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दिव्य वनौषधियों का भण्डार
September 1, 2016 • Chandrahud Subba

रामायण, महाभारत आदि अनेक ८ ग्रंथों में जड़ी-बूटियों के प्रयोग से मृत अवस्था में पहुँचे व्यक्ति को जीवित करने के अनेक प्रसंग मिलते हैं। लक्ष्मण जब लंका में मूर्छित हो जाते हैं, तब हनुमान संजीवनी ले आते हैं। अर्थात् अपने देश के वन-पर्वतों पर कई ऐसी जड़ी-बूटियाँ हैं जो रोगनाशक ही नहीं बल्कि जीवनदायिनी भी हैं। वनवासी अपनी सभी बीमारियों का इलाज इन्हीं वनौषधियों से करते आए। पूर्वोत्तर भारत हिमालय से लेकर गंगासागर (बंगाल की खाड़ी) तक फैला हुआ है। इस क्षेत्र में पाए जानेवाले पेड़-पौधों के फूल, पत्तियाँ, जड़े, छाल- सभी ओषधि के रूप में प्रयोग किए जाते हैं और अनेक असाध्य रोगों का उपचार आसानी से हो जाता है। कहा जाता है- 'नास्ति मूलमनौषधम्' अर्थात्, ऐसी कोई मूल (जड़) नहीं है जो ओषधि नहीं है यानी सभी जड़ें दवाई के रूप में काम आती हैं। जटिल से जटिल और पुराने रोगों का उपचार में रामबाण-जैसी काम करनेवाली दिव्य वनौषधियाँ उत्तर-पूर्वांचल में पाई जाती हैं।

अरुणाचलप्रदेश में मलेरिया उपचार हेतु 38, पेट की बीमारियों को ठीक करने के लिए 26, मधुमेह-निवारण हेतु 7, स्त्री गर्भाशय व्याधियों के उपशमन के लिए 11 और बच्चों की बीमारियों के लिए 9 प्रकार की जड़ी-बूटियाँ पाई जाती हैं। असम में इन्हीं व्याधियों के उपचार के लिए क्रमशः 7, 8, 4, 4 और 5 प्रकार की वनौषधियाँ हैं। इनकी तुलना में मणिपुर में सर्वाधिक जड़ी-बूटियाँ प्रयोग की जाती हैं- 78, 23 ,64, 1 और 6। मेघालय में 2,8,3,1 और 8; मिजोरम में 10, 6, 2, 0 और 6; नागालैंड में 2, 0, 0, 0 और 0; सिक्किम में 15, 3, 1, 1 और 3 तथा त्रिपुरा में 0, 3, 0, 1 और 0। ये हैं सर्वसाधारण बीमारियों का इलाज। हजारों सालों से हमारे पूर्वोत्तरवासी प्रकृति द्वारा प्रदत्त जड़ी- बूटियों, फूल, पत्तियों का प्रयोग करके अपने स्वास्थ्य की देखभाल करते आए हैं। जहाँ पैदल जाने में 8-10 दिन लग जाते हैं, ऐसे सुदूर इलाकों में रहनेवाले अरुणाचलप्रदेश, नागालैण्ड, मिजोरम के लोगों के पास न कोई डॉक्टर था न ही कोई नर्स। लेकिन चारों ओर जंगल में उगे पेड़ पौधे और वनौषधियाँ। ही स्थानीय चिकित्सक हैं। लेकिन नयी पीढ़ी को क्या इन चीजों की जानकारी है? इन औषधीय वनस्पति की पहचान है? सरकारें शोध- संस्थानों के माध्यम से इस ओषधिविज्ञान की खोज करने और इसे सुरक्षित रखने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन इन प्रदेशों के युवा भी इस दिशा में आगे आकर औषधीय पौधों की खेती करें एवं इसे अपनी आजीविका और अर्थोपार्जन का साधन बनाएँ तो बेहतर होगा।

गत दो दशकों से पूरे विश्व में जैविक ओषधियों (हर्बल मेडिसिन्स) की बढ़ती मांग को देखते हुए वैज्ञानिक पारंपरिक औषधियों की खोज पर विशेष ध्यान दे रहे हैं। भारत में ही नहीं बल्कि विश्वभर में वन-पर्वतवासियों ने सदियों से पेड़-पौधों से दवाइयाँ बनाकर बीमारियों का इलाज किया। वैज्ञानिकों के शोध का केन्द्र-बिन्दु इन जनजातीय लोगों द्वारा अपनाए जा रही प्राचीन चिकित्सा-पद्धति रहा है।

विश्व के 12 प्रमुख जैव-विविधतावाले देशों में भारत एक है। विश्व की 10% जैव-संपदा भारत के 16 विभिन्न जलवायुवाले कृषि-क्षेत्रों में पाई जाती है। देश में पाए जानेवाले 17,000 प्रजातियों के पेड़-पौधों में 7,500 औषधीय गुणों से युक्त हैं। आयुर्वेदशास्त्र में 2,000 ऐसे पौधों का उल्लेख है जिनसे दवाइयाँ बनाई जाती हैं। वैदिककालीन सभ्यता से ही इसका विस्तृत प्रयोग होता आया है। पूर्वोत्तर भारत में अभी भी जड़ी-बूटियों के द्वारा ही इलाज चल रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 20,000 पेड़-पौधों में औषधीय गुण हैं। आश्चर्य की बात है कि विकासशील देशों में रहनेवाले 80% लोग इन्हीं वनौषधियों पर निर्भर हैं। 90% औषधीय पौधे पहाड़ों पर और शेष 10% मैदानों में पाए जाते हैं।

