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डॉ. मुरली मनोहर जोशी : राजनीति में संस्कृति के दूत
May 1, 2016 • Rakesh Upadhyay

एक नेतृत्व जो स्वप्न देखता है समृद्ध, । सशक्त और विकसित सनातन भारत का। एक नेतृत्व जिसने हिंदुस्थान को उसके गौरवशाली एवं वैभवयुक्त विरासत के साथ महान् राष्ट्र के रूप में पुनस्र्थापित करने का स्वप्न देखा है। उस स्वप्न के क्रियान्वयन का सम्पूर्ण प्रारूप भी जिसके जीवन में सोते-जागते, उठते- बैठते सतत दिखाई देता है, उस नेतृत्व का नाम है डॉ. मुरली मनोहर जोशी। खेत- खलिहान, गरीब-किसान, मजदूर-जवान, लघु उद्यमी-रेहड़ी, पटरी, झुग्गी-झोपड़ी सहित संपूर्ण भारतीय मध्य वर्ग के हितों की रखवाली में डॉ. जोशी का अब तक का जीवन व्यतीत हुआ है।

भारतीय संस्कृति और संस्कार, लोकहित और सामाजिक सरोकार उनके जीवन के कण-कण और क्षण-क्षण में यूं रचे-बसे हैं जैसे तेल और बाती। वे राष्ट्र, समाज, धर्म- संस्कृति, शिक्षा सहित भारत की सम्पूर्ण आध्यात्मिक, बौद्धिक चेतना का प्रतिनिधित्व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर करने में सक्षम आध्यात्मिक राजनेता हैं।

देशभक्ति, समाज सेवा के जन्मजात संस्कार

डॉ. मुरली मनोहर जोशी का जीवन विज्ञान, धर्म, संस्कृति और परंपरा का अद्भुत समन्वय है। तरुणाई से ही वह हिंदुत्व की वैचारिक भावभूमि पर भावी हिंदुस्थान के निर्माण का स्वप्न देखते थे। 5 जनवरी, 1934 को उनका जन्म नैनीताल में हुआ। उनके पिता श्रद्धेय मनमोहन जोशी केंद्रीय लोकनिर्माण विभाग, दिल्ली के मुख्य अभियंता थे। डॉ. जोशी जब 24 दिन के शिशु थे तभी पिता का साया उनके सर से उठ गया। माता ने अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में ननिहाल के सुंदर संस्कारित, भारतीयता व धर्मनिष्ठा से ओतप्रोत वातावरण में उनका लालन-पालन किया। बालक मुरली के दिल्ली-स्थित निवास के ठीक सामने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की शाखा लगती थी, दैव विधान देखिए कि बालक मुरली उस शाखा के आकर्षणपाश में बँध गये। कालांतर में संघ-पथ ही उनका जीवनपथ बन गया। उनकी प्रारम्भिक शिक्षाचाँदपुर, बिजनौर में संपन्न हुई। अपने गृहजनपद अल्मोड़ा से इंटरमीडिएट और मेरठ से बी.एससी. की पढाई पूर्ण कर डॉ. जोशी उच्च अध्ययन के लिए प्रयाग आ गये। माँ द्वारा रोपे गए संस्कार-बीज के कारण वह बचपन से मेधावी, देशभक्त और हिंदुत्वनिष्ठ धर्मानुरागी थे, यही कारण है कि अल्पकाल में ही उन्होंने अपनी विद्या और संगठन-साधना से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अधिकारियों व देश की अन्य मूर्धन्य विभूतियों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लिया। जहाँ एक ओर वह भारतीय स्वातन्त्र्य समर के महानायकों- श्रीअरविन्द, लोकमान्य बालगंगाधर टिळक, महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गाँधी, डॉ. हेडगेवार समेत अनेक चिन्तकों-विचारकों से प्रभावित और प्रेरित हुए वहीं संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोळवळकर और महान् चिन्तक-विचारक, एकात्म मानवदर्शन के प्रणेता पं. दीनदयाल उपाध्याय की छत्रछाया में उनके जीवन को देशभक्ति के कंटकाकीर्ण मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिली। वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी-विभाग में पढ़ने आए तो फिर इलाहाबाद के ही होकर रह गये। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से उन्होंने भौतिकीविज्ञान में एम.एससी. और स्पेक्ट्रोस्कोपी के क्षेत्र में डी.फिल. की उपाधि प्राप्त की। उनका शोध-पत्र स्पेक्ट्रोस्कोपी पर था। विज्ञान में अपना शोध-प्रबन्ध (थीसिस) हिंदी-भाषा में प्रस्तुत करनेवाले वह पहले शोधार्थी थे। यहीं उन्हें मिले प्रो. राजेंद्र सिंह उपाख्य रज्जू भैया, जिन्होंने उनके जीवन पर अमिट छाप छोड़ी। आगे चलकर मुरली मनोहर जोशी इलाहाबाद विश्वविद्यालय के भौतिकी विभाग में अध्यापन करने लगे और कालांतर में प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष बने। उनकी गिनती देश के विख्यात भौतिकशास्त्रियों में होने लगी। देश-विदेश की अनेक विज्ञान शोधपत्रिकाओं में उनके शताधिक शोधपत्र भी प्रकाशित हुए। एक दर्जन से अधिक छात्रों ने उनके मार्गदर्शन में डी.फिल. और डी.एससी. के लिए शोधकार्य पूर्ण किए। विज्ञान के क्षेत्र में उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्त्व के पुरस्कार प्राप्त हुए हैं।

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