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जातीय चक्रव्यूह में फँसे भारतीय महापुरुष
July 1, 2018 • Dr. Jitendra Kumar Singh 'Sanjay'

भारतीय इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ नैतिकता, निष्ठा, ईमानदारी, त्याग-बलिदान और देश के लिए सर्वस्व समर्पण की उत्कट अभिलाषा के साथ उत्सर्ग करनेवाले महापुरुषों की गौरव-गाथा से भरे पड़े हैं। जितने महापुरुष भारतभूमि में पैदा हुए, उतने किसी अन्य देश में नहीं। यह भारत की मिट्टी की महिमा है कि यहाँ उत्पन्न हुए वीरों ने अपने शोणित से देश का इतिहास लिखा है। स्वातन्त्र्य देवता का आह्वान करते हुए भारतीय वीरों ने अपनी जीवन-लीला प्रारम्भ की और स्वतन्त्रता का मन्त्र जपते हुए अपनी लीला का संवरण किया है, किन्तु दुर्भाग्य से भारतीय महापुरुषों की निष्ठा और तपश्चर्या जितनी बृहत्तर परिधि में प्रसृत है, उतनी बृहत्तर सोच उनके उत्तराधिकारियों की नहीं है।

भारत की स्वातन्त्र्योत्तर राजनीति में जातिवाद का एक ऐसा वात्याचक्र उत्पन्न हुआ है, जिसके प्रभाव से अनेक महापुरुषों की उज्ज्वल कीर्ति-कौमुदी धूमिल होती जा रही है। आज महापुरुषों को जातीय चक्रव्यूह में कैद कर दिया गया है। महापुरुषों की जयन्ती एवं पुण्यतिथि मनाने के पीछे राजनीतिक पार्टियों के चाणक्यों की दृष्टि अपने वोट-बैंक पर टिकी होती है। वोट बैंक की समृद्धि प्रत्येक राजनेता को लुभा रही है। आज जिस मानसिकता से महापुरुषों की जयन्ती अथवा पुण्यतिथि मनाई जाती है, उससे न तो किसी महापुरुष के बलिदान का उद्देश्य पूरा हो सकता है और न ही समाज एवं संस्कृति का कुछ भला हो सकता है।

अक्षय तृतीया के अवसर पर भगवान् परशुराम का जन्मोत्सव इसी कुत्सित मानसिकता के साथ ब्राह्मण समाज ने मनाया था। प्रत्येक नगर में गोक्षुर के आकारवाली लम्बी एवं उन्मुक्त शिखा को लहराते हुए भगवान् परशुराम के तथाकथित वंशजों ने भगवान् परशुराम के अवतार के औचित्य को ही पददलित कर दिया था। समाज का सर्वमान्य, श्रेष्ठ एवं तपस्वी वर्ण जब भगवान् परशुराम की जयन्ती के ब्याज से अपनी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की रोटी सेंक सकता है, तो क्षत्रिय समाज पीछे क्यों रहे। क्षत्रियकुमारों की भुजाएँ भी फड़कने लगी हैं। घर में रखी पुरानी तलवारों को फिर से साफ़ किया जाने लगा है। खुली क्लासिक जीप एवं रॉयल बुलेट पर सवार राजपूतों एवं करणी सैनिकों की अनियन्त्रित भीड़ भला महाराणा प्रताप एवं महाबली छत्रसाल की जयन्ती क्यों न मनाये? महाराणा प्रताप एवं छत्रसाल की जयन्ती राजपूत समाज के द्वारा मनाई जाने की तैयारी अपने अन्तिम पड़ाव पर है। केसरिया साफा बाँधकर जिस समय राजपूत समाज के उद्दण्ड युवक शक्ति-प्रदर्शन करते हैं, उस समय निश्चय ही महाराणा प्रताप की आत्मा कराह उठती होगी।

इस तरह जयन्ती के नाम पर समाज में अपना वर्चस्व स्थापित करनेवालों का इतिहास-भूगोल से कुछ भी लेना-देना नहीं होता है। इतिहास का उन्हें ज्ञान भी नहीं होता है। जो स्वयं अपने बापदादा की विरासत को नहीं सँभाल पा रहे हैं, वे भला महाराणा प्रताप के स्वातन्त्र्य व्रत का निर्वहन कैसे करेंगे? जो लोग केवल ग्राम पंचायत का चुनाव जीतने के लिए स्वार्थान्ध होकर अपने ही घर-परिवार और गाँव की बलि चढ़ाने में तनिक भी नहीं हिचकते, वे भला महाराणा प्रताप के आदर्शों पर कैसे चल सकते हैं! मांस और मदिरा को अपना स्टेटस सिम्बल माननेवाले लोग घास की रोटी खानेवाले महाराणा प्रताप के अनुचर कैसे हो सकते हैं।

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