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जम्मू काश्मीर के महापुरुष
September 23, 2019 • अवनीश सिंह राजपूत

भारत की ज्ञान-परम्परा में आचार्य अभिनवगुप्त एवं काश्मीर की स्थिति को एक 'संगम-तीर्थ' के रूपक से बताया जा सकता है। जैसे काश्मीर (शारदा देश) सम्पूर्ण भारत का 'सर्वज्ञ पीठ' है, वैसे ही आचार्य अभिनवगुप्त सम्पूर्ण भारतवर्ष की सभी ज्ञान-विधाओं एवं परम्पराओं के सर्वोपरि आचार्य हैं। आचार्य अभिनवगुप्त अद्वैत आगम एवं प्रत्यभिज्ञादर्शन के प्रतिनिधि आचार्य तो हैं ही, साथ ही उनमें अनेक ज्ञान- विधाओं का भी समाहार है। भारतीय ज्ञान एवं साधना की अनेक धाराएँ अभिनवगुप्तपादाचार्य के विराट् व्यक्तित्व में आ मिलती हैं और एक सशक्त धारा के रूप में आगे चल पड़ती हैं।

अभिनवगुप्त अनेक शास्त्रों के विद्वान् थे और शैवशासन पर उनका विशेषाधिकार था। काश्मीर-नरेश ललितादित्य ने 740 ई. में जब कान्यकुब्ज प्रदेश को जीतकर काश्मीर के अंतर्गत मिला लिया, तब उन्होंने अत्रिगुप्त से काश्मीर में चलकर निवास की प्रार्थना कीवितस्ता (झेलम) के तट पर भगवान् शितांशुमौलि (शिव) के मन्दिर के सम्मुख एक विशाल भवन अत्रिगुप्त के लिये निर्मित कराया गया। इसी यशस्वी कुल में अभिनवगुप्त का जन्म लगभग 200 वर्ष बाद हुआ। उनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त तथा माता का नाम विमला था।

आचार्य अभिनवगुप्त को शेषावतार माना जाता है। शेषनाग ज्ञान-संस्कृति के रक्षक हैं। अभिनवगुप्त के टीकाकार आचार्य जयरथ ने उन्हें 'योगिनीभू' कहा है। इस रूप में तो वे स्वयं ही शिव के अवतार के रूप में प्रतिष्ठित हैं। आचार्य अभिनवगुप्त के ज्ञान की प्रामाणिकता इस सन्दर्भ में है कि उन्होंने अपने काल के मूर्धन्य आचार्यों-गुरुओं से ज्ञान की कई विधाओं में शिक्षा-दीक्षा ली थी। उन्होंने अपने ग्रंथों में अपने नौ गुरुओं का सादर उल्लेख किया है। भारतवर्ष के किसी एक आचार्य में विविध ज्ञान-विधाओं का समाहार मिलना दुर्लभ है। यही स्थिति शारदा क्षेत्र काश्मीर की भी है। इस अकेले क्षेत्र से जितने आचार्य हुए हैं, उतने देश के किसी अन्य क्षेत्र से नहीं हुए। जैसी गौरवशाली आचार्य अभिनवगुप्त की गुरु- परम्परा रही है, वैसी ही उनकी शिष्य-परम्परा भी है। उनके प्रमुख शिष्यों में क्षेमराज, क्षेमेन्द्र एवं मधुराजयोगी हैं। यही परम्परा सुभटदत्त (12वीं शताब्ती), जयरथ, शोभाकर-गुप्त महेश्वरानन्द (12वीं शताब्दी), भास्कर कण्ठ (18वीं शताब्दी) प्रभृति आचार्यों से होती हुई स्वामी लक्ष्मण जू तक आती है।

आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने जीवन को केवल तीन महत् लक्ष्यों के लिए समर्पित कर दिया- शिवभक्ति, ग्रंथ-निर्माण एवं अध्यापन। उनके द्वारा रचित 44 से अधिक ग्रंथ बताए जाते हैं, इनमें से केवल 28 ही उपलब्ध हो पाए हैं। शताधिक ऐसे आगमग्रंथ हैं, जिनका उल्लेख-उद्धरण उनके ग्रंथों में तो है, लेकिन अब वे लुप्तप्राय हैं। अभिनवगुप्त के ग्रन्थों की पाण्डुलिपियाँ दक्षिण में प्राप्त होती रही हैं, विशेषकर केरल राज्य में। उनके ग्रंथ सम्पूर्ण प्राचीन भारतवर्ष में आदर के साथ पढ़ाये जाते रहे थे।

आचार्य ने जब महाप्रयाण किया तब उनके 10 हजार शिष्य काश्मीर में थे। श्रीनगर के निकट स्थित भैरव गुफा में प्रवेश कर उन्होंने सशरीर महाप्रयाण किया। प्रत्यभिज्ञा का अर्थ है, स्वयं को विस्मृति के आवरणों से मुक्त कर स्वरूप को जानना, शिवोहं की प्रतीति। काश्मीर त्रिक अथवा प्रत्यभिज्ञा-जैसे दर्शन की पुण्यभूमि है। जिस महादेवगिरि के शिखरों पर अवतरित होकर स्वयं भगवान् शिव ने आगमों का उपदेश किया, वे धवल शिखर सम्पूर्ण देश से आज भी अपनी प्रत्यभिज्ञा की आशा रखते हैं।

आधुनिक लद्दाख के निर्माता कुशकबकुला

देश के सबसे ऊपरी छोर पर बसे लद्दाख में तिब्बती पञ्चांग के अनुसार पन्द्रहवें रबजुड के अग्नि-सर्प वर्ष के चौथे माह की पूर्णिमा को मड़टो ग्राम के राज-परिवार में बकुल लोबसड थुबतन छोगनोर का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम नड़वा थाये तथा माता का नाम येशे वड़मों था। असाधारण व्यक्तित्व के आधार पर तेरहवें दलाई लामा ने उन्हें बुद्ध के सोलह प्रधान शिष्यों में से एक अहुर्त बकुल के उन्नीसवें अवतार के रूप में औपचारिक मान्यता प्रदान की।

वर्ष 1940 में तिब्बत से अध्ययन करने के पश्चात् बकुल रिनपोटे वापस लद्दाख आ गये। तिब्बत प्रवास से लद्दाख पहुँचने पर उन्होंने पेथुब गोनपा के भिक्षुओं को प्रातः एवं सायंकाल में धार्मिक उपदेश देना प्रारम्भ कर दिया। उन्होंने भिक्षओं को विनय के नियमों को दृढ़तापूर्वक पालन करने पर बल दिया। उन्होंने सामूहिक पूजा के अवसर पर मांस पकाने पर पूर्ण प्रतिबंध लाग दिया। अपने अध्ययन के साथ-साथ बुकल रिनपोटे ने लद्दाख के सभी क्षेत्रों में व्याप्त सामाजिक बुराइयों, जैसे- बहुपति-प्रथा, पशु-बलि, लोगों के बीच भेद-भाव आदि को समाप्त करने में बहुत काम किया।

सन् 1947 ई. में भारत के स्वतंत्र होने के पश्चात् पाकिस्तान की नयी सरकार ने उत्तर-पश्चिम सीमान्त प्रदेश के कबायलियों के साथ मिलकर काश्मीर पर आक्रमण कर दिया तथा शीघ्र ही बल्तिस्तान में स्करदो किला पर कब्जा कर लियापरिणामतः काश्मीर के तत्कालीन महाराजा ने काश्मीर को भारत में विलय करने से सम्बन्धित विलय-पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया। ऐसी परिस्थिति में बकुल रिनपोटे को अपने धार्मिक कर्तव्य का भी निर्वहन करने के लिए बाध्य होना पड़ा। पाकिस्तान के कबायली आक्रमण के समय नुबरा गार्ड नामक सशस्त्र संगठन का गठन किया और कड़े संघर्ष के बाद दुश्मन को नुबरा घाटी में ही रोक दिया। इसके बाद अनेक लद्दाखी युवक भारतीय सेना के साथ जुड़ गये और भारतीय सैनिकों को रास्ता बताने का कार्य करने लगे। इन युवकों ने पाकिस्तानी तोपों को नष्ट करने और उन्हें लद्दाख से पीछे पीछे हटाने में भारतीय सेना की महत्त्वपूर्ण सहायता की। अगस्त, 1948 में भारत-पाक यद्ध के दौरान बकुल रिनपोटे ने जड़स्कर की यात्रा की। विशेष विमान से लेह पधारे तत्कालीन भारतीय सेना प्रमुख से भारत की एकता और अखण्डता के लिए बकुल रिनपोटे ने लद्दाखवासियों द्वारा भरपूर सहयोग देने का वचन दिया।

