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दी अटैक्स ऑफ 26/11
September 1, 2017 • Parffulla Chandra Thakur

फिल्म  अटैक्स ऑफ़ 26/11, में धर्म के नाम पर मासूम युवकों को हैवान बनाकर पड़ोसी देश में नरसंहार कराने और आतंक फैलाने को बड़ी सूक्ष्मता से चित्रित किया गया है। इरोज़ इंटरनेशनल के बैनर तले निर्मित यह फ़िल्म 26.11.2008 को मुम्बई में हुए आतंकी हमले को चित्रित करती है। मुंबई में एक ही रात कई प्रमुख स्थानों पर हुए आतंकी हमले में 166 लोग मारे गए तथा 238 लोग घायल हो गए थे। दस आतंकी युवकों में से नौ मारे गए थे। एकमात्र जीवित पकड़ा गया। अजमल कसाब नामक इस आतंकी को फाँसी की सजा दी गई। 21.11.2012 को महाराष्ट्र के यरवदा जेल में फाँसी दी गई। विश्व की चर्चित इस आतंकी घटना पर केन्द्रित फिल्म ‘दी अटैक्स ऑफ़ 26/11' का निर्माण करना एक उल्लेखनीय कार्य है। समय के साथ जख्म भर जाते हैं, लेकिन उसकी यादें टीस देती रहती हैं। चर्चित फिल्मकार रामगोपाल वर्मा ने अपनी समर्थ फिल्म कला को इस फ़िल्म के माध्यम से प्रदर्शित किया है।

यह फिल्म कई गम्भीर प्रश्न छोड़ जाती है, जिस पर राष्ट्रीय स्तर पर चिन्तन- मनन कर निदान करने की आवश्यकता है। एक प्रश्न राष्ट्रीय सुरक्षा पर है। देश की सुरक्षा अभेद नहीं है। दस आतंकी समुद्री मार्ग से बड़ी आसानी से देश की अघोषित आर्थिक राजधानी मुम्बई में प्रवेश कर जाते हैं। वे एक ही रात में कई प्रमुख स्थानों पर हिंसा का खूनी ताण्डव कर निर्दोष मासूम बच्चों, स्त्रियों और पुरुषों को मार देते हैं। ये आतंकी साबित करना चाहते हैं कि पड़ोसी देश में हम जब चाहें, कभी भी, कहीं भी कुछ कर सकते हैं। दूसरा प्रश्न उठता है कि क्या इस्लाम के नाम पर मानवता के बदले हैवानियत, शैतानियत और दरिंदगी फैलाना उचित है? तथाकथित मजहबी आकाओं (हाफिज़ सईद जैसे लोग) और मौलवियों के द्वारा अपरिपक्वनवयुवकों के दिमाग में यह जहर भरना कि काफ़िरों के खिलाफ जिहाद जरूरी है। जलुम की आग से बचने के लिए जिहाद करना आवश्यक है। मज़हब की हिफाज़त के लिए जान गॅवाना चाहिए। ऐसा करनेवालों का दर्जा आला हो जाता है। अल्लाह के लिए जान देने पर उसके सब गुनाहों को माफ कर दिया जाता है। युवकों के दिमाग में यह बात भरी जाती है कि कुर्बानी (जान) देने पर वे शहीद हो जायेंगे। फ़रिश्ते उन्हें ज़न्नत से लेने आयेंगे जहाँ परियाँ होगी, दूध और शहद की नदियाँ होंगी। ऐसे काम के लिए आका ने जिनको चुना, उनकी ज़िन्दगी कामयाब हुई। आका ने कहा कि जब तक जिस्म में जान है, तब तक काफियों को मारते रहना- तबाही मचा देना। इस तरह मासूम युवकों को कातिल, हत्यारा और मानव बम जैसा बनाना क्या सही है? ऐसी शिक्षा किस मजहब में दी गई- यह गम्भीर प्रश्न हैं।

फिल्म की कहानी प्रारम्भ होती हैमुम्बई के सहायक पुलिस आयुक्त (नाना पाटेकर) जाँच समिति के सामने अपनी बातें रखते हैं। उनकी कही बातों के आधार पर घटना का चित्रण आँखों के सामने आ जाता है। फिल्मकार घटना का हू-ब-हू चित्रण करने में सफल रहता है। पाँच भारतीय मछुआरे एक समुद्री नौका पर मछली पकड़ने निकले हुए हैं। वे लालपरी नामक मछली पकड़ने के लिए प्रयासरत हैं। उनको एक समुद्री नौका दिखाई पड़ती है। वे मदद के लिए बढ़ते हैं। ‘अल हुसैनी' नामक पाकिस्तानी नौका पर कई लोग सवार हैं। उन लोगों ने चार भारतीय मछुआरों को अपने कब्जे में ले लिया। पाकिस्तानी नौका से बम-बारूद और हथियारभरे बोरे भारतीय नौका पर लादे जाते हैं। एक पाकिस्तानी मौलवी दस युवकों को अपने मिशन के लिए विदा करता है। मुम्बई पास आने पर पाकिस्तानी युवक को फोन आता है। हमने अपने चारों बकरे को खा लिया है। तुम भी अपना शिकार कर लो। भारतीय मछुआरों को भी गला रेतकर मार दिया जाता है। प्लास्टिक वाली नौका से सभी दस आतंकी मुम्बई पहुँच जाते हैं। वे अलग-अलग गुटों में अपने नृशंस मिशन पर चले जाते हैं। आतंकियों का पहला कहर 1871 ई. में स्थापित लियो पोल्ड कैफे एण्ड बार पर टूट पड़ता है। अंधाधुंध फायरिंग करके अनेक देशी-विदेशी लोगों की हत्या की जाती है। खून से लथपथ मृत व घायल लोगों का दृश्य मन-मस्तिष्क पर अजीब, बुरा और प्रतिकूल प्रभाव डालता है। फ़िल्मकार ने कसाब की क्रूरता का सजीव चित्रण किया है। ऐसे क्रूर दृश्य का बेहतरीन फ़िल्मांकन रामगोपाल वर्मा-जैसे समर्थ फ़िल्मकार ही कर सकते हैं।

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