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जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान की कुटिल नीति
September 1, 2017 • Avneesh Rajput

राष्ट्र केवल एक भूमि के टुकड़े का सकता। कोई एक भूखण्ड और उस पर बसनेवाला समाज मिलकर अपने आप में राष्ट्र नहीं बन जाते। निश्चित भूमि, उसके प्रति श्रद्धा का भाव रखनेवाला समाज और उन्हें एकात्म बनानेवाली सांझी सांस्कृतिक धारा मिलकर एक राष्ट्र का निर्माण करती है। भारत अनेक प्रकार की दिखनेवाली विविधताओं के बाद भी एक राष्ट्र है। हजारों वर्षों में हमने सैकड़ों बाहरी आक्रमण झेले हैं। हमारा इतिहास चुनौतीपूर्ण रहा है। शक, हूण, कुषाण, अरब, तुर्क, मुगलों और फिर अंग्रेजों आदि आक्रांताओं से हमारे राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता को चुनौती मिलती रही है। लेकिन आज भी हमारा राष्ट्र एक है। हमारी राष्ट्रीय एकता अखण्डित है। यदि हम इस प्रश्न का उत्तर ढूँढ़ने का प्रयास करेंगे कि आक्रांताओं के क्रूर प्रहारों के बाद भी भारतीय एकात्मता अडिग क्यों है, तो उसका उत्तर सिर्फ हमारी संस्कृति में निहित है, जो हमें एक बनाए रखती है। हजारों वर्षों से भारत में कोई व्यक्