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नयी सम्प्रेषण तकनीकों द्वारा पठन और पुस्तकीय विमुखता
May 1, 2018 • E. Hemant Kumar

व्हाटसएप फ़ेसबुक इटरनेट  ने तथा विभिन्न प्रकार के नेट- ब्राउजर, ई-अख़बार, यूट्यूब, ब्राउजर, ई-अखबार, यूट्यूब, चैटिंग, टेलीफोन-वार्तालाप तथा टेलीविजन-जैसे माध्यम आधुनिक संप्रेषण/पठन-पाठन-श्रवण तकनीकें मानी जाती हैं। इनका विस्तार विगत 20-25 सालों में अत्यधिक तेजी से हुआ है। इनके आगमन से पूर्व पढ़ने-सुनने के नाम पर केवल पुस्तकें, अखबार, पत्रिकाएँ और चिट्ठी भर होती थी, पर इनके लिए लोगों के पास पर्याप्त समय, जिज्ञासा और उत्सुकता रहती थी। इधर नयी तकनीकों के आने से इस ढाँचे में आमूल-चूल परिवर्तन हो गया है।

नयी तकनीकों द्वारा सम्प्रेषण अपेक्षाकृत सुलभ तथा सुविधाजनक है और इनका स्वरूप बहुत ही चित्ताकर्षक, रोचक, एवं मनोरञ्जनपूर्ण है। इससे वर्तमान समय में लोग इनका जरूरत से अधिक प्रयोग कर रहे हैं। दिन के उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण समय का बड़ा हिस्सा इन पर व्यतीत किया जा रहा है। रिटायर्ड तथा संपन्न लोगों को छोड़ दें, तो अन्य लोग इससे कुप्रभावित होते हुए ही माने जाएँगे। इन तकनीकों के प्रयोग से समय की बर्बादी के साथ-साथ व्यक्ति की दिनचर्या, स्वास्थ एवं तथ्यपरक ज्ञानार्जन पर भी बुरा असर पड़ रहा है। अपने रोचक स्वरूप के कारण इन आधुनिक सम्प्रेषण- विधियों पर पढ़ते हुए व्यक्ति को, विज्ञान की कल्पित 'टाइम मशीन' की तरह समय के व्यतीत होने का पता ही नहीं चलता, और एक ही शारीरिक मुद्रा में बैठे हुए घंटों व्यतीत हो जाते हैं। दूरसंचार की विभिन्न सस्ती स्कीमों के चलते लोग रात में सोने के समय पर इनका प्रयोग करने के लिए जाग रहे हैं। इनसे अगले दिन देर से उठने के कारण जैविक घड़ी में बदलाव आने तथा एक ही शारीरिक मुद्रा में बने रहने से अनेक शारीरिक दिक्कतें पैदा हो रही हैं। आँखों के रोग, रीढ़ एवं हाथों की हड्डी-जोड़ों के रोग, देर से जागने के कारण दिन में सुस्ती, पाचन एवं पेट-संबंधी रोग, तथा इलेक्ट्रो- मैग्नेटिक रेडिएशनजनित रोग, तेजी से बढ़ रहे हैं। इनके प्रयोग में धन का अपव्यय तथा मूल व्यवसाय एवं कार्यों में ध्यान का बँटना भी प्रमुख है। आज समाज के ज्यादातर पढ़े- लिखे लोग फेसबुक, व्हाट्सऐप मित्रों तथा ग्रुपों से जुड़े हैं, जिनके द्वारा रोज सैकड़ों सन्देशों का आदान-प्रदान किया जा रहा है। इनमें ज्यादातर मैसेज लाभरहित एवं तथ्यविहीन होते हैं। सुबह जागने के बाद व्यक्ति सभी को पढ़कर प्रत्युत्तर देने का प्रयास करता है। इससे वह अपने मूल कार्यों में समुचित ध्यान नहीं दे पाता। कुछ लोगों में यह लत का रूप भी धारण कर लेती है। विभिन्न स्तर के कामगारों की कार्यकुशलता पर भी इसका नकारात्मक असर दिखने लगा है। ऐसे लोगों में दूरसंचार-माध्यमों के विफल होने पर बेचैनी, निराशा, संयम तथा धैर्य की कमी और चिड़चिड़ापन देखने को मिलता है। इन माध्यमों से बने मित्र संख्या में काफ़ी होते हैं, परंतु व्यावहारिकता के आधार पर वे आभासी होते हैं। ऐसे में जब कभी उनके सहयोग की आवश्यकता पड़ती है, तो वे काम नहीं आते और अवसाद का कारण बनते हैं। इन तकनीकों से सन्देश काफी तेजी से फैल जाते हैं जिनमें से अनेक समाज में आपसी वैमनस्य पैदा करते हैं। ऐसी अवाञ्छित सामग्री पर कोई नियंत्रण नहीं हो पाता। इन तकनीकों के कारण अनेक अप्रिय घटनाएँ, लड़ाई-झगड़ेमुकदमे होने लगे हैं।

उपर्युक्त अनेक विसंगतियों के अलावा इन आधुनिक सम्प्रेषण-तकनीकों के प्रयोग से लोग एक और धीमे, परोक्ष तथा मीठे जहर की चपेट में आ रहे हैं। इसको पुस्तकों से विमुखता के रूप में जाना जा सकता है। विद्यार्थी वर्ग इस मीठे जहर से विशेषकर प्रभावित हो रहा है। आधुनिक सम्प्रेषण-तकनीकों के अत्यधिक उपयोग से पुस्तकों के प्रति विमुखता तेजी से बढ़ रही है। जनसामान्य को छोड़ भी दिया जाए, तो भी विद्यार्थियों के लिए पाठ्यपुस्तकों से विलगाव अत्यधिक घातक है।

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