सन् 1951 ई. में रिनपोटे जम्मू-काश्मीर विधानसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। 12 मई, 1952 ई. को राज्य विधानसभा में उनका ऐतिहासिक बजट भाषण हुआ, जिसने रातोंरात उन्हें नायक बना दिया। उन्होंने जम्मू-काश्मीर सरकार की लद्दाखवासियों के प्रति उपेक्षा एवं उदासीनता की ओर सरकार का ध्यान मजबूती से आकर्षित किया। लद्दाख के प्रति कोषआवंटन में सरकार के भेदभाव को महसूस हुए उन्होंने अपने ही दल की सरकार की निन्दा की और उसका पर्दाफाश किया। परिणामतः सरकार को लद्दाख मामले के लिए अलग से एक मंत्रालय का गठन करना पड़ा और सरकार ने उनके द्वारा बजटभाषण के दौरान उठाये गये सभी मुद्दों को स्वीकार कर लिया और उसके समाधान का वचन दिया।

सन् 1953 ई. में इन्हें लद्दाख क्षेत्र के लोगों के हित के लिए सरकार में शामिल किया गया। इस दौरान उन्होंने लद्दाख में शिक्षा, सड़क, स्वास्थ्य तथा आमजनों के आर्थिक स्तर को सुदृढ़ करने का भरपूर प्रयास किया। इस प्रकार उन्होंने सन् 1953 ई. से 1967 ई. तक लगभग 14 वर्षों तक लोगों की सेवाएँ की। उनकी उल्लेखनीय सेवा के लिए सन् 1988 ई. में उन्हें पद्म भूषण की उपाधि दी गई। सन् 1989 ई. में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने बकुल रिनपोचे को मंगोलिया में भारत का राजदूत नियुक्त किया। सन् 1990 ई. में वे भारतीय राजदूत के रूप में मंगोलिया गये। वे इस पद पर दस वर्षों तक कार्य करते रहे। सन् 2003 ई. में 4 नवम्बर को नयी दिल्ली में उन्होंने छियानवे वर्ष की भरपूर आयु में परिनिर्वाण प्राप्त किया।

महाराजा हरिसिंह: एकगुमनामनायक

दिनांक 26 अक्टूबर, सन् 1947, अर्थात् भारत की स्वतंत्रताप्राप्ति के कुछ ही समय बाद जिन महाराजा ने अपने हस्ताक्षर द्वारा जम्मू-काश्मीर का भारत में विलय किया, वे थे महाराजा हरि सिंह। महाराजा हरि सिंह देशभर की कुल 562 रियासतों में सबसे बड़ी रियासत के स्वामी थे। देश के सभी राजाओं, महाराजाओं आदि ने मिलकर 'नरेन्द्र मण्डल' नामक एक संस्था बनाई हुई थी। महाराजा हरि सिंह उसके अध्यक्ष थे। उनकी पदवी थी - 'श्रीमान् इन्द्र महेन्द्र राजराजेश्वर महाराजाधिराज, जम्मू व काश्मीर नरेश एवं तिब्बत आदि देशाधिपति'।  

