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नागालैण्ड की रानी माँ गाइडिब्ल्यू
September 1, 2016 • Vijay Kumar

देश की स्वतन्त्रता के लिए जेल में सहर्ष भीषण यातनाएँ भोगनेवाली " नागालैण्ड की रानी माँ गाइडिन्ल्यू का जन्म 26 जनवरी, 1915 को नागाओं की रांगमेयी जनजाति में हुआ था। केवल 13 वर्ष की अवस्था में ही वह अपने चचेरे भाई जादोनांग से प्रभावित हो गयीं। जादोनांग प्रथम विश्वयुद्ध में लड़ चुके थे। युद्ध के बाद अपने गाँव आकर उन्होंने तीन नागा कबीलोंजेमी, ल्यांगमेयी और रांगमेयी में एकता स्थापित करने हेतु ‘हराका' पंथ की स्थापना की। आगे चलकर ये तीनों सामूहिक रूप से जेलियांगरांग' कहलाये। इसके बाद वे अपने क्षेत्र से अंग्रेजों को भगाने के प्रयास में लग गये।

इससे अंग्रेज़ नाराज़ हो गये। उन्होंने जादोनांग को 29 अगस्त, 1931 को फाँसी दे दी: पर नागाओं ने गाइडिन्ल्यू के नेतृत्व में संघर्ष जारी रखा। अंग्रेजों ने आन्दोलनरत गाँवों पर सामूहिक जुर्माना लगाकर उनकी बन्दूकें रखवा लीं। 17-वर्षीय गाइडिन्ल्यू ने इसका विरोध किया। वह अपनी नागा-संस्कृति को सुरक्षित रखना चाहती थीं। हराका का अर्थ भी शुद्ध एवं पवित्र है। उनके साहस एवं नेतृत्व-क्षमता को देखकर लोग उन्हें देवी मानने लगे।

अब अंग्रेज़ गाइडिन्ल्यू के पीछे पड़ गये। उन्होंने उनके प्रभाव-क्षेत्र के गाँवों में उनके चित्रवाले पोस्टर दीवारों पर चिपकाये तथा उन्हें पकड़वानेवाले को 500 रु. पुरस्कार देने की घोषणा की; पर कोई इस लालच में नहीं आया। अब गाइडिन्ल्यू का प्रभाव उत्तरी मणिपुर, खोनोमा तथा कोहिमा तक फैल गया। नागाओं के अन्य कबीले भी उन्हें अपना नेता मानने लगे।

सन् 1932 में गाइडिन्ल्यू ने पोलोमी गाँव में एक विशाल काष्ठदुर्ग का निर्माण शुरू किया, जिसमें 40,000 योद्धा रह सकें। उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष कर रहे अन्य जनजातीय नेताओं से भी सम्पर्क बढ़ाया। गाइडिन्ल्यू ने अपना खुफिया तन्त्र भी स्थापित कर लिया। इससे उनकी शक्ति बहुत बढ़ गयी। यह देखकर अंग्रेजों ने डिप्टी कमिश्नर जे.पी. मिल्स को उन्हें पकड़ने की जिम्मेदारी दी। उसने अपना खुफिया तंत्र फैलाया और 17 अक्तूबर, 1932 को अचानक गाइडिन्ल्यू के शिविर पर हमला कर उन्हें पकड़ लिया।

गाइडिन्ल्यू को पहले कोहिमा और फिर इम्फाल लाकर मुकदमा चलाया गया। उन पर राजद्रोह के भीषण आरोप लगाकर 14 साल के लिए जेल के सींखचों के पीछे भेज दिया गया। 1937 में जब पंडित नेहरू असम के प्रवास पर आये, तो उन्होंने गाइडिन्ल्यू को ‘नागाओं की रानी' कहकर सम्बोधित किया। तब से यही उनकी उपाधि बन गयी। अपने क्षेत्र के उत्थान को समर्पित रानी माँ ने आजादी के बाद राजनीति के बदले समाजसेवा के मार्ग को चुना।

सन् 1958 में कुछ नागा-संगठनों ने विदेशी मिशनरियों की शह पर नागालैण्ड को भारत से अलग करने का हिंसक आन्दोलन चलाया। रानी माँ को भारत प्राणों से भी प्यारा था। अतः उन्होंने आंदोलन का प्रबल विरोध किया। इस पर वे उनकी जान के दुश्मन हो गये। इस कारण रानी माँ को छह साल तक भूमिगत रहना पड़ा। इसके बाद भी वे शान्ति के प्रयास में लगी रहीं।

सन् 1972 में भारत सरकार ने उन्हें ‘ताम्रपत्र और फिर ‘पद्मभूषण' देकर सम्मानित किया। वे अपने क्षेत्र के ईसाइकरण की विरोधी थीं। अतः वे वनवासी कल्याण आश्रम और 'विश्व हिंदू परिषद् के अनेक सम्मेलनों में गयीं। आजीवन अविवाहित रहकर नागा जाति, हिंदू-धर्म और देश की सेवा करनेवाली रानी माँ गाइडिन्ल्यू ने 17 फरवरी, 1993 को यह शरीर छोड़ दिया।

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