाय वैष्णव महासभा पाटलिपुत्र ने 'व्याख्यान भास्कर', मध्य भारत विन्ध्य सभा इन्दौर ने 'विद्या महार्णव' और संस्कृत सभा कलकत्ता एवं कलकत्ता विश्वविद्यालय ने संयुक्त रूप से 'प्राच्य विद्या महार्णव' की उपाधि से अलंकृत कर सम्मानित किया था।

पं. नवरत्न ने राज्याश्रय में रहने के बाद भी कभी राजशाही व फिरंगियों के सामने अपना शीश नहीं झुकाया। उनके जीवन में नेत्र ज्योति का अंधकार, युवा पुत्र की मृत्यु, स्वयं के शरीर का टूटना जैसे प्रकोप आये, लेकिन सभी का उन्होंने अपनी भीष्म प्रतिज्ञा के बल पर डटकर सामना किया, जो उनकी समाधि पर उन्हीं के द्वारा लिखे इस छंद से अभिव्यक्त होता है।

अनुचित सत्ता दशीभूत हो शीश झुकाना,

कायरता का काम सदा जिसने था जाना।

रहा सदा स्वाधीन किया निज मन का चाहा,

दिया सत्य उपदेश उच्चतर चरित निबाहा।

दुःखों से न डिगा न फूला सुख में आकर,

सौता है इस ठोर वही कवि 'गिरधर नागर'

पं. नवरत्न अपनी मृत्यु से तीन घण्टे पूर्व तक भी 'श्रीमद्भागवत' का हिन्दी अनुवाद करने में निमग्न रहे। इस अनुवाद में उन्होंने मूलभाव को जीवित रखा व उसी के मूल छंद का प्रयोग कियाअन्ततः 30 जून 1961 को भारत का यह द्विवेदी युगीन क्रान्तदर्शी साहित्य मनीषी अखण्डानन्द में लीन हो गया। आज देश और हिन्दी भाषा दोनों स्वतन्त्र तो है, परन्तु आवश्यकता है पं. नवरत्न जैसे सच्चे और समर्पित राष्ट्रीय साहित्यकारों की, जो इस विषम घड़ी में समाज और देश को हर मायने में सही किया निर्देश दे सकें।