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दृश्य जनसंचार माध्यमों में हिन्दी :
September 25, 2019 • डॉ. अयज शर्मा

आज हिन्दी जिस प्रकार सम्पर्क भाषा के रूप में अपना स्थान बनाती दिख रही है, वह शुभ संकेत है। हिन्दी के इस सामाजिक जुड़ाव का श्रेय हम सीधे-सीधे संचार माध्यमों को दे सकते हैं। हिन्दी संचार माध्यमों ने इसे सहज बनाए रखा और इसके सामाजिक सरोकार को टूटने नहीं दिए। हिन्दी और संचार माध्यमों का परस्पर संबंध ठीक वैसा ही है, जैसे एक गाड़ी को चलाने वाले दो बैलों का होता है। संचार के संवाहक का माध्यम आदि हिन्दी है तो हिन्दी का संवाहक संचार माध्यम।

त्येक काल अथवा युग में दो स्तरों वाली भाषा चलन में रही है। एक परिनिष्ठित भाषा जो साहित्य सृजन की मान्य भाषा रही तथा दूसरी जनभाषा जो जनसंचार, लोकाचार अथवा लोक स्वीकृत भाषा रही है। यूँ कहें कि जनसामान्य के बोलने-समझने और वैचारिक संप्रेषण की भाषा रही है। एक समय संस्कृत, साहित्य सृजन के साथ- साथ लोकाचार की भाषा भी रही थी। उस काल में सूजन की भाषा और लोकाचार में भाषा में वही अंतर बना रहा जो आज हिन्दी के परिनिष्ठ और लोकाचार स्वरूप में हम देख सकते हैं। हिन्दी की सूझ-बूझ ने उसका जुड़ाव समाज के सामान्य जन तक बनाए रखा है, वह संस्कृतनिष्ठ होकर भी लोकनिष्ठ है यह लोकनिष्ठता ही उसके प्रसार का संबल है। आज हिन्दी जिस प्रकार सम्पर्क भाषा के रूप में अपना स्थान बनाती दिख रही है, वह शुभ संकेत है। हिन्दी के इस सामाजिक जुड़ाव का श्रेय हम सीधे-सीधे संचार माध्यमों को दे सकते हैं। हिन्दी संचार माध्यमों ने इसे सहज बनाए रखा और इसके सामाजिक सरोकार को टूटने नहीं दिए। हिन्दी और संचार माध्यमों का परस्पर संबंध ठीक वैसा ही है, जैसे एक गाड़ी को चलाने वाले दो लों का होता है। संचार के संवाहक का माध्यम आदि हिन्दी है तो हिन्दी का संवाहक संचार माध्यम। हिन्दी आज भार नहीं संस्कार और सरोकार भी मौजूद है। हिन्दी संचार माध्यमों ने विशेषकर दृश्य-जनसंचार माध्यमों ने हिन्दी की जो दिशा निर्धारित की है वह उसे विश्व की एक सम्पर्क भाषा बनाने के लक्ष्य तक पहुँच पाने में सहायक बनेगी ऐसा विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है। आज हिन्दी भाषा, अंग्रेजी की संप्रभुता को चुनौती देती हुई तथा अपनी दशा और दिशा को प्रमाणित करती हुई, सामाजिक ही नहीं, राजनैतिक सरोकारों की प्रमुख भाषा के रूप में पूरे भारत में बल्कि समूचे विश्व में अपना सम्मानजनक स्थान निर्धारित करती दिख रही है, उसका सीधा-साधा श्रेय हिन्दी संचार माध्यमों को ही जाता है।

