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नगर-नियोजन का वास्तुविधान और उदयपुट
November 1, 2016 • Dr. Shri Krshana 'Jugnu'

जस्थान में मध्यकाल में जिन । नगरों की बुनियाद रखी गई, उनमें उदयपुर का नाम जगविख्यात है। मेवाड़ की यह राजधानी रहा है। यह पानी की नगरी है, पहाड़ों की पुरी है। पानी यदि यहाँ भूमि में है तो थल पर भी और पहाड़ तो चारों ही ओर है। इसलिए यहाँ पहुँचने के लिए घाटों, नालों के प्राकृतिक रास्ते पार करने होते हैं। इसी कारण 15वीं शती की कुंभलगढ़-प्रशस्ति में मेवाड़ क्षेत्र को विष्णु की नाभि से उत्पन्न ब्रह्मा की तरह बताया गया है। मेवाड़ में गिर्वा नामक क्षेत्र गिरनार जानेवाले रास्ते के रूप में प्रसिद्ध रहा है। इसी गिर्वा की गाँठ पर यह नगर बसाया गया है। महाराणा उदयसिंह को यदि इसके निवेश का श्रेय है। तो महाराणा प्रताप, महाराणा अमरसिंह और महाराणा कर्णसिंह को इसके प्रारंभिक विकास का श्रेय है। अक्षय तृतीया राजस्थान में नगर-निवेश के लिहाज़ से खास तिथि मानी गई है। विक्रम संवत् 1609 में इसी वैशाख शुक्ल तृतीया, युगारंभ तिथि, शनिवार, तदनुसार 15 अप्रैल, 1553 ई. को इस नगर का निवेश किया गया। इस नगर-निवेश में प्राचीन भारतीय स्थापत्यशास्त्र के मूल सिद्धांतों का पूरा ध्यान रखा गया। विश्वास किया जाता है कि इसी कारण यह नगर निरंतर बुलंदियों को छूता रहा है। यह नगर मूलतः पर्याप्त प्रकाश, जलप्रवाह और पर्यावरण पर्याप्त प्रकाश, जलप्रवाह और पर्यावरण के संरक्षण सहित उद्योग-व्यापार की सदैव समृद्धि को ध्यान में रखते हुए निवेशित किया गया है। अक्षांश और रेखांश में यह ध्यान रखा गया था।

सबसे व्यारी और निराली राजधानी

उदयपुर के स्थापत्य की कई विशेषताएँ हैं। जो इसको राजस्थान और भारत ही नहीं, विश्व के अन्य नगरों से अलग करती हैं। राजधानी के रूप में इस नगर का वास्तविक विकास 1568 ई. में चित्तौड़गढ़ पर मुगल-आक्रमण के दौरान हुआ। खासकर राजमहल का निर्माण अबाध रखा गया। निवेश और निर्माण के प्रसंग में यह ज्ञेय है कि मेवाड़ के राजाश्रय में ऐसे शिल्पी समुदाय थे जो उस काल में देशभर में अपने अनुभव और ज्ञानात्मक संपदा के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ थे। ज्ञान-विरासत में वास्तु के सर्वाधिक ग्रन्थ देने का श्रेय इस समुदाय को है।

मेवाड़ के शासकों को यह श्रेय है कि उसके आश्रय में शिल्पियों ने विश्व में सर्वाधिक वास्तु-ग्रन्थों का प्रणयन किया और वास्तु को सर्वोपयोगी मानकर हर दृष्टि से ग्रन्थों की रचना की। इनमें जल- स्थापत्य, प्रासाद-स्थापत्य और दुर्ग- स्थापत्य को प्रमुखता से लिखा गया है। सोमपुरा शिल्पी समुदाय के शिल्पीवर्य और सूत्रधार मण्डन के प्रपौत्र राजा भारद्वाज ने इस नगर के निवेश में इस शिल्प-निर्देश का ध्यान रखा कि राजप्रासाद के पश्चिम में जलाशय हो। महाराणा लाखा के काल में इस नगर में पीछोला झील का निर्माण हो चुका था। इस पीछोला के पूर्व में महलों की नींव रखी गई। वास्तुशास्त्र कहता है। कि जहाँ पश्चिम में जलाशय हो,

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