झालावाड़ नरेश "सुधाकर जी" का सामाजिक-साहित्यिक योगदान
September 25, 2019 • ललित शर्मा

ब्रटिश युगीन भारतीय राज्यों के राजपूताना (अब राजस्थान) में झालावाड़ राज्य (वर्तमान कालिक जिला) के इतिहास की ओर दृष्टि करें तो वहाँ के शासक राजेन्द्र सिंह 'सुधाकर' को विस्मृत करना सम्भव नहीं होगा। 'सुधाकर' उपनाम से ही स्पष्ट है कि उनके राजसी व्यक्तिव में साहित्यिक व भक्ति तथा समाजोत्थान के आयामों का ऐसा अद्भुत मिश्रण था जो उस युग के भारतीय राजे-रजवाड़ों के अनेक शासकों से भिन्न पाई जाने वाली दुर्लभ अभिवृत्ति का परिचायक हैं।

राजेन्द्र सिंह सुधाकर का जन्म 15 जुलाई सन 1900 ई. को झालावाड़ राज्य के झाला शासकीय परिवार में हुआ था। उनके पिता झालावाड़ राज्य के महाराजराणा भवानी सिंह थे। सन् 1929 ई. अपने पिता के देहान्त के पश्चात् उन्होने झालावाड़ राज्य की राजगद्दी संभाली। वे मूलतः हिन्दी भारती, देशभक्ति, ईश्वर भक्ति और समाजोत्थान तथा समन्वय भावों को समर्पित हो जाने वाले ऐसे सुनरेश रहे जिन्होने अपने काव्य और सामाजिक कार्यो के माध्यम से परतन्त्रता के उस युग में अनेक चुनौतियों को ललकारा और वर्णवादियों से संत पीपाजी की भांति टक्कर ली। अपने देश प्रेम और समाजोत्थान के भावों को अपने सुदृढ़ कार्यो की क्रियान्विती से देश को जगाने वाले सुधाकर जी जब तक जीये, सभी वर्गों के लिए जीये। वे हिन्दी में 'सुधाकर' तथा उर्दू में 'मख्मूर' नाम से काव्य का सृजन करते थे। उनकी अनेक कृतियों में राष्ट्रीयता, भक्ति, धर्म-दर्शन, समाजोत्थान, तथा हालावाद की महक मिलती है। 

महान राजर्षि संत पीपाजी के समान, झाला राजपूत वंश में पैदा होकर तथा झालावाड़ राजपरिवार के एक छत्र राजा होते हुए 'राजेन्द्र सिंह सुधाकर', जो अपने युग के क्रांतिकारी समाज सुधारक, हिन्दी प्रेमी और ईश भक्त थे, ने अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों के अछूतोद्धार का जो क्रांतिकारी कदम उठाकर महात्मा गांधी की संकल्पना को मूर्त रूप दिया वह उदाहरण उन्हें भारतीय राजाओं में सबसे अलग स्थान दिलाता है। सचमुच में वे भारतीय समन्वयी परम्परा के ऐसे उज्जवल व्यक्तिव थे, जिनकी मिसाल असम्भव है।

राजेन्द्र सिंह 'सुधाकर' का कार्य और व्यक्तिव बहुआयामी था। विशाल स्तर पर विराट कवि सम्मेलनों, हिन्दी भारतीय उत्थान व संगीत समारोहों के विराट आयोजन इस साहित्यकार शासक ने अपने काल में झालावाड़ की धरती पर करवायें। उनका कृष्ण प्रेम भी अगाध था। बल्लभ भक्ति सम्प्रदाय के प्रति उनकी एकान्तिक दृढ़ निष्ठा और काव्य सेवन की चर्चा आज भी साहित्यिक जगत के पुराने साहित्यकारों की जुबां पर जीवित है। 