दृश्य जनसंचार माध्यमों में जिस हिन्दी को प्रयुक्त किया जाता है, वह हिन्दी, दैनिक हिन्दी के कुछ करीब होती है, ताकि आज जनता से सीधा जुड़ा जा सके। दृश्यजनसंचार माध्यमों में जिस हिन्दी का प्रयोग किया जाता है, विशेषकर दूरदर्शन के संदर्भ में, उसमें स्पष्टता, प्रांजलता, शुद्धता, लयात्मकता का होना अत्यंत आवश्यक होता है क्योंकि दूरदर्शन में चित्रात्मकता होती है, अर्थात् चित्रों के अनुरूप ही श्रोता को प्रस्तुतीकरण देना होता है। आजकल दृश्य जनसंचार माध्यमों में हिन्दी का प्रयोग दिनो-दिन बढ़ता जा रहा है। दृश्य जनसंचार माध्यमों में जिस हिन्दी का प्रयोग होता है, वह चिरपरिचित, सरल, नाटकीय होती है, उसे खिचड़ी हिन्दी भी कहा जाता है। रेडियो और फिल्मों में भी हिन्दी को प्रमुखता दी जाती है, क्योंकि हिन्दी शिक्षित व अशिक्षित दोनों ही वर्गों की पहली पसंद होती है और दोनों ही वर्गों के लोगों को यह आकर्षित भी करती है। रेडियो में भी जितने कार्यक्रमों को प्रसारित किया जाता है, उसमें हिन्दी और मुख्य तौर आम जनता से परिचित रोजमर्रा की हिन्दी को विशेष महत्व दिया जाता है इस प्रकार दृश्य जनसंचार माध्यमों में हिन्दी का स्तर ऊँचा है और इन माध्यमों में हिन्दी का प्रयोग अपने चरम पर है।

दृश्य-जनसंचार माध्यमों में हिन्दी का प्रयोग कोई नई बात नहीं है। परन्तु स्वतंत्रता के बाद हिन्दी भाषा का प्रयोग प्रत्येक क्षेत्र में दिनों-दिन बढ़ता ही जा रहा है, इसके पीछे मूल कारण है हिन्दी के प्रति जनमानस का बढ़ता राष्ट्रप्रेम। इन माध्यमों में हिन्दी के प्रयोग पर आज विशेष बल इसलिये दिया जा रहा है, क्योंकि दृश्य-जनसंचार माध्यम आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति के लिये एक जरूरत बन गए हैं और इन माध्यमों में प्रत्येक कार्यक्रमों विज्ञापनों में हिन्दी का ही उपयोग हो रहा है इनका लक्ष्य है कि कार्यक्रमों और विज्ञापनों से अधिक से अधिक लोगों को जोड़ा जा सके और इनका उद्देश्य पूर्ण हो सके। अब यह पूर्ण रूपेण स्पष्ट हो गया कि दृश्य-जनसंचार माध्यमों में हिन्दी एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है आज के युग में यदि थोड़े ही समय में सफलता प्राप्त करनी है तो अपनी क्षेत्रीय व राजभाषा (हिन्दी) को अपनी सफलता की सर्वप्रथम सीढ़ी बनाना पड़ेगा। आज दूरदर्शन, रेडियो, प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रानिक मीडिया जनसंचार के माध्यमों एक सरल, सुबोध, स्पष्ट हिन्दी का प्रयोग कर रहे हैं। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि आज के समय में दृश्य हो या श्रव्य, सभी माध्यमों में हिन्दी को अंग्रेजी की अपेक्षा विशेष स्थान दिया जा रहा है। अगर यही प्रक्रिया निरंतर चलती रही तो वह दिन दूर नहीं, जब हमारी इस राजभाषा व राष्ट्रभाषा को एक अंतरर्राष्ट्रीय भाषा का दर्जा मिल जायेगा और हम गर्व से कह सकेंगे कि हिन्दी हमारी मातृभाषा, राजभाषा, राष्ट्रभाषा है और यह हमारी संस्कृति व सभ्यता को एक निश्चित आयाम प्रदान कर रही हैं, इस प्रकार दृश्य-जनसंचार माध्यमों के अतिरिक्त भी हिन्दी का विस्तार हो रहा है और हमें इस दिशा में विस्तार को पूर्ण सहयोग देकर हिन्दी के विकास को दिनों-दिन बढ़ाना चाहिये।

वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जनसंचार माध्यमों की सामाजिक परिवेश में महती आवश्यकता है। जनसंचार से आशय है कि जब किसी यांत्रिक प्रणाली से संदेश को कई गुना बढ़ा दिया जाता है। तथा उस संदेश को बड़ी संख्या में लोगों तक सम्प्रेषित किया जाता है, उसे जनसंचार कहा जाता है। जनसंचार के माध्यम से जनमत का निर्माण भी सहज संभव हो जाता है। हिन्दी जनसंचार माध्यमों के द्वारा समाज में बहुउद्देशीय सूचनाओं का प्रसारण बड़ी तीव्र गति से संभव हो जाता है। जनसंचार के विकास ने भौगोलिक एवं समय की सीमा को भी तोड़ दिया है। इसी के फलस्वरूप ग्लोबल-विलेज की परिकल्पना साकार हो रही है।

प्रोद्योगिकी के विकास के साथ-साथ इसमें नयी-नयी तकनीकों का प्रचलन हुआ है। विज्ञापन एवं ब्राह्म प्रचार आज के युग की अनिवार्य इकाई है। इसके लिये अखबार, रेडियो, फिल्म, टेलीविजन तो है ही इसके अतिरिक्त होर्डिंग, पोस्टर, इश्तहार, दीवार लेखन, हेंडबिल, ब्रोशर, लघु पुस्तिकाएँ, नाटक, गाना, भजन, मुनादी, कठपुतली, मेले, प्रदर्शनी, सर्कस आदि द्वारा भी विचारों को विज्ञाप्त किया जाता है। विज्ञापन लिखित, चित्रात्मक एवं मौखिक भी होते हैं, इसके लिये सबसे अधिक उपयुक्त स्थान मेले, प्रदर्शनी, बाजार, सिनेमाघर, चौक-चौराहे, यातायात वाले क्षेत्र होते हैं। होडिंग बड़े आकार का प्रदर्शन बोर्ड होता है जिस पर आकर्षक चित्र के साथ संदेश बना होता है। यह मुख्य स्थान पर लगा होता है, जहाँ लोग आसानी से इसे देख सके। प्रसिद्ध जनसंचार माध्यमों में हिन्दी आज कई भाषाओं से प्राभावित है। विशुद्ध हिन्दी बहुत कम माध्यमों में हिन्दी की विकास यात्रा सुदीर्घ है। हिन्दी के इस देश में जहाँ की जनता गाँवों में बसती है, हिन्दी ही अधिकांश लोग बोलते, समझते हैं। इन माध्यमों से हिन्दी विकसित एवं प्रचारित हुई है। ध्वनि संरचना, आदि के कुछ मानक प्रयोग, कुछ पारंपरिक प्रयोग इन दृश्य-जनसंचार माध्यमों में है। कुछ हिन्दीतर शब्दों के मिलने से मिश्रित शब्द, वाक्य आदि प्रसारित होते हैं। फैशन, विचार, गीत-संगीत प्रतियोगिता, मास कल्वर एवं जन माध्यम में हिन्दी आज सर्वव्याप्त हो चुकी है। हिन्दी के विकास में सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं का बहुत बड़ा योगदान है। शासन, न्याय, शिक्षा वैदेशिक संपर्क आदि ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें हिन्दी का प्रयोग एवं इसका प्रसार सरकारी स्तर पर ही हो सकता है। गैर सरकारी माध्यमों से भी हिन्दी का प्रसार-प्रचार हुआ है और हो रहा है। खड़ी बोली में आज जो हिन्दी के विविध रूप हम दृश्य एवं श्रव्य माध्यमों में देखते-सुनते या पढ़ते हैं, उनमें सरलता-जटिलता दोनों है। जनसंचार के लिये सरलता एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण सूत्र है।

