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दुर्गों के निर्माण की पृष्ठभूमि
May 16, 2019 • ई. हेमन्त कुमार

मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे अधिक सभ्य माना जाता है, फिर भी उसके द्वारा झंड बनाकर दूसरे लोगों की बस्ती, शहर या देश पर आक्रमण करने की घटनाओं से विश्व इतिहास भरा पड़ा है। आक्रमण कई उद्देश्यों से किए जाते थे यथा- अनाज के लिए, गुलाम हासिल करने के लिए, कीमती वस्तु सोना-चांदी हथियाने के लिए, हथियार छीनने के लिए, अपने राज्य का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए, अन्य लोगों को अपने धर्म का अनुयाई बनाने के लिए, प्रतिशोध में बदला लेने या सबक सिखाने के लिए, दूसरे राज्यों को नष्ट करने के लिए तथा मित्रों का सहयोग करने के लिए।

किले का नाम सुनते ही मस्तिष्क में राजमहल, ऊंची-ऊंची मजबूत दीवारों से घिरी बस्ती, बड़ा प्रवेश द्वार, विशाल दरवाजे, तथा सेना का चित्र उभरता है। सन् 1800 के आस-पास तक दुनिया के अधिकांश देशों की सीमाओं पर बाहरी लोगों की आवाजाही अनियंत्रित रहती थीबाहरी लोगों के आने की सूचना पहले से नहीं मिल पाती थी। योद्धाओं, सैनिकों तथा लुटेरों के समूह अचानक पड़ोसी देशों की सीमाओं में घुस जाते थे। इनका प्रतिरोध तथा मुकाबला करने के लिए सेना एकत्र करने तथा उन तक पहुंचने में कई दिन और कभीकभी महीनों लग जाते थे। इस बीच बाहरी लोग अनेक गांवों में लूटपाट, नरसंहार कर अपना शासन स्थापित कर लेते थे। मानव सभ्यता की शुरूआत में तो सुरक्षा की स्थितियां और भी ढुलमुल थीं। आज तो सीमाओं पर 24 घंटे सैनिक निगरानी तथा युद्ध उपकरण तैयार रहते हैं, परंतु पहले ऐसी व्यवस्था नहीं होती थी। क्योंकि न तो ऐसे उपकरण थे और न ही ऐसी सैन्य व्यवस्था।

मनुष्य सभी प्राणियों में सबसे अधिक सभ्य माना जाता है, फिर भी उसके द्वारा झुंड बनाकर दूसरे लोगों की बस्ती, शहर या देश पर आक्रमण करने की घटनाओं से विश्व इतिहास भरा पड़ा है। आक्रमण कई उद्देश्यों से किए जाते थे यथा- अनाज के लिए, गुलाम हासिल करने के लिए, कीमती वस्तु सोना-चांदी हथियाने के लिए, हथियार छीनने के लिए, अपने राज्य का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए, अन्य लोगों को अपने धर्म का अनुयाई बनाने के लिए, प्रतिशोध में बदला लेने या सबक सिखाने के लिए, दूसरे राज्यों को नष्ट करने के लिए तथा मित्रों का सहयोग करने के लिए।

आरभिक काल में आक्रमणों काउदेश्य प्रायः आनाज की लूट तथा सुरक्षित जगह की तलाश होता था, परन्तु बाद की अवधि के आक्रमण सुनियोजित तथा अनेक कारणों पर आधारित होने लगेलूट-पाट तथा आक्रमणों में असंख्य लोगों की मौत हो जाती थी। बड़ी लड़ाईयों में बस्ती तथा फसलें नेस्तनाबूद हो जाती थी, और लोग दस-बीस सालों तक नुकसान से उबर नही पाते थे। आक्रमण क्षेत्रिय समूह भी कर देते थे और बाहरी लोग भी, परन्तु विदेशी और सुनियोजित आक्रमण अधिक घातक होते थे। विदेशी आक्रमणों की सबसे बड़ी बुराई यह होती थी, कि इसका कुछ पता नहीं चलता था। यह भी पता नही चलता था कि आक्रमण कब होगा या आक्रमणकारियों की सेना कितनी बड़ी तथा कितनी मजबूत है।

आक्रमण अचानक तथा देर-सवेर किए जाते थेइनसे अकल्पनीय नुकसान होता था, इसलिए कालान्तर में इनसे बचने के गम्भीर उपाय किए जाने लगे। लोगों ने बड़े समूह तथा बड़ी बस्ती में रहना शुरू कर दिया। सतर्कता के साथ लोग बचाव के लिए हथियार भी रखने लगे। संपन्न तथा सचेत लोगों ने अपनी सेनाएं भी रखनी शुरू कर दी। सैनिकों को वेतन देकर नियमित रूप से रखा जाने लगा।

