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ढाई सहस्राब्दियों से वनवास भोग रहे माँ भारती के करोड़ों रोमा
August 1, 2018 • Anand Adish

तेईस जनवरी, सन् 1931 की अर्धरात्रि। नैनी केन्द्रीय कारागार की 6 फिट चौड़ी, 8 फिट लम्बी संकरी काल-कोठरी। हड्डियों तक के तरल-तत्त्व को जमा देनेवाली उत्तर भारत की सांय-सांय करती सर्द हवाओं की हैवानियत अभी भी पूरी तरह परास्त नहीं हुई है, तभी तो वह जेल की अलंघ्य दीवारों से बार-बार टकराकर काल-कोठरी की दम तोड़ती मन्द-मन्द रोशनी का गला घोंटने पर उतारू है। परन्तु न प्रकाश परास्त होने का नाम ले रहा है और न ही बन्दी की पवित्र पितृ-प्रेम रस में पगी नैसर्गिक उष्मा एवं अद्भुत अदम्य ऊर्जा बन्दी है कि विकलांग किन्तु अजेय विद्युत प्रकाश किरणों में अपनी 13-14 वर्षीय इकलौती किशोरी पुत्री को पत्र लिखने में खोया है।

परन्तु पत्र का विषय न व्यक्तिगत है और न ही पारिवारिक। इस लम्बे पत्र के धुर अन्त में ही चार-पाँच पंक्तियों में बन्दी को स्मरण होता है कि उस दिन वसन्त पञ्चमी है और उसके विवाह की 15वीं वर्षगाँठ। अन्यथा पुस्तकाकार के तीन पृष्ठ लम्बे पत्र का केन्द्रीय विषय है ईसा के जन्म से लगभग 500 वर्ष पूर्व से प्रारंभ होकर तत्कालीन फ़ारस (आधुनिक ईरान) और मांसल-सौंदर्य प्रेमी यूनानी सामन्ती गणराज्यों के बीच चले 200-250 वर्ष लम्बे संघर्ष की व्यथा-कथा। इसका एकमात्र वाचक हुआ है समकालीन यूनानी इतिहासकार हैरोडोटस जिसके अपने देश के प्रति पक्षपातपूर्ण होने की चर्चा बन्दी अपने दो दिन पूर्व के पत्र में कर चुका है।

परन्तु कोई लाचारी है कि अपने दो दिन बाद लिखे गये पत्र में वही बन्दी उसी पक्षपातपूर्ण विवरण को दोहराने के लिए बाध्य है जिसमें यूनानी-गणराज्यों की अपराजेयता का गुणगान है, जबकि वास्तविकता उसके कथन के बिल्कुल विपरीत है।

तथाकथित सिकन्दर महान् के परदादा, दादा और पिता फिलिप्स की डेरियस नामधारी फ़ारसी सम्राटों ने उन्हीं के मुहानों पर जाकर बार-बार धुनाई की थी जिसका श्रेय उनकी शूरवीर सेनाओं के साथ उन भारतीय तलवारों, फरसों (परसों) और रणबांकुरे तेगबहादुरों को भी जाता है जो भारत से वहाँ गए थे और फ़ारसी पक्ष की ओर से लड़ रहे थे। इसी खुन्दक में सिकन्दर ने बाद में ईसा पूर्व 326-327 में फ़ारस के डेरियस तृतीय को युद्ध में परास्त कर भारत के पौरुष गणराज्य पर आक्रमण करने की हिमाकत की थी और घोर हताशा में उल्टे-पैर लौटने को ही बाध्य नहीं हुआ, जीवित अपने देश तक न लौट सका। रास्ते में ही ईसा से 323 वर्ष पूर्व बेबीलोन में दुनिया से चल बसा।

आज से लगभग 1100 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध फ़ारसी इतिहासकार फिरदौसी (940-1020) ने अपने विशालकाय काव्य ‘शाहनामा' में अपने देश के सम्राटों की कहानी बयान की है जिसमें सिकन्दर के आक्रमण के दबाव में डेरियस तृतीय द्वारा ‘हवा की रफ्तार से ऊँट पर सवार सन्देशवाहक द्वारा भारतीय सम्राट् फुरस पौरुष) से तुरन्त अतिरिक्त सहायता भेजने की प्रार्थना' का भी जिक्र है। इतना ही नहीं, भारतीय तलवारों और फरसों (परसों) की फ़ारसी राजाओं और मनसबदारों की पहली पसन्द होने की चर्चा भी फिरदौसी बार-बार करता है। फ़ारस के लोगों द्वारा शब्द के प्रारंभ मे आने वाले ‘प' अक्षर को ‘फ़' की तरह उच्चारण करना ठीक वैसा ही है जैसा अरबों द्वारा सिंधु' के 'स’ को ‘ह' की तरह उच्चारण करना। सिंधु से हिन्दु हो गया तो पौरुष से फारस नहीं बना होगा! इस प्रकरण का यह विस्तृत फलक एक स्वतंत्र निबंध की मांग करता है।

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