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द्यूतक्रीडा : इतिहास के झटोखे से
January 1, 2018 • Ravindranath Upadhyay

द्यूतक्रीडा या जुए के खेल के बारे में बिना किसी संशय के कहा जा सकता है कि यह मानवजाति का प्राचीनतम खेल है। इससे अधिक मनोरंजक और रोमांचकारी खेल जो राजा को रंक और रंक को राजा बना दे, जिसके द्वारा चातुर्य, कौशल, सतर्कता, धैर्य, प्रत्युत्पन्नमति और छल से प्रतिपक्षी को परास्त करके उसका सर्वस्व हरण किया जा सके, दूसरा नहीं है। पश्चिम में छूत-क्रीड़ा

पाश्चात्य इतिहासकारों का मानना है कि मेसोपोटामिया से छह फलकवाला पाँसा प्राप्त हुआ है जो लगभग 300 ई.पू. का है और इसी काल का मिस्र के काहिरा से एक टैबलेट मिला है जिसपर यह कथा उत्कीर्ण है कि रात्रि के देवता थोथ ने चन्द्रमा के साथ जुआ खेलकर 5 दिन जीत लिया जिसके कारण 360 दिनों के वर्ष में 5 दिन और जुड़ गए। इतिहासकारों के अनुसार चीनी सम्राट् याओके काल में कौड़ियों का एक खेल होता था जिसमें दर्शक बाजी लगाकर जीतते-हारते थे। यूनानी कवि और नाटककार सोफोक्लीज़ का दावा है कि पाँसे की खोज ट्रॉय के युद्ध के समय हुई थी। यह कथन संदेहास्पद है, क्योंकि इस लेख में यह सप्रमाण दिखाया जा चुका है इस विद्या की जन्मस्थली भारतवर्ष है। यह अकेला देश है जहाँ द्यूत-क्रीड़ा को कलाओं में न केवल आदरणीय स्थान दिया गया बल्कि इसका पूरा शास्त्र विकसित किया गया।

ऋग्वेद में छूत-क्रीड़ा 

इन बेईमान इतिहासकारों ने संसार के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद के दशम मण्डल में ‘जुआड़ी का प्रलाप' के सूक्त से जान- बूझकर आँखें मूंद लीं, जबकि ऋग्वेद का अनुवाद राल्फ टी.एच. ग्रिफिथ ने बहुत पहले कर दिया था। अब यह किसी से छिपा नहीं रह गया है कि ऋग्वेद की रचना सरस्वती नदी के लुप्त होने के कम-से-कम एक हजार वर्ष पहले से होती रही और जब उसमें जुआड़ी के पश्चात्ताप का ऐसा काव्यात्मक वर्णन है, तो फिर भारत में यह क्रीड़ा ऋग्वेद की रचना के भी कई सौ वर्ष पूर्व प्रारम्भ हो चुकी होगी। इससे सिद्ध है कि मानवजाति के मन को प्रफुल्लित, रोमाञ्चित और व्यथित करनेवाली इस चूत-क्रीड़ा की जन्मस्थली भारत की ही पवित्र भूमि है और इस खेल की शुरूआत 400-4500 ई.पू. में ज़रूर हो चुकी होगी। ऋग्वेद के इस प्रसिद्ध सूक्त के कुछ अंश इस प्रकार हैं- 'मैं अनेक बार चाहता हूँ कि अब जुआ नहीं खेलूंगा। यह विचार करके मैं जुआरियों का साथ छोड़ देता हूँ, परंतु चौसर पर फैले पाँसों को देखते ही मेरा मन ललच उठता है और मैं जुआरियों के स्थान की ओर खिंचा चला जाता हूँ। ...जुआ खेलनेवाले व्यक्ति की सास उसे कोसती है और उसकी सुन्दर भार्या भी उसे त्याग देती है। जुआरी का पुत्र भी मारा-मारा फिरता है जिसके कारण जुआरी की पत्नी और भी चिन्तातुर रहती है। जुआरी को कोई फूटी कौड़ी भी उधार नहीं देता।

जैसे बूढ़े घोड़े को कोई लेना नहीं चाहता, वैसे ही जुआरी को कोई पास बैठाना नहीं चाहता। ...जो जुआरी प्रातःकाल अश्वारूढ़ होकर आता है, सायंकाल उसके शरीर पर वस्त्र भी नहीं रहता। ...जब अक्षों (पाँसों) की चाल खराब हो जाती है, तब उस जुआरी की भार्या भी उत्तम कर्मवाली नहीं रहती। जुआरी के माता-पिता और भाई भी उसे न पहचानने का ढंग अपनाते हुए उसे पकड़वा देते हैं।...हे अक्षो (पाँसो)! हमको अपना मित्र मानकर हमारा कल्याण करो। हम पर अपना विपरीत प्रभाव मत डालो। तुम्हारा क्रोध हमारे शत्रुओं पर हो, वही तुम्हारे चंगुल में फंसे रहें।

ऋग्वेद के ऋषि कहते हैं- 'हे जुआरी! जुआ खेलना छोड़कर खेती करो और उससे जो लाभ हो, उसी से संतुष्ट रहो!'

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