नये विश्व की नई संरचना में आधुनिक जनसंचार माध्यमों का सीधा हस्तक्षेप है। आज का युग भूमंडलीकरण जनसंचार का युग है और युग में उचित जनसंचार नीति को अपनाने की आवश्यकता है। वर्तमान के इस बदलते परिवेश में हर पल बदलते विश्व परिदृश्य को देखें तो पता चलता है कि संचार माध्यमों एवं प्रौद्योगिकी के स्रोतों ने आज पूरे विश्व को ग्लोबल विलेज की परिकल्पना से साकार कर दिया है। संचार माध्यमों ने दुनियाँ को छोटा कर दिया है। आज हर घटना और उनसे जुड़ा हर पहलू हर क्षण हमारे चिंतन को जोड़ता और तोड़ता नजर आ रहा है। आज जनसंचार के जितने माध्यम हैं उतने ही हिन्दी के रूप हैं- संस्कृतनिष्ठ हिन्दी, साहित्यिक हिन्दी, प्रयोजनमूलक हिन्दी, अवधी, बघेली एवं मालवी मिश्रित हिन्दी एवं भारतीय-विदेशी भाषाओं से संबंधित हिन्दुस्तानी हिन्दी। हिन्दी के सम्मुख लिपि संबंधी जो प्रमुख चुनौतियाँ हैं। जैसे कर्ता के लिए विभक्ति के चिन्ह को जोड़कर नहीं लिखेंगे किन्तु सर्वनाम को हमेशा विभक्ति के साथ जोड़कर लिखा जाये। फुलस्टॉप वहीं लगाया जायेगा जहाँ वाक्य स्वाभाविक रूप से खत्म हो। 

हर क्रान्ति में अपनी चुनौतियाँ और अवसर निहित होते हैं। सूचना और संचार क्रांति महज एक तकनीकी प्रगति न होकर एक व्यापक प्रभाव वाली घटना है। यह सच्चे अर्थों में क्रांति है जो अब तक की सभी क्रांतियों से ज्यादा प्रभावशाली सिद्ध हो रही है और होगी। हमारे समाज और जीवन का कोई पक्ष इससे अछूता नहीं रहता है। भाषा इसका अपवाद नहीं है इस दौर में हिन्दी के सामने अवसर भी हैं और चुनौतियाँ भी हैं। भाषा के लिये अब कोई सीमा नहीं रह गई है, न भोगोलिक न तकनीकी मंच की न पढ़ने वालों-सुनने वालों की। बहुत कम खर्च में और बड़ी आसानी से आप अपनी वेबसाइट बना सकते हैं। आप हर मंच पर अपनी भाषा में अपनी बात रख सकते हैं, जो सबके लिये खुला है वो चाहे बीबीसी हो या बीओए। आपकी बात को सही भाषा में रखने के लिये, आपकी मदद करने के लिए स्पेल चेकर (वर्तनी परीक्षक) है। सही और प्रभावी लायब्रेरी आपको एक क्लिक पर उपलब्ध है। दुनियाँ भर के संदर्भ, रुझान, अनुवाद और समाधान हैं। आपको अपनी रुचि का ऐसा समुदाय खोजने में कोई परेशानी नहीं होगी, जो आपकी मदद कर सकता है।

अपनी बात रखने के लिए आप अपना ब्लॉग शुरु कर सकते हैं और लोगों को उसमें शामिल कर सकते हैं। इंटरनेट के अलावा इलेक्ट्रानिक मीडिया भी एक बड़ा मंच है। यहाँ भी भाषा के साथ बड़े तजुर्बे किए जा रहे हैं। तकनीक ने भाषा की यहाँ भी मदद की है इसकी पहुँच बहुत बढ़ी है। भारतीय भाषाओं के मीडिया ने चमत्कृत कर देने वाली तरक्की की है। यह अच्छी खासी संख्या में रोजगार की संभावना वाला क्षेत्र है।

