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दी कोर' का आगामी नवम्बर, 2016 अंक ‘नगर स्थापत्य-विशेषांक
October 1, 2016 • Pramod Kaushik

भारत  में इस समय ‘स्मार्ट सिटी परियोजना पर बड़ी तेजी से कार्य हो रहा है। इस योजना में देश के लगभग सौ नगरों को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए चुना गया है। इसके लिए प्रायः विदेशी नगरों को रोल मॉडल बनाने की बात की जा रही है, परन्तु उल्लेखनीय है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता में भी स्मार्ट नगर थे। उनमें न केवल स्मार्ट सुविधाएँ थीं बल्कि उनकी बनावट भी स्मार्ट थी। वाल्मीकीयरामायण में अयोध्या और लंकापुरी का जैसा वर्णन मिलता है, वह आज की स्मार्ट सिटी से कम नहीं है। महाभारत और भागवत में भी इन्द्रप्रस्थ (आधुनिक दिल्ली) और द्वारका का ऐसा ही वर्णन मिलता है। इसी प्रकार अर्थशास्त्र, मिलिन्दपन्ह, मयमतम्, विश्वकर्मावास्तुशास्त्र, ब्रह्मवैवर्तपुराण, अपराजितपृच्छा, समरांगणसूत्रधार, मानसार-जैसे सैकड़ों ग्रंथ नगरनिर्माण और नगर-नियोजन पर बहुत अच्छा प्रकाश डालते हैं। इनमें नगर-निर्माण के समय नगर के मानचित्र से लेकर, चौड़ी सड़कें, राजमार्ग, उपवन, देवालय, धर्मशाला, जलाशय, दुर्ग, शस्त्रागार, कोषागार, अन्नागार, यज्ञशाला, स्नानागार, शौचालय, पुस्तकालय आदि तक का अत्यन्त सूक्ष्मता से वर्णन मिलता है। इसी प्रकार पुराणों में वर्णित सप्तपुरियाँ (अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्ची, उज्जयिनी, वैशाली, द्वारका, इत्यादि) केवल आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं मानी गई हैं, बल्कि ये विश्व की सुन्दरतम् और वैभवशाली नगरियाँ थीं जहाँ आज के हिसाब से हर प्रकार की सुख-सुविधाएँ विद्यमान थीं। सन् 1930 के दशक में सिंध के लरकाना क्षेत्र में हुए उत्खनन से प्राप्त मोहनजोदड़ो नगर के वैभवशाली स्थापत्य को देखकर पूरे विश्व के पुरातत्त्ववेत्ता चकित रह गए थे। आज भी सरस्वती नदी के तट पर नित्य नये-नये उत्खनन हो रहे हैं और वैभवशाली भारतीय सभ्यता प्रकाश में आ रही है। ‘दी कोर' का आगामी नवम्बर, 2016 अंक ‘नगर स्थापत्य-विशेषांक' भारत की प्राचीन नगरों की वास्तुगत विशेषताओं पर केन्द्रित रहेगा।