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जय किसान
March 1, 2017 • Parmod Kumar Kaushik

जब खेती शुरू होती है, तो अन्य कलाओं का पालन होता है। इसलिए, किसान ही मानव सभ्यता के वास्तविक संस्थापक हैं। | –डेनियल वेबस्टेर (1782-1852), अमेरिकी राजनीतिज्ञ

भारतवर्ष में कृषि की समृद्ध परम्परा रही है। यह हमारी संस्कृति का अंग रही है। किसानों को ‘अन्नदाता' कहा गया है। हमारे वाङ्मय यह स्पष्ट करते हैं कि भारत में कभी कृषि पर्यावरण की बलि देकर नहीं की गई। खाद्यसुरक्षा के नाम पर कृषि को विकृत नहीं होने दिया गया। ऋषियों के गुरुसंहिता, द्रुमचिकित्सा, वृक्षायुर्वेद, क्षेत्रतत्त्व, केदारकल्प, सस्यायुर्वेद, कृषिपराशर, उपवनविनोद, विश्ववल्लभ, वृक्षायुर्ज्ञानम् इत्यादि कृषिशास्त्र हमें यह भली-भाँति बताते हैं।

एक समय भारतीय कृषि-उत्पादों का पूरी दुनिया में बोलबाला था, लेकिन गुलामी के कालखण्ड में किसानों की स्थिति दयनीय हुई। ज़मींदारी-प्रथा का सर्वाधिक दुष्प्रभाव किसानों पर पड़ा। प्रेमचन्द आदि कई कथाकारों ने अपनी कहानियों में किसानों की दुर्दशा का मार्मिक चित्रण किया है।

स्वाधीनता के बाद भी कुछ समय तक भारत को विदेशी अनाज से पेट भरना पड़ा, लेकिन धीरे-धीरे हम अनाज के मामले में आत्मनिर्भर होते गये। आज भारत की सबसे बड़ी शक्ति है उसकी कृषि। आज दुनिया में कपास, केला, गन्ना, चाय, चावल और मसाला-उत्पादन करने में भारत शीर्ष पर विराजमान है। भारत से भेजी हुई चाय दुनियाभर में पी जाती है। आज भी भारत की लगभग 60 प्रतिशत आबादी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि पर निर्भर है। यहाँ तक कि शहरों में रहनेवाले कई लोग ऐसे हैं, जिनके पिता या दादा किसान रहे होंगे और आज भी उनके लिए अनाज गाँव से ही आता होगा।

विगत कुछ वर्षों में विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में भारत ने विशेष प्रगति की । संचारमाध्यमों के विशेष प्रचार एवं प्रसार का सकारात्मक प्रभाव हमारी कृषि पर भी पड़ा है। दूरदर्शन, इंटरनेट और मोबाइल के माध्यम से हमारी सरकार एवं अन्य संस्थाएँ, कृषकों को कृषि-संबंधी जानकारी दे रही हैं तथा उन्हें उन्नत बीजों व विभिन्न वैज्ञानिकों तरीकों से अवगत करा रही हैं। बैंकों आदि के माध्यम किसानों को सस्ते ब्याज-दर पर ऋण उपलब्ध कराया जा रहा है, जिससे वे आधुनिक उपकरण तथा सिंचाई आदि का प्रबंध कर सकें। सरकार के इन अथक प्रयासों के सकारात्मक परिणाम आने प्रारंभ हो गए हैं। कुछ राज्यों, जैसे पंजाबहरियाणा आदि ने कृषि-क्षेत्र में विशेष प्रगति की है। देश के अन्य राज्यों में भी सुधार दिखाई देने लगा है। किसानों में शिक्षा का प्रकाश फैल रहा है और बहुतसे उच्च शिक्षित भारतीय भी कृषि-कार्य की ओर उन्मुख हुए हैं।

निस्संदेह हम उज्ज्वल भविष्य की ओर अग्रसर हो रहे हैं। बदलते भारत में जिस तरह से हर चीज मॉडर्न होती जा रही है, उसी तरह कृषि और खेती के नियम-तरीकों को भी आधुनिक बनाने की जरूरत है। फिर हमें कभी किसी देश से कुछ भी आयात करने की जरूरत नहीं होगी। हमारे कृषकों की दशा में निरंतर सुधार से देश की अर्थव्यवस्था पर विशेष प्रभाव पड़ेगा। तब अवश्य ही एक स्वावलंबी, आत्मनिर्भर एवं अग्रणी भारत की हमारी परिकल्पना साकार हो सकेगी।

‘दी कोर' का प्रस्तुत अंक ‘कृषि-विशेषांक' आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है। वेदकाल से लेकर आज तक कृषि में जो-जो उतार-चढ़ाव हुए हैं, उन सभी की झाँकी आप इस विशेष अंक में देखेंगे। इस विशेष अंक की तैयारी में हमें भारतीय कृषि अनुसन्धान परिषद् (पूसा-संस्थान) के अधिकारियों का हार्दिक सहयोग मिला है, एतदर्थ हम उनके प्रति आभार व्यक्त करते हैं। होलिकोत्सव और भारतीय नववर्ष की शुभकामनाओं के साथ।