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नित्य कसरत, स्वस्थ जीवन
June 1, 2016 • Dr. Bharat Singh

आप खाने में कार्बोहाईड्रेट, प्रोटीन, विटामिन, मिनरल, वसायुक्त मैदे से बना भोजन, मसालेयुक्त गरिष्ठ भोजन खूब करते हो तथा दिन में कई बार चाय-कॉफ़ी भी चाहिए। घर से निकलते सवारी चाहिए, शारीरिक सुख के लिए नर्म गद्दे, सोफे तथा वातानुकूलित घर-ऑफिस, गाड़ी सब चाहिए तो भाई यह पौष्टिक, गरिष्ठ, भारी, वसायुक्त भोजन कैसे पचेगा, इसका असर कहाँ दिखेगा? यह तो आपके शरीर में मोटापे के रूप में बढ़ेगा, प्रोटीन, यूरिक एसिड बनकर जोड़ों में एकत्र होकर दर्द करेगा। कुछ दिन बाद मधुमेह लाएगा, फिर उच्च रक्तचाप भी बढ़ेगा, कब्ज़ भी होगा तो फिर बवासीर-भगंदर कहाँ पीछा छोड़ेंगे। पाचन-क्रिया मन्द होगी तो अपच, खट्टी डकारें भी आएँगी। वातरोग भी जोर पकड़ेगा, फिर अन्य बीमारियों का समूह आपके शरीर में प्रवेश कर जाएगा और आपका नाश्ता लंच व डिनर दवाइयों के साथ ही होने लगेगा। अतः आराम छोड़ो, कसरत करो।

शारीरिक श्रम से शरीर पर प्रभाव

आपने कहावत पढ़ी होगी : ‘पान सड़ा क्यों? घोड़ा अड़ा क्यों, रोटी जली क्यों, उत्तर एक है- फेरा न था। आप मोटे क्यों हुए? आपके शरीर में बीमारियाँ क्यों आयीं? आप परेशान क्यों हैं? उत्तर एक ही है शरीर को मोड़ा न था, अर्थात् शरीर से कोई योगासन, व्यायाम नहीं किए। क्या आप जानना चाहते हैं कि योगासन, व्यायाम या कसरत करने से शरीर पर कितना सकारात्मक प्रभाव पड़ता है? तो जानिए :

शारीरिक श्रम से पाचन-प्रणाली पर प्रभाव

जब आप रोज योगासन अथवा शारीरिक व्यायाम करेंगे तो भूख खुलकर लगेगी तथा पाचन-क्रिया सुचारू रूप से चलेगी। आप जो भी खाएँगे, वह शीघ्र पचेगा। इससे रक्त अच्छी तरह बनेगा, पर्याप्त मात्रा में बनेगा, हड्डियाँ मज़बूत होंगी, मांसपेशियाँ सशक्त रहेंगी। अच्छी पाचन-क्रिया से आप कब्ज, गैस, बवासीर, भगन्दर, अपच खट्टी डकारें, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा तथा वातादि रोगों से बचेंगे। शरीर में पाचन-प्रणाली का बहुत बड़ा महत्त्व है, क्योंकि पाचन-क्रिया शरीर का आधार है।

श्रम से रक्तसंचार-प्रणाली पर प्रभाव

शारीरिक श्रम करने से पसीना आता है और शरीर की गन्दगी निकल जाती है। मेहनत करने से रक्तसंचार ठीक से चलता है, कॉलेस्ट्रॉल पिघलकर किडनी के द्वारा निकल जाता है। श्रम करने से नस-नाड़ियाँ साफ रहती हैं, हृदय की आर्टरीज में रूकावट नहीं आती है। ऑक्सीकृत रक्त पूरे शरीर में निर्वहन होकर दौड़ता है। मस्तिष्क को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन मिलती है, अतः मस्तिष्क पूर्ण स्वस्थ रहता है। निम्न रक्तचाप, उच्च रक्तचाप, बुखार, अल्परक्तता आदि से छुटकारा मिलता है।