पूर्वोत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में वन-भूमि के अनुपात को देखकर यह ह अंदाजा लगा सकते हैं कि वनौषधियों का कितना भण्डार हो सकता है। अरुणाचलप्रदेश 80.43%, असम 35.30%, मणिपुर 77.4%, मेघालय 77.23%, मिजोरम 91.27% नागालैण्ड 81.21%, सिक्किम 82.31% और त्रिपुरा 76.95% वनभूमि है जिसमें पाए जानेवाले पुष्पित पौधों की संख्या भी कल्पनातीत है। अरुणाचलप्रदेश में 5000, असम में 3010, मणिपुर में 2500, मेघालय में 3500, मिजोरम में 2200, नागालैण्ड में 2250, सिक्किम में 4500 और त्रिपुरा में 1600 प्रजातियों के पुष्पित पौधे पाए जाते हैं। 'नॉर्थ ईस्ट इण्डिया : एन एथिक स्टोर हाउस ऑफ अनएक्सप्लोरड़ मेडिसिनल प्लान्ट्स के अनुसार 60 शोधकर्ताओं ने पूर्वोत्तर के सभी राज्यों के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में पाए जानेवाले वनौषधियों पर अपने शोध-पत्र तैयार किए जो अत्यन्त ज्ञानवर्धक है।

ईशान्य भारत के आठ राज्यों में पाई जानेवाली वनौषधियों के नाम और वे किन-किन बीमारियों के इलाज में काम आते हैं, इसकी विस्तृत जानकारी निम्नानुसार है। पौधों के नाम स्थानीय बोली-भाषा के अनुसार दिए जा रहे हैं।

अरुणाचलप्रदेश में मलेरिया के अरुणाचलप्रदेश में मलेरिया के निवारण के लिए मिश्मी तीता, अक्साप, चिराता और ओत्रबेङ प्रयोग में लाए जाते हैं। मनिमूने को लेक्सेटिव के रूप में प्रयोग करते हैं। सांतेरो सर्दी, खाँसी और प्रसव- पीड़ा में काम आता है। मिश्मी तीता और अक्साप पीलिया के इलाज में भी उपयोगी है। कोप्पी न्यूमोनिया को ठीक करने में और कोप्पीर गर्भ-निरोधक के रूप में कामयाब है। दाँत दर्द में मरशाङ् और टिम्बू या जेब्रा लाभदायक हैं। पाचन-तंत्र को ठीक करने के लिए भी टिम्बू या जेब्रा का प्रयोग होता है।

असम में कारडोई और बला पीलिया को ठीक करती है। बोच, सिजू, तीता बहक, महानियुम खाँसी में उपयोगी हैं। मलेरिया में काम आनेवाला चिरायता भी यहाँ पाया जाता है। सतमूल और पथरचूरा- ये दोनों मूत्र-रोग में बहुत लाभकारी हैं। बाटल हृदयरोग में और गोलांचा बाँझपन में रामबाण-जैसे हैं।

मणिपुर के लोग अपने खान-पान में भी ऐसी बहुत-सी वनस्पतियों का प्रयोग करते हैं जो रोग-निरोधक हैं। ‘ओक हिदाक' के खाँसी, छाती में जकड़न और अतिसार व्याधियों का उपशमन होता है। अगर से उल्टी, दस्त और सर्पदंश ठीक होता है। लेतेकु पाचन-संबंधी गड़बड़ियों को ठीक करता है। ‘कुथप' फोड़े और फुसीनिवारक है। खोङ्बम तसेलई मूत्र रोग और सर्पदंश-जैसी भयंकर व्याधियों में लाभकारी है। ‘लेइखम' नवजात शिशुस्नान में उपयोग किया जाता है। याई थम्ना मान्बी सूजन, गांठ, जख़्म और मम्प्स को ठीक करता है। येन्सिल उदर-संबंधी व्याधि में लाभकारी है। खोइजु से केशवर्धक लोशन तैयार किया जाता है। चेचक और चर्म-रोग में भी इसका प्रयोग करते हैं।

मेघालय में मिनामकाची, जिन्जोक, अचक्सन, सर्पगन्धा और बद्रहोई (सभी स्थानीय नाम) वनस्पतियाँ पाई जाती हैं। मिजोरम में बुआबन पार्बुक, बांलतेहलाईताई, थिंगराई, सियलरियल, राम फुइनम, थथिंग, ऐतुर, इलेंगतेरे, कॉर्थिकनदेंग, नौबन, काइहा और थिङ खॉवि लु -किस्म की वनस्पति मिलती है।

नागालैण्ड में नेफाफु, जेम्सु नारो, तेपेतिला, सुसुलासु शिअचिबा तोङ् मेत्सुतोङ्, सुङ् पेन्तु, बाङ्को मेसातो प्रमुख रूप से पाई जानेवाले औषधीय पौधे हैं।

सिक्किम में बिख, काटबिस, अविजाल, पिरिएंगो, रामगुआ, जटामानसी, पनियावाला, ककटि, कटुका, चिरेता और ढंग्रेसल्ला नाम के पौधे औषधि के रूप में प्रयोग किए जाते हैं।

त्रिपुरा में बोन अलच, अगर सतमूली, मूली, अबोइयान, चेप्कोआ, होमोला, माइत्तेहेदोरी, जर्बोगोयम, द्रोण और हरितकी जड़ी-बूटियाँ व्याधि-निवारण में काम में लाई जाती हैं।

ये सभी दिव्य औषधीय वनस्पतियाँ छोटी-सी बीमारी से लेकर असाध्य रोगों के उपचार में गुणकारी और सदियों से हमारे वन-पर्वतवासियों द्वारा प्रयोग की जा रही हैं। इस बहुमूल्य वनस्पति ज्ञान को सुरक्षित रखना और अगली पीढ़ियों तक पहुँचाना नितांत आवश्यक है।

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