यह एक विशेष प्रकार का संयोग ही है कि महाराज का जन्म व राजतिलक- दोनों 23 सितम्बर को ही हुए। उनका जन्म ई. सन् 1895 में तथा राज्यारोहण 1925 में हुआ। उनकी शिक्षा मेयो कॉलेज अजमेर में व सैनिक शिक्षा देहरादून में हुई। उच्च शिक्षाप्राप्त महाराजा उदारमना, प्रजाहितकारक और प्रगतिशील विचारों के थे। वे अपनी प्रजा की भलाई के लिए बहुत दूरदृष्टि रखते थे तथा समाज के सभी वर्गों के भविष्य को सँवारने के लिए दृढ़संकल्प थे। शिक्षा, सामाजिक संरचना, पारिवारिक जीवन, अस्पृश्यता- निवारण तथा भूमि-संबंधी अनेक सुधार उनके समय में हुए।

महाराजा सभी जातियों, वर्गों और सम्प्रदायों को एक समान मानते थे। उन्होंने तथाकथित अस्पृश्यों, दलितों तथा हरिजनों को ऊपर उठाने का भरसक प्रयास किया।

उन्होंने सभी स्कूलों, मन्दिरों और जल साधनों- कुओं आदि को सभी के उपयोग के लिए खोल दिया। इसके पहले न तो हरिजन बच्चे स्कूल जा सकते थे, न उन्हें सार्वजनिक कुओं से पानी भरने की सुविधा थी और मन्दिर-प्रवेश तो एकदम वर्जित था। उन्होंने सुप्रतिष्ठित रघुनाथ मन्दिर के दरवाजे भी सभी हरिजनों के लिए खुलवा दिये। अपने आदेश से 1931 में ही उन्होंने यह सब कर दिया था। आगे बढ़कर 1940 में अस्पृश्यता को कानूनी अपराध बना दिया गया। महाराजा हरि सिंह के कार्यकाल में एक बहुत महत्त्वपूर्ण बात लोगों के स्वास्थ्य को लेकर सरकार की चिन्ता और कार्रवाई का था। उन्होंने श्रीनगर और जम्मू में दो बहुत बड़े अस्पतालों का निर्माण करवाया। पूरे राज्य में अस्पतालों और औषधालयों की एक श्रृंखला खड़ी की।

यद्यपि महाराजा राजशाही के प्रतीक और प्रतिनिधि थे, तथापि उन्होंने लोकतान्त्रिक व्यवस्था का निर्माण करके लोकशाही की तरफ दृढ़ता से कदम आगे बढ़ाये। ग्राम पंचायतों को बल प्रदान कर उन्होंने ग्रामों में परस्पर होनेवाले झगड़ों का निपटारा करने का अधिकार दे दिया। 1937 में जब ग्रामीण विकास विभाग का गठन किया गया, तब इस विभाग की गतिविधि में सहयोग करना तथा कुछ सीमा तक इस पर निगरानी करने का काम भी ग्रामीण पंचायतों को सौंपा गया।

लोकतान्त्रिक पद्धति को कदम-दरकदम आगे बढ़ाने का महाराजा का पक्का इरादा था। इसके लिए उन्होंने एक आयोग का गठन भी किया जो इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए सुझाव देता था। किन्तु दुर्भाग्य से राज्य में ऐसी राजनीतिक शक्तियाँ उभरने लगीं जो जनता को अपने पक्ष में बरगलाने में सफल हो गयीं। राज्य की राजनीति ने कुछ इस प्रकार की करवट ली जिस कारण सारी शक्ति महाराजा से छिनती चली गयी। देश की स्वतंत्रता, पाकिस्तान का जम्मू काश्मीर हड़पने के लिए सैनिक आक्रमण, देश की पहली केन्द्रीय सरकार, विशेषकर उसके प्रधानमंत्री की नीतियों के कारण जम्मू काश्मीर की स्थिति बिगड़ती चली गई। एक समय ऐसा भी आया जब महाराजा पर राज्य छोड़ने का दबाव बना और वे बम्बई चले गये, जहाँ निर्वासन के दौरान 1960 में उनका स्वर्गवास हो गया।