नियमित सेनाओं से दिन-रात की लगातार सुरक्षा तो मिल जाती थी। परंतु इतनी व्यवस्था के बावजूद भी यह पता नहीं होता था कि लुटेरों की सेना कितनी बड़ी तथा शक्तिशाली होगी तथा वह कब आक्रमण कर देगी। कालांतर में आक्रमणकारी दूसरों पर युक्ति-युक्त तरीकों से हमले करने लगेउन्हें जिस पर आक्रमण करना होता था, उसकी सैन्य शक्ति की जानकारी पहले से ही हासिल कर लेते थे तथा उन तथ्यों के आधार परयोजना बनाकर इस प्रकार हमला करते थे कि अपना अधिक से अधिक लाभ हो और दूसरे का अधिक से अधिक नुकसान। धीरे- धीरे अधिक घातक हथियार तथा हमले के क्रूर तरीके खोजे जाने लगे। रात के समय अचानक हमला किया जाता था ताकि लोगों को संभलकर कड़े प्रतिरोध का मौका ना मिले। आक्रमणकारियों के अचानक बस्ती में घुस आने से, सबसे अधिक नुकसानदायक होता था। इन कारणों से यह आवश्यक लगने लगा कि बस्तियों को मजबूत दीवार से घेर दिया जाए तथा बाहर निकलने के लिए उनमें दरवाजे लगा दिए जाएँ जिन पर सतत निगरानी हो।

बस्ती के चारों तरफ दीवार बनाना बहुत अधिक लाभदायक सिद्ध हुआ। यह ठीक वैसे ही कार्य करती है जैसे किसी मकान के दरवाजे। जिस प्रकार बिना दरवाजों के मकान में कोई भी कभी भी घुस आने के लिए स्वतंत्र होता है, उसी प्रकार बिना चाहरदीवारी की बस्तियों में कोई भी कभी भी आने के लिए स्वतंत्र होता था। इस प्रकार बस्ती के चारों तरफ दीवार बनने से बाहरी घुसपैठ पर बहुत अधिक नियंत्रण हो गया। अब आक्रमणकारियों को बस्तियों के अंदर घुसने के लिए दीवार या दरवाजे को तोड़ना पड़ता था और इस कार्य में पर्याप्त समय लगता था। जितनी देर में आक्रमणकारी दीवार या दरवाजों को नुकसान पहुँचाते, उतनी देर बस्ती के लोग सचेत हो अपनी रक्षा के लिए तैयार हो जाते थे। यदि आक्रमणकारी रात में या अचानक दीवार- दरवाजा तोड़ना शुरू करते, तो भी बस्ती के लोग जाग जाते तथा संगठित हो अच्छा विरोध करने लगते थे। चाहरदीवारी से लोगों को खुद के तथा अपनी संपत्तियों के बचाव का पर्याप्त समय मिल जाता था। कभी-कभी लोग अपने कीमती सामान को लेकर सुरक्षित जगह या गुप्त तहखानों में भी पलायन कर जाते थे। लड़ाई की स्थिति में चाहरदीवारी के अंदर से पत्थर, गरम पानी, आग के गोले आदि फेंक कर विरोध किया जाता था। इससे काफी आक्रमणकारी मर जाते थे तथा उनकी सेना कमजोर हो जाती थी। इस प्रक्रिया में कभी-कभी आक्रमणकारी बगैर कोई उल्लेखनीय नुकसान पहुँचाए भाग जाते थे। चीन की दीवार भी ऐसी ही चाहरदीवारी की तरह कार्य करती है, जिसमें हजारों बस्तियां, सैकड़ों नगर, लाखों हेक्टेयर भूमि को सुरक्षा मिली।

बस्ती को मजबूत चाहरदीवारी से घेर देना, दुर्ग का आरंभिक स्वरूप माना जा सकता है। कालांतर में आक्रमणकारी भी होशियारी करने लगे। जैसे-जैसे मजबूत चाहरदीवारी की परंपरा बढ़ी वैसे-वैसे आक्रमणकारियों ने अपनी योजनाओं को उन्नत कर लिया। देर-सवेर चाहरदीवारी को तोड़कर या सुरंग बनाकर अंदर घुसने का प्रयास किया जाने लगा। इसका निराकरण करने के लिए मिट्टी की पकी हुई ईट या पत्थर की मोटी मजबूत तथा ऊंची दीवार बनाई जाने लगी। इस दशा में आक्रमणकारी किलों के बाहर एक-दो महीने डेरा डालकर रुकने लगे। इस दौरान वे कृषि, भोजन या अन्य कारणों से चाहरदीवारी के बाहर आने वाले नागरिकों को लूट लेते थे या मार देते थे या अपना गुलाम बना लेते थे। इससे बचाव के लिए परकोटे को बस्ती से भी कुछ अधिक क्षेत्र तक फैला कर बनाया जाने लगा, ताकि चाहरदीवारी से बाहर आए बिना कुछ दिन अंदर रहा जा सकेइस दृष्टि से किले के अंदर आनाज के लिए खेत, पानी के लिए तालाब-कुए, अनाज भंडार, खजाना रखने के लिए गुप्त तहखाने, पलायन करने के लिए सुरंग, शासक वर्ग के निवास हेतु मजबूत घर/महल बनाए जाने लगेइस प्रकार के किलो में महीनों तक बिना बाहर निकले सुरक्षित तथा आत्मनिर्भर तरीके से परकोटे के अंदर रहना संभव था। महीनों तक किलो के अंदर सुरक्षित रूप से रहने की सुविधा मिलने से आक्रमणकारियों को मार भगाने का विकल्प भी खुला रहता था। पड़ोसी मित्र राज्यों की सेनाओं को सहयोग के लिए बुलाकर बचने का भी जिसके मजबूत परकोटे में शासकीय निवास, मुख्य बस्ती-गांव, अन्न भंडार, पानी के स्रोत, कृषि के लिए थोड़े-बहुत खेत, गुप्त तहखाने, सुरंग तथा गोपनीय रास्ते, शस्त्रागार, सैनिकों का निवास,लोहार, बढ़ई, सेवक, गुप्तचर,मंत्री आदि विभिन्न वर्गों को एक-दो महीने तक, आत्मनिर्भरता तथा स्वतंत्रतापूर्वक रहने की सुविधा हो, किला या दुर्ग या फोर्ट कहलाता है। किले में इन सभी लोगों के एक साथ रहने से पूरा किला एक की तरह इकाई की तरह काम करता था तथा विचार-विमर्श करने या कोई बड़ा निर्णय लेने में बहुत कम समय लगता था। इस प्रकार के किले जीतना आसान नही होता था। इसलिए 'किला जीतना' एक कहावत बन गयी।

समय गुजरने के साथ आक्रमणकारियों ने ऐसे बहुआयामी दुर्गों को भी जीतने के लिए नई-नई तकनीक ईजाद कर ली, और उनकी सहायता से कालान्तर में ऐसे सुविधा संपन्न तथा आत्मनिर्भर अनेक किलों को नष्ट कर दिया। इसके जबाव में और अधिक मजबूत तथा अभेद्य किले बनाने की आवश्यकता महसूस हुई। आक्रमणकारियों द्वारा मजबूत से मजबूत किलों को जीतने तथा इसके जबाव में और अधिक मजबूत किले बनाने की स्पर्धा हजारों साल चली। इस स्पर्धा तथा उत्तरोत्तर विकास के कारण किलों की बनावट जटिल होती गई। सन् 500 से 1000 के बीच बने किले पर्याप्त उन्नत होते थे। परंतु जब बारूद का आविष्कार हुआ तो इससे बने हथियार जैसे तोप बंदूक आदि तुलनात्मक रूप से अधिक घातक वार करते थे। इस कारण सन 1500 के बाद बने किले और अधिक मजबूत तथा बहुपक्षीय सुविधाओं वाले पाए जाते हैं। इनकी दीवार ऊँची, मोटी, मजबूत तथा बड़े आकार के पत्थरों की बनाई जाने लगी, ताकि तोप के गोलों के प्रहार को सह सके। इसी क्रम में बहुस्तरीय परकोटों का भी विकास हुआ।

दुर्ग या किले के निर्माण का मूल तथा आरम्भिक उदेश्य बस्ती की सुरक्षा था, परंतु समय के साथ यह शासकों के धनबल, शानो-शौकत तथा वैभव को दिखाने का भी साधन बन गया। इसलिए कालांतर में सुरक्षा के साथ-साथ इनको सुंदर, भव्य तथा अलंकृत रूप में बनाया जाने लगा। उत्तर काल के किलों में अनेक अंग शानो-शौकत तथा वैभव प्रर्दशन की भावना से प्ररित होकर बनाए गए तथा थोड़े ही समय में अनिवार्य से हो गए। सन् 1000 के बाद अधिकांश राजा/शासक किलों के अंदर से ही शासन चलाने लगे। छोटे कस्बों में भी संपन्न लोगों ने मजबूत तथा ऊँची दीवार वाले घर बनवाने शुरू कर दिए। कुछ अधिक संपन्न लोग इस प्रकार के घर बनवाने लगे, जिनमें अन्न भंडार, शस्त्रागार, सैन्य आवास, सेवक आवास, लोहार, बढ़ई, अस्तबल, हाथीखाना जैसी मूलभूत सुविधाएं होती थी, मात्र खेत नहीं होते थे। प्रायः ऐसे घरों को महल कहा गया। छोटे आकार के महलनुमा घरों को गढ़ी के नाम से पुकारा जा सकता है, गढ़ी में उक्त सुविधाएं कम मात्रा में होती हैं। अधिक से अधिक समय तक आत्मनिर्भरता से रहने के लिए किलो के अंदर खेत बहुत फायदेमंद सिद्ध हुए थे, परंतु प्रचुर मात्रा में खेतों को घेरने के कारण चाहरदीवारी या परकोटे की लंबाई काफी बढ़ जाती थी। जिससे उसके निर्माण का खर्च भी कई गुना बढ़ जाता थाइसलिए ऐसे किले अपेक्षाकृत कम संख्या में हैं जिनके अन्दर बड़ी संख्या में खेत भी हों। पहाड़ी किलों में प्रायः ऐसी दिक्कत आती थी।

जिन नगरों पर अत्यधिक आक्रमण होने की संभावना रहती थी, वहां दोहरे परकोटे बनाए जाने लगे। दिल्ली के लाल किले के चारों तरफ ऊंची तथा मजबूत दीवार का परकोटा बना है, इसके साथ ही किले के बाहर फैली बस्तियों को आक्रमणकारियों से सुरक्षित करने के लिए एक और दीवार बनाई गई थी इस बाहरी दीवार के अंदर किला तथा उस समय की दिल्ली की सारी बस्ती आ गई थी। इससे लाल किले को दोहरी सुरक्षा मिल जाती थी। दिल्ली में आक्रमण बहुत अधिक संख्या में होते थे इनसे बचने के लिए ही दोहरे परकोटे की व्यवस्था की गई थी। इस प्रकार लाल किले पर पहुंचने के लिए आक्रमणकारियों को दो परकोटों को जीतना पड़ता था। बाहरी आक्रमणकारीयों से बचने के लिए एक समय दिल्ली नगर में लगभग 52 गेट बने हुए थे। कश्मीरी गेट, दिल्ली गेट, अजमेरी गेट, लाहोरी गेट, मोरी गेट, कलकत्ता गेट, तुर्कमान गेट, निगमबोध गेट, काबुली गेट आदि इसी बाहरी परकोटे में बने मजबूत द्वारों के नाम थे।

किले तक पहुँचना जितना मुश्किल होता था, किला उतना ही सुरक्षित माना जाता था। इसीलिए प्रयास किया जाता था कि किला पहाड़ी पर बनाया जाए। परंतु जिन क्षेत्रों में पहाड़ी नही होती थी वहां मजबूरीवश समतल मैदान में ही किला बनाना पड़ता था। ऐसी दशा में आक्रमणकारियों को दूर रखने के लिए किले के बाहर परकोटे से लगी हुई गहरी खाई बना दी जाती थी, और इस खाई में पानी, दलदल, मगरमच्छ, घड़ियाल आदि छोड़ दिए जाते थे, जिससे इनको पार कर दीवार पर चढ़ना जानलेवा हो जाए। दिल्ली के लाल किले के चारों तरफ भी इस प्रकार की एक खाई बनाई गई थी। वर्तमान काल में विभिन्न देशों की युद्ध पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन आ गया है और किलों की आवश्यकता खत्म हो चुकी है। इसलिए नए किलों का निर्माण शायद ही कहीं किया जा रहा हो। वर्तमान में ज्यादातर किले सेना छावनी या पर्यटन के रूप में प्रयोग लाए जा रहे हैं अथवा वीरान पड़े हैंफिर भी किले राष्ट्र की बड़ी धरोहर हैं, जो इतिहास को जीवन्त बनाते हैं। 

(लेखक उत्तर प्रदेश सरकार के सिंचाई विभाग में सहायक-अभियंता के पद पर कार्यरत हैं।)