इस दौर के सकारात्मक नजरिये से देखें तो हिन्दी के प्रभाव और प्रसार का यह स्वर्णिम अवसर है। इसके लिये प्रयास हिन्दी वालों को ही करने होंगे यह सबसे जरूरी है। खुले दिमाग से भाषा के विकास के अवसरों का स्वागत करना। भाषा अपनी पहचान और विशिष्टता बनाए रखकर भी सर्वसमावेशी बन सकती है और विकास कर सकती है। अंग्रेजी से हमें यह सीखना है, अपने प्रभाव विस्तार के लिए इसे कोई भी शब्द अपनाने से परहेज नहीं है। हमारे गुरु और क्षत्रप जैसे न जाने कितने शब्द बड़े सम्मान के साथ अंग्रेजी में प्रतिष्ठित हैं, लेकिन परंपरा के नाम पर उन्होंने पीयूटी पुट और बीयूटी बट को अभी तक नहीं बदला है। यही वजह है कि स्वरूप और संरचना में निहायत अवैज्ञानिक होते हुए भी इसका क्षेत्र इतना व्यापक है। आशय यह है कि हम नए दौर की आवश्यकताओं के अनुरूप अपनी भाषा और रवैये में लचीलापन लाएँ और इसकी पहचान बनाए रखने के प्रति भी सचेत रहें। जो ध्वनियाँ, संकेत, गुण और अनन्य विशेषताएँ इसे इसका स्वरूप देती हैं, उन्हें बनाए रखें। मेरा अपना अनुभव है कि यह काम मुश्किल नहीं है। जब इसकी पवित्रता और पहचान निहायत ही शुष्क तकनीकी मंच पर बनाए रखी जा सकती हैं तो शेष मंच तो इसके अपने हैं।

___आकाशवाणी और दूरदर्शन के माध्यम से हिन्दी का विविध रूप में विस्तार हुआ, उसके कितने विशिष्ट और सामान्य आयाम है उनकी पहचान हुई है। अभिजात्य हिन्दी से जन हिन्दी तक का रूप उपलब्ध हुआ है। रामायण और महाभारत ने हिन्दी के सांस्कृतिक और मिथकीय रूप से परीचित कराया है, जिसका मूल संस्कृत से मिलता है। आम आदमी का इस विशिष्ट भाषिक रूप से सरोकार हुआ हैं। जनसंचार माध्यमों में हिन्दी के संतुलित प्रयोग की आज बहुत आवश्यकता है। आज बहुभाषा वाले इस देश में संप्रेषण और संपर्क का माध्यम हिन्दी ही हो सकती है, उसका जो भी रूप विकसित हो। यह आकाशवाणी और दूरदर्शन ने प्रमाणित कर दिया है कि यदि यह यहाँ के लोगों को स्वीकार न होती तो लोकतंत्र में इसका प्रयोग इतना अधिक नहीं हो पाता। यह सारे देश के लिए उपयुक्त होगा। यदि हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं का शिक्षण, प्रशासन तथा व्यवसाय के क्षेत्र में शीघ्र ही अपना लिया जाये। दूरदर्शन पर विज्ञापनों के प्रसारण ने यह सिद्ध कर दिया है कि हिन्दी ही लोगों की बात लोगों तक ले जा सकती है। राजनैतिक और प्रशासकीय अधिक दिनों तक अंग्रेजी के प्रभुत्व को बचाए नहीं रख सकते। उसे हिन्दी को और भारतीय भाषाओं को सभी स्तरों पर अपनाना ही होगा, इसका कोई विकल्प नहीं है। साम्प्रत कालखण्ड को सूचना विस्फोट का समय माना जाता है। क्योंकि जनसंचार सुविधाओं ने मानव मात्र को इतना सूचना सम्पत्र बना दिया है, जितना पहले कभी नहीं था। दृश्य माध्यमों ने हमें सूचना की एक अपूर्व विरासत सौंपी है। इकीसवीं सदी के दरवाजे के चौखट पर खड़ी हिन्दी भाषा ने सूचना विस्फोट की विविध चुनौतियों को संपूर्ण क्षमता और सक्रियता के साथ अपना लिया है। अतएव यह स्वाभाविक है कि जनसंचार के भिन्न-भिन्न साधनों के द्वारा हिन्दी की प्रवृतियाँ, प्रचार-प्रसार, वक्त के साथ प्रगति के पथ पर अग्रसर है।