स्वदेश प्रेम, राष्ट्रीय गौरव की अभिव्यक्ति के साथ-साथ सामाजिक कुरीतियों पर प्रखर प्रहार करने वाले सुधाकर जी ने अछूतोद्धार और अस्पृश्यता का निवारण बिना किसी बाहरी प्रेरणा के यहाँ काफी पूर्व से ही आरम्भ करवा दिया था। उस समय गांधी जी का अछूतोद्धार आन्दोलन केवल वैचारिक कल्पना मात्र ही था। उसी समय अस्पृश्य समझी जाने वाली जातियों के कई लोगो को सुधाकर जी ने शिक्षा प्राप्ति के अनेक सुअवसर दिये। उन्होने हरिजन बालिकाओं को शिक्षार्थ प्रोत्साहन स्वरूप वस्त्र, पुस्तके और छात्रवृत्ति प्रदान की जो उनके विद्यानुराग का जीवन्त उदाहरण है। उस युग में यहाँ के प्रमुख बाजारों में भी हलवाई और विक्रेता तक हरिजनों व अछूत जातियों के उद्धार के काम में लगे कार्यकताओं को सौदा देने से पूर्व पैसों को पानी से धुलाते थे तब सिक्का भी हरिजनों, अछूत जातियों के सम्पर्क मात्र से अशुद्ध माना जाता था। ऐसी स्थिति देखकर अन्तः सुधाकर जी ने धर्म के नाम पर प्रचलित छुआछूत की कुरीति का खण्डन करने का कठोर निश्चय किया। उन्होने कर्मवीर गांधी के अछूतोद्धार की संकल्पना को फिर सर्वप्रथम देश में झालावाड़ राज्य के झालरापाटन नगर में स्थित बल्लभ सम्प्रदाय के झाला राजशाही परिवार के 'प्रभू द्वारकाधीश कृष्ण मंदिर' में साकार करके हरिजनों अछूतो को मंदिर में प्रवेश कराकर दर्शन करा दिये और सारे देश का ध्यान पलक झपकते ही इस नगर की ओर खींच लिया था।

हरिजनों, अछूतो के इस मंदिर में प्रवेश कराने के लिए उनका यह सत्याग्रह इतना दृढ़ और अटल था कि जब इस जनघटना का वैष्णव समुदाय तथा सवर्णो द्वारा उनका व्यापक और उग्र विरोध हुआ तब उसे देखकर उन्हे अत्यन्त ग्लानि हुई कि पत्ति पावन भगवान द्वारकाधीश के द्वार पर भी सहज करूणा व समन्वय के बजाय छुआछूत मानते मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव हैं। अतः उन्होने उसी घड़ी वहीं कठोर शपथ ली कि- “मैं झाला राजपूत नरेश राजेन्द्र सिंह, अब इस मंदिर में तभी दर्शनार्थ आऊंगा जब हरिजनों और अछूतों को भी मेरी ही तरह यहाँ आना आप सब स्वीकार करेगें" और वे फिर मृत्युपर्यन्त कभी इस मंदिर में नहीं गये जहाँ झाला राजसी परम्परा के अनुसार वर्ष में एक बार तो झाला शासक को शीश नवाने जाना ही पड़ता था। ये सुधाकर जी ही थे जिन्होने कहा था - 

"वह तड़प रहा है पड़ा-पड़ा, मैं देख रहा हूं खड़ा-खड़ा।

ये पाप नहीं है तो क्या है, मत धर्म बताओं बढ़ा-बढ़ा।"

किः और फिर उन्होने 'निस दिन डगर बुहारू हरिजन' जैसे भक्ति पद लिखकर अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त किया। जनता की उग्र भावना से आहत होकर उन्होने फिर अपने राजमहल में उपवास आरम्भ कर दिये थे अतः बात गम्भीर हो गई। राज्य भर में यह बात फैली। अन्तः राज्य के एक सेवाभावी व्यक्ति ने अपने निजी मंदिर में हरिजनों को दर्शनार्थ प्रवेश की अनुमति देकर दर्शन करवाये। इस अवसर पर सुधाकर जी स्वयं वहाँ आए। वे न केवल हरिजनों के मंदिर में प्रवेश से प्रसन्न हुए अपितु उन्होनें हरिजनों के हाथों से सभी दर्शनार्थियों को प्रसाद भी बंटवाया और प्रसाद लेने वालों को स्वयं की ओर से एक-एक कलदार रूपया भी भेंट किया। द्वारकाधीश मंदिर में हरिजनों, अछूतों के प्रवेश का ऐसा क्रांतिकारी कदम उन्होने भावावेश में नहीं उठाया था अपितु उनका हृदय वास्तव में भारत के अछूतों के प्रति सवर्णो के अन्याय को सहन नहीं कर पाया था। उन्हें विश्वास था किः

