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झालावाड़ से उपलब्ध अल्पज्ञात मुद्राएँ
December 1, 2016 • Lalit Sarma

राजस्थान प्रदेश में स्थित हाड़ौती और मध्यप्रदेश-स्थित मालवा के हृदय मिलन पर बसा झालावाड़ जिला अपने अन्दर हजारों वर्षों की पुरातात्त्विक- सांस्कृतिक विरासत समेटे हुए है। इस भू- भाग में उत्खनन तथा विभिन्न स्थलों से प्राचीन भारत सहित मालवा तथा हाड़ौती के कई प्रसिद्ध नरेशों की ऐसी स्वर्ण, रजत एवं ताम्र-मुद्राएँ मिली हैं जिनका अपना राष्ट्रीय ऐतिहासिक महत्त्व है। झालावाड़ के पुरातत्त्व-संग्रहालय में 1972 ई. तक की रिपोर्ट में स्वर्ण, रजत, ताम्र व पुटीन धातु की कुल 1,684 मुद्राएँ थीं। ये मुद्राएँ भारत के प्राचीन व मध्यकालीन शासकों के साथ कुछ विदेशी शासकों एवं ब्रिटिश काल की भी थीं। यहाँ संरक्षित मुद्राओं में स्वर्ण की 55, रजत की 1150, ताम्र की 483, पुटीन 6 एवं जर्मन मार्क्स की 72 मुद्राएँ हैं। परन्तु पश्चात् के समय में भी कुछ मुद्राएँ यहाँ के कई ग्रामों, पुलिस विभाग आदि से प्राप्त हुई थी। इस प्रकार वर्तमान में इनकी कुल संख्या 2,186 बताई गई है। इन मुद्राओं की जानकारी से ज्ञात हुआ कि इनमें आहत (पञ्चमार्क), सातवाहन, कनिष्क, हुविष्क, गुप्त-सम्राट्, आदिवाराह, इण्डोसिसानियन के साथ अलाउद्दीन खिलजी, अकबर, शाहजहां, औरंगजेब से लेकर हैदर अली सहित बूंदी,कोटा एवं झालावाड़ राज्य के शासकों तथा ब्रिटिशयुगीन मुद्राएँ संरक्षित हैं। ये मुद्राएँ मुख्यतः इस भू-भाग की प्राचीन चन्द्रावती नगरी सहित ग्राम मोड़ी एवं जूनाखेड़ा (असनावर), सरेड़ी (मनोहरथाना), सारोला (खानपुर) आदि जैसे स्थलों से मिली थीं। इनसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि झालावाड़ के भू-भाग में प्राचीन भारतीय अनेक नरेशों व मध्ययुगीन शासकों का या तो आधिपत्य रहा होगा अथवा फिर उनके अधिकृत भू-भाग में यह क्षेत्र रहा होगा।

स्थानीय संग्रहालय के मुद्रा-कक्ष में संख्यांक 650 पर प्रदर्शित एक चौकोर चाँदी मुद्रा 3.16 ग्राम की है। यह मूलतः चिह्नित (आहत) मुद्रा है जिसे पञ्चमार्क- मुद्रा भी कहा जाता है। संग्रहालय में प्रदर्शित मुद्रा-चित्र में इसका समय 600 से 200 वर्ष पूर्व निर्धारित किया है। इसके अग्रभाग पर षट्चक्र, सूर्य, वृषभ, गज व तीन पहाड़ी, ऊपर अर्धचन्द्र तथा एक बालक व श्वान है। पृष्ठभाग पर दो अस्पष्ट चिह्न हैं। इस मुद्रा के अतिरिक्त ऐसी ही एवं इसी के समानान्तर दो अन्य मुद्राएँ भी संरक्षित हैं। इनमें प्रथम पञ्चमार्क मुद्रा 2.5 ग्राम की है जो पतली चाँदी की है। इसके अग्रभाग पर सूर्य, षट्भुजा, अथवा शहदरा चक्र, तीन पहाड़ियाँ, ऊपर अर्धचन्द्र, वृषभ व गज है। जबकि पृष्ठभाग पर उठी हुई पहाड़ियाँ हैं। द्वितीय मुद्रा 5 ग्राम की है। इसके दो आयताकार कोने भग्न हैं, अतः इसका वजन पूर्णरूपेण निर्धारित नहीं किया गया है। इसके पृष्ठभाग पर भी अस्पष्ट-सी आकृति है। ऐसी मुद्राओं की इस स्थान पर प्राप्ति का उल्लेख पुरातत्त्ववेत्ता अलेक्जेंडर कनिंघम ने भीकिया है। इस स्थल से बिना अंकन की कुछ चौकोर ताम्र-मुद्राएँ भी मिली थीं। कारलिथये नामक पुराविद् ने इनकी प्राप्ति चन्द्रावती (झालरापाटन) में बताई है। भारतीय मुद्राशास्त्रीय इतिहास में ऐसी मुद्राएँ प्रारम्भिक काल की मानी जाती हैं। 

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