वर्तमान विश्व के बदलते परिवेश में संचार माध्यमों एवं जनमाध्यमों की भूमिका प्रमुख बन गई है। आज प्रत्येक राज्य, देश और विश्व की संस्कृति भिन्न-भिन्न होकर भी समूह की संस्कृति होकर रह गयी है। लोकवादी संस्कृति का अनुभव आज विश्व कर रहा है इसका प्रभाव केवल विश्व की राजनीति, अर्थव्यवस्था पर ही नहीं पड़ रहा, बल्कि संस्कृति एवं भाषा पर भी पड़ रहा है, क्योंकि संचार माध्यम विशेषकर दृश्य माध्यम इसमें अहं भूमिका निभा रहे हैं। जनसंचार के जितने भी माध्यम है सभी पर इसका प्रभाव देखा जा रहा है। विज्ञान एवं तकनीकी शिक्षा ने तो इन माध्यमों में तहलका मचा दिया है। जिन अनुभवों से हम कभी गुजरे नहीं वे सामने आ रहे हैं। विश्व उसको अपनाता जा रहा है और हम एक नयी प्रगति की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आर्थिक उदारीकरण एवं भूमण्डलीकरण ने सबको मिश्र संस्कृति, मास कल्वर और मिश्र भाषा में रहने को बाध्य कर दिया है। सांस्कृतिक वैविध्य और आनंद को एकरस बनाने का कार्य लोकवादी संस्कृति कर रही है और जनसंचार माध्यम ही प्रबल भूमिका निभा रहा है। भाषा का नया प्रायोजनिक संदर्भ बखूबी देखने को मिल रहा है। इसीलिये हिन्दी भाषा का और विश्व का मानव हिन्दी भाषा का भले नया अनुवाद करता रहा है, लेकिन अर्थ न जानते हुए भी हिन्दी भाषा का प्रयोग करना सीख गया है। आज अशिक्षित मानव समुदाय भी व्याकरणगत या भाषागत ज्ञान होने पर भी कई तकनीकी शब्द सुनकर अर्थ तक ग्रहण करने लगा है। आज का जनसंचार बहुआयामी हो गया है। इसी से आज सभी लाभ उठा रहे हैं। हिन्दी भाषा का उपयोग अब केवल कविता, नाटक, उपन्यास, कहानी एवं संगीत में ही नहीं, बल्कि देश-विदेश की कई कानूनी या गैर-कानूनी आदि विभिन्न क्षेत्रों में हिन्दी का प्रयोग होने लगा है। संचार माध्यमों के द्वारा हिन्दी अब अनेक क्षेत्रों की अभिव्यक्ति माध्यम बन गई है।

हिन्दी प्रशासन, विधि, चिकित्सा, न्याय, शिक्षा, तकनीकी एवं जनसंचार माध्यम में तो क्या जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रयुक्त होने लगी है। जीविकोपार्जन, व्यवसाय, खेल जगत आदि क्षेत्रों में इसका वर्चस्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। सिनेमा, विज्ञापन, दूरदर्शन संसार पर हिन्दी छा गयी है। दृश्य की प्रस्तुति भी अपने आप में एक भाषा है। समय, संस्कृति, परिवेश, इतिहास के शब्दों से नहीं, बल्कि उसकी दृश्य योजना से सार्थक अभिव्यक्ति मिलती है। ई-मेल और इंटरनेट की भाषा, कम्प्यूटर और कम्यूनिकेशन की भाषा हिन्दी को बनाने से वह अन्तरराष्ट्रीय पहचान की हकदार हो जाती है। वह अपने तमाम प्रयोगों में अपने स्वरूप को व्यावसायिक करने के लिये प्रयत्नशील है। राष्ट्रभाषा बनकर हिन्दी ने अपने प्रचार-प्रसार में तो खूब नाम कमाया है, तब उसे किसी भी तरह से अपदस्थ नहीं किया जा सकता। अब हिन्दी विश्व बाजार की भाषा बन गई है। हिन्दी के पास मार्केट है जो भाषा मार्केट की ही है। दुनियाँ का कोई भी विकसित राष्ट्र उसकी तुलना किसी अन्य के रूप में नहीं कर सकता। अब वह दिन दूर नहीं जब हिन्दी संपर्क भाषा से भी ऊपर विश्व भाषा बन सकेगी।

जनसंचार के आधुनिक माध्यमों में हिन्दी का प्रयोग इस बात का प्रमाण है कि विश्व परिदृश्य में यह एक महत्त्वपूर्ण भाषा है और संसार के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है। संचार के साधनों की गति अब चौंको वाली है, दुनियाँ सिमटकर छोटी हो गयी है, देश-विदेश की सूचनाएँ, घटनाएँ हम चंद सेकण्ड में प्राप्त कर लेते हैं। उपग्रह सेटेलाइट, चन्द्र, मंगल या अन्य ग्रहों की जानकारी प्राप्त करना तो संचार साधनों का करिश्मा है।

संचार की दिशाएँ परिवर्तनशील हैं। हिन्दी का बदलता स्वरूप जो दिखाई दे रहा है। वह उसकी सरलता का परिणाम है। शब्द, ध्वनियाँ, अर्थ, नये तेवर, वाक्यादि की विशिष्टता प्रतीक, बिम्ब आदि के कारण जनसंचार के माध्यम बनी है लिपि ध्वनि की दृष्टि से यह परम वैज्ञानिक है। हिन्दी के प्रयोजनमूलक रूप पत्रकारिता में ही देखने को मिलते हैं। इलेक्ट्रानिक मीडिया में दूरदर्शन वरदान है। कई तरह की जानकारी देता है। कई विशेषज्ञ इसे अभिशाप मानते हैं। परन्तु यह आज दोनों पहलुओं पर, भाषा के विविध आयामों पर, नई दिशा का बोध करवा रहा है। लगभग 35 करोड़ व्यक्तियों की भाषा वर्तमान में जनसंचार के माध्यम से 80 करोड़ लोगों तक पहुँच रही है। हिन्दी में अंग्रेजी के साथ अन्य भारतीय भाषाओं का प्रयोग भी हो रहा है। बौद्धिक कार्यक्रमों के कारण इसका परिनिष्ठित रूप भी हमारे सामने है।

साइबर स्पेस की हिन्दी ग्लोबल बन रही है। साइबर स्पेस वह स्पेस (शून्य या देश) है, जो कम्प्यूटर क्रांति और इंटरनेट के द्वारा निर्मित सूचना सुपर हाईवे ने संभव किया है। हिन्दी पत्रकारिता साइबर स्पेस में जा चुकी है। टी.वी. पत्र- पत्रिकाओं की वेबसाइट इन दिनों इंटरनेट पर सुपर हाइवे होगा, जिसमें सूचना इलेक्ट्रानिक वेग से समूचे भूमण्डल में पढ़ी जायेगी। आधुनिक समय में तकनीकी उपकरणों और नई विधाओं के आने की सख्त जरूरत है। अंतिम आदमी तक पहुँचने का यह एक ऐसा जरिया है, जो तीव्र है और आपकी क्षमता के भीतर है।

वर्तमान युग में जनसंचार माध्यमों में अनेक विविधताएँ हैं जिसके चलते हिन्दी में एक नया क्षेत्र विकसित हो रहा है जिसे प्रयोजनमूलक अथवा कामकाजी हिन्दी के नाम से जाना जाने लगा है। जनसंचार माध्यमों की हिन्दी का क्षेत्र दिनों दिन व्यापक होता जा रहा है। इन्हीं माध्यमों ने सामाजिक संरचना को प्रभावित किया है। आर्थिक प्रगति को बढ़ाने में मदद की है और हिन्दी को नवीन आयाम दिये हैं। इस प्रकार संचार माध्यमों की हिन्दी शनैः शनैः विश्व से संपर्क भाषा के रूप में सामने आ रही है, आज विश्व पटल पर हिन्दी भाषा अपना प्रभुत्व स्थापित करने में प्रयासरत होकर सभी को अपनी और आकर्षित कर रही है तथा नये रूप, नये प्रयोग, नव आयाम इसे नवीन ऊँचाइयाँ प्रदान कर रहे हैं।