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देवगढ़ की चन्देल-वंशावली के ऐतिहासिक स्रोत
December 1, 2017 • Pdhahini Sveta Singh

इतिहास-लेखन की दृष्टि से वंशावली का अत्यधिक महत्त्व है। वंशावली-लेखक पौराणिक आख्यान, साहित्येतिहास, शिलालेख, ताम्रपत्र, दानपत्र, तीर्थ-पुरोहितों की परम्परागत बहियों, सनद, प्राचीन अभिलेख, सरकारी कागजात, मुकद्दमों के फैसले एवं बहुज्ञ बुजुर्गों के साक्षात्कार आदि के आधार पर प्रामाणिक वंशावली का निर्माण करता है। किसी भी राज्य, राजा अथवा राजवंश के स्थायी यश का निर्माता उस राजवंश के आश्रय में रहनेवाला कवि ही होता है। आज पूरे भारत में सोनभद्र के एक छोटे-से गाँव देवगढ़ की जो प्रतिष्ठा है, उसमें सबसे बड़ा योगदान भारत के महिमान्वित कवीश्वरों का है। अगोरी-बड़हर राज्य से निर्गत तालुका देवगढ़ की स्थापना अगोरीबड़हर के सोलहवें चन्देल-शासक राजा लाल शाह जू देव के द्वितीय पुत्र महाराजकुमार बाबू गजराज सिंह जूदेव ने सन् 1690 ई. में की थी। महाराजकुमार बाबू गजराज सिंह जूदेव का विशाल वंश देवगढ़ में अद्यावधि विद्यमान है। देवगढ़ के चन्देल-परिवार की वंशावली का विस्तार सोलह पीढ़ी तक हुआ है। संयोग से देवगढ़ तालुका से सम्बन्धित अनेक ऐतिहासिक एवं साहित्यिक दस्तावेज उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर देवगढ़ के चन्देल- परिवार में सुरक्षित वंशावली स्वतः प्रामाणिक सिद्ध होती है। देवगढ़ तालुका का सर्वप्रथम उल्लेख नेपाली और संस्कृत के कवि कृत ‘श्रीमल्लवंशार्णवः' में हुआ है। पण्डित शक्तिवल्ला अज्र्याल नेपाली साहित्य के आदिकवि पण्डित उदयानन्द अज्र्याल के पितृव्य थे। शक्तिवल्लभ अज्र्याल को कान्तिपुर के अन्तिम मल्लनरेश ज्योतिप्रकाश मल्ल (1746-1750 ई.) एवं गोरखा-राजवंश के संस्थापक राजा पृथ्वीनारायण शाह (1742-1775 ई.) के दरबारी कवि होने का सौभाग्य प्राप्त था। राजा ज्योतिप्रकाश मल्ल के राजकवि के रूप में पण्डित शक्तिवल्लभ अज्र्याल ने संस्कृत-भाषा श्रीमल्लवंशार्णवः नामक काव्येतिहासग्रन्थ का प्रणयन किया है। महाकवि कल्हण कृत राजतरंगिणी की तरह नेपाल के मल्ल-राजवंश का ऐतिह्यवृत्त प्रस्तुत करनेवाले श्रीमल्लवंशार्णवः के सप्तम सोपान में देवगढ़ के प्रथम तालुकेदार महाराजकुमार बाबू गजराज सिंह, अगोरीबड़हर नरेश फतहबहादुर शाह एवं बरदी नरेश रावरत्न सिंह देव की सपरिवार भगवान् पशुपतिनाथ के दर्शनपूजन सम्बन्धी तीर्थ-यात्रा की वर-यात्रा में परिणति की कथा 28 श्लोकों में निबद्ध है। प्रारम्भ में भारत का परिचय तत्पश्चात् अगोरी, बरदी और देवगढ़ का उल्लेख है

धन्यो भारतदेशोऽयं धन्या भारत भारती।।

भूमिपालाश्च ते धन्या येषां पुत्र समाः प्रजाः॥

तेषु राज्येषु विख्याता अगोरी बरदी तथा।

देवगढ़ विशिष्टा हि तत्समा राजते क्षितौ॥

-श्रीमल्लवंशार्णवः, 7.10-11

उपर्युक्त श्लोक से स्पष्ट है कि उस समय अगोरी-बड़हर राज्य और बरदी राज्य की सुप्रसिद्ध ऐतिहासिक मेदिनी पर देवगढ़ अपनी विशिष्टता के लिए विख्यात था। पारिवारिक रिश्ते की दृष्टि से जिस समय कान्तिपुर (काठमाण्डू) की तीर्थ-यात्रा सम्पन्न हुई, उस समय के अगोरी-बड़हर नरेश राजा फतहबहादुर शाह और बरदीनरेश राजा रावरत्न सिंह देव देवगढ़ के संस्थापक तालुकेदार महाराजकुमार बाबू गजराज सिंह के भ्रातृज थे। कान्तिपुरी की तीर्थ-यात्रा में काका की हैसियत से सहभाग करनेवाले बाबू गजराज सिंह उस तीर्थ-यात्रा के संरक्षक भी थे। अगोरी, बरदी और देवगढ़ के मध्य आपसी सौमनस्य सदैव रहा है

त्रयाणामपि राज्यानां प्रीतिराशीदनुत्तमा।

सर्वत्र सौख्य सम्पन्ना प्रजास्यादिति सम्मतिः॥

–श्रीमल्लवंशार्णवः, 7.12 

ईश्वरानुग्रह से कान्तिपुर की तीर्थ-यात्रा निश्चित हुई। पण्डित शक्तिवल्लभ अज्र्याल कृत श्रीमल्लवंशार्णवः के अनुसार सन् 1712 ई. में बरदी (मध्यप्रदेश) के राजा रावरत्न सिंह देव, बरदी के युवराज कुँवर हृदय शाह, अगोरी-बड़हर (उत्तरप्रदेश) के राजा फतहबहादुर शाह, अगोरी-बड़हर के युवराज कुँवर शंकर शाह एवं देवगढ़ के ताल्लुकेदार महाराजकुमार बाबू गजराज सिंह अपने चिरंजीव पुत्रों- कुँवर मलखन सिंह और कुँवर दलखम्भन सिंह के साथ भगवान् पशुपतिनाथ का दर्शन पूजन करने हेतु कान्तिपुर (काष्ठमण्डप) गये

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