श्रम से श्वसन संस्थान पर प्रभाव 

शारीरिक श्रम करने से हम थकते हैं तथा तेज श्वास लेते हैं, उससे फेफड़े अधिक खुलते हैं। अधिक श्वास लेने से ऑक्सीजन अधिक जाती है तथा सारी कार्बनडाईऑक्साइड निकल जाती है और रक्त शुद्ध हो जाता है। जो रोज शारीरिक व्यायाम, योगासन, अन्य व्यायाम करते हैं, उन्हें दमा, फोड़े-फुसी, बुखार, सिर दर्द, शारीरिक अल्प दर्द, निम्न रक्तचाप आदि नहीं होते हैं।

मूत्रवाहक तन्त्र पर प्रभाव

जब व्यक्ति कोई भी शारीरिक श्रम करेगा तो प्यास अधिक लगेगी अर्थात् जल का सेवन करेगा। भरपूर जल पीने से रक्त का फिल्ट्रेशन अच्छा होगा तथा शरीर में एकत्रित अवांछित लवण मूत्र द्वारा बाहर निकल जाएँगे।

स्नायुतंत्र पर प्रभाव

जब हम शारीरिक श्रम करेंगे तो स्नायुतंत्र सजग, संवेदनशील तथा क्रियाशील रहेगा। दिमाग जो भी अंगों को आज्ञा देगा, वे अंग सक्रिय होकर कार्य करेंगे। आपका मानसिक बौद्धिक स्तर अच्छा रहेगा।

श्रम से सृजन (प्रजनन) तंत्र पर प्रभाव

शारीरिक श्रम करने से जब पाचन-संस्थान, रक्तसंचार, श्वसन आदि सभी संस्थान सक्रिय और ठीक से कार्य करते हैं तो सृजन के अंग भी सक्रिय सबल एवं प्रखर रहते हैं, तथा स्त्रीपुरुष संसर्ग करने में सक्षम रहते हैं और प्रसन्न रहते हैं। उनकी सन्तानें हृष्ट-पुष्ट पैदा होती हैं। श्रमरहित जीवन से काम के प्रति रुचि कम हो जाती है और सुस्ती रहती है। अतः शारीरिक श्रम करके स्वस्थ रहें तथा अधिक दिनों तक शारीरिक सुख भोग सकते हैं।

शारीरिक श्रम का ज्ञानेन्द्रियों पर प्रभाव

हमारे शरीर में पाँच कर्मेन्द्रियाँ तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ (नाक, कान, आँख, जिल्ला व त्वचा) होती है। जब आप शारीरिक श्रम करेंगे तो पूर्ण स्वस्थ रहेंगे, आपके कान, नाक, आँखें जिल्ला तथा त्वचा सक्रिय स्वस्थ रहेंगे। लम्बे समय तक आपके कान सुनने का काम ठीक से करेंगे, आँखों की नज़र बरकरार रहेगी, नाक की पूँघने की शक्ति ठीक से काम करेगी, जीभ से स्वाद ठीक रहेगा तथा त्वचा से स्पर्श सुख का भोग भोगते रहेंगे। पाँचों इन्द्रियाँ स्वस्थ एवं सक्रिय रहेंगी।

 श्रम से नलिकाविहीन ग्रन्थियों पर प्रभाव

हमारे शरीर में पिट्यूचरी, मिनियल, थॉयराइड, पैराथॉयराइड, थायमुस, अग्नाशय, एड्रीनल तथा वृष्ण। ओवरी ग्रंथियाँ होती हैं जिनका शरीर में बहुत बड़ी भागीदारी है। यह तभी अपनाअपना कार्य सुचारू रूप से करती हैं जब शरीर हृष्ट-पुष्ट हो। रोज शारीरिक श्रम करने से सभी ग्रंथियाँ उचित रूप से सक्रिय होकर द्रव्य का निर्माण तथा निष्कासन, संचालन, तथा नियंत्रण का कार्य ठीक से करती हैं। इन ग्रंथियों में विकार आने से बीमारी पैदा होती है।