आयेगी स्वराज सिद्धी, हाथ जोड़ आगे।

भारत की यदि आपसी, छुआछूत छूट जायेगी।।

यह घटना 1937 ई. के आसपास की हैं जो देश में पहली बार हुई थी। परन्तु देखा जाये तो यह कैसी विचित्र स्थिति थी जब एक राजतन्त्र का शासक राजा सुधाकर तो प्रगतिशील दृष्टिकोण का आचरण कर रहा था और अंग्रेजों से स्वराज तथा प्रजातन्त्र मांगती जनता मनुष्य-मनुष्य में भेद विभेद मानती हई उसका (राजा का) विरोध कर रही थी। इस घटना की बात जब देश भर में फैली तब भारतीय हरिजन सेवा संघ की ओर से (गांधी जी की ओर से) मुख्य प्रतिनिधि रामेश्वरी नेहरू 1938 ई. में झालावाड़ आई थी। स्थानीय भवानीनाट्यशाला में आयोजित जनसभा में रामेश्वरी नेहरू ने सगर्व, सविनय यह घोषणा की थी कि "झालावाड़ में हरिजनोद्धार के लिए अब नया करने को मेरे पास कुछ नहीं है। आपके तो शासक स्वयं ही पूज्य गांधी जी के कार्य को अपना कार्य मानकर रूचि ले रहे है। मैं आप सभी को और राजराणा सुधाकर जी को हार्दिक धन्यवाद अर्पित करती हूँ।" उन्होनें सुधाकर जी को 'पत्ति पावन' की उपाधि से विभूषित किया था सुधाकर जी की रचनाएं मानवीय सद्भाव, समभाव, भक्ति तथा देशहित का सच्चा गुणगान करती है। उन्हें एक सच्चे संत, सेवाभावी की भांति अपने देश की धरती से अगाध प्रेम था। भारत उन्हें प्राणों से अधिक प्रिय था। अपनी धरती उन्हें त्रिलोक से भी अधिक प्यारी लगती थी। इस देश की मिट्टी का काजल उन्होनें अपनी आंखों से लगाकर यह लिखा था किः

एक एक दृश्य हैं अनूठो याको।।

हमे यह त्रिलोकी ते मातृभूमि प्यारी है।

तथा झालावाड़ क्रांतिकारी सुधाकर स्वच्छ हूँ मैं,

देश भक्ति हाला वाला मस्त मतवाला हूं मैं।

एक राष्ट्र और एक भाषा के परमोपासक सुधाकर जी ने आज से 75 वर्ष पूर्व ही यह उद्घोषणा कर दी थी -

बिना एक भाषा के ना, होगा कभी राष्ट्र एक,

एक राष्ट्रकारी भाषा परम परकास है।

भारत को एक करने को, हिन्दी मूल मंत्र,

जीवन यही है यही स्वांस यही आस है।। तथा

गाँव-गाँव गेह गेह इसका प्रचार करो,

सुधाकर अन्तर की यही अभिलासा है।

क्यों न अपनाते इसे, कैसा है विलम्ब यह,

क्षत्रवीरों हिन्दी की तुम्हारी राष्ट्रभासा है।। 

वे दिव्य सुधा (हाला) के मस्ताने मखमूर थे। उनकी 'मधुशालामधुबाला' काव्य कृति में विमलता, एकात्म और प्रेम हैं तभी तो उनका प्याला जीवन का सुफल देने वाला हैं जिसके सभी गुण ग्राहक है। उनका यह चिन्तन कुरीतियों के विरोध की सुन्दर अभिव्यक्ति को दशार्ता है -

छूत-अछूत कहाँ लोगों की, कहाँ एक सबका प्याला,

राम राम कहता हैं कोई, कोई जन अल्ला ताला।

पण्डित, मुल्लों के मन में भी, द्वेष भाव हैं खेल रहे,

पर सबको ही गले लगती, मेरी निर्मल मधुशाला।।

तथा जाति-पाँति का प्रश्न नहीं कुछ, जो आवे पी ले प्याला,

हिन्दू-मुस्लिम हुए एक अब, साथ बैठ पीते प्याला।।

उनका धाम जाति, द्वेष, ऊँच नीच के भावों से ऊपर उठकर जनतंत्र के सच्चे दर्शन करने वाला है। उनका मानना था कि विभिन्न विभेदों से ऊपर उठकर समता के धरातल पर ही सच्चे जनतंत्र के दर्शन होता है:

जहाँ ऊँच ओ नीच को भेद नहीं, जहँ रंग को सेत ओ स्याम नहीं,

जहाँ द्वेष क्लेश को लेश नहीं, जहाँ छूत-अछूत को नाम नहीं,

जहाँ मंदिर-मस्जिद चर्च नहीं, हमरों है सुधाकर धाम वही।

मानवता के प्रति उनका प्रेम, मात्र देश में ही नहीं अपितु सच्चे संत के समान पूरे विश्व में व्याप्त रहा और वे क्वेटा (विदेश) के भूकम्प पीड़ितो की मदद के लिये चंदा इकट्ठा कर सहायता पहुंचाने का सविनय निवेदन भी करते है:

जखमी पड़े है कई जीव, शफाखानों बीच,

जिनको सिसकतों को लारी भर लाई है।

दीजिए दयालु नेक चन्दा निज पाकिट तै।

क्वेटा पै बड़ी भारी विपत हाय आई है।।

भारत देश को प्रेम करने के साथ ही वे भारत के मित्र राष्ट्रो से भी प्रेम करते थे। परन्तु इतना ही क्यों? वे तो समस्त संसार के सभी प्राणियों को सुखी देखना चाहते थे। देखियेः

मोहन लोक-लोक सुख पावै, कर्मशील हो सभी प्रजानन,

प्रति दिन बढ़ते जावें।

हरी-भरी सब वसुधा सोहे, जन-जन मोद मनावै।।

आम जनता की सुख शांति को ही सुधाकर जी राजधर्म का रहस्य मानकर राजधर्म के मर्म को इस प्रकार अभिव्यक्ति देते है:

दिन रात प्रजा की पीर जहँ न कुछ शांति सुख छान दें।

राजधर्म का लेश भी तहँ न सुधाकर तू जान ले।।

उनके हृदस में भारत के प्रति अनन्य भक्ति भाव थे। भारतीय संस्कृति के गौरव पूर्ण स्वरूप पर उनका देशाभिमान इस प्रकार प्रकट होता है:

भारत की जय हो, जय हो, कह पियों सभी उसका प्याला

आर्यवीर हो भारत के तुम, पी पी कर सब खुल खेलो।।

वे कृष्ण भक्त थे। उन्होने अनेक सार्थक सम्बोधनों में कृष्ण के लीला पुरूषोत्तम रूप को उद्घाटित करते हुए सूरदास की भांति गोप-गोपी की सुध लेने के लिए आव्हान किया। मूलतः उनका यह भाव भक्त हृदय में राष्ट्र भक्ति की अतधारा का निरन्तर प्रवाह है। वे भारत के उत्थान के लिए गीता उपदेशक श्री कृष्ण से पुनः गीता रहस्य सुनाने का आग्रह करते है -

एक बार प्रिय आओ, जग को फेर सुनाओं।

कान्हा मोहन श्याम-मनोहर,

गो-ग्वालन सुध लाओ।

कृष्ण की भक्ति के सच्चे उपासक सुधाकर उनकी बांसुरी में देश उद्धार के स्वर सुनते थे -

सखे! उद्धार भारत को, करेगी बांसुरी तेरी।

दिली पीड़ाएँ सब इसकी, हरेगी बांसुरी तेरी।।

देश भक्ति, समाजोद्धार के साथ-साथ सुधाकर जी ने पूर्वी भारत के संत कबीर, दक्षिण भारत के संत बसवण्णा तथा पश्चिम भारत के संत पीपाजी की चिंतन भाषा में त्तव, वीतराग और जीवन मुक्ति पर भी सुन्दर अभिव्यक्ति दी। एक शासक के द्वारा की गई ऐसी अभिव्यक्ति एक विचित्र संयोग है। उन्होनें कहा किः

जन क्या है? तत्वों के मिलन का पुतला एक,

तन क्या है? हाड़-माँस चाम का सुपंजर है।

अंग्रेजों के दमन चक्र में कई निर्दोष पिस गये थे। इस कारण अंग्रेजों के प्रति उनके मन में जो घृणा हो गई थी उसी का संकेत उन्होने अपनी गजल में दिया है:

मंदिर औ मसजिद को एक कर मानों सदा,

भेदभाव भरे सबद मपै नेक लाओ ना।

चारो वर्ण वालो को न जोलौ एक कर पाओं,

भारत सपूतों तोलौ चित्त चैन पाऔ ना॥

इस प्रकार सुधाकर जी की रचनायें और कर्ममय व्यक्तिव आज भी प्रासंगिक है। उनका गोलोकवास 6 सितम्बर 1943 ई0 को झालावाड़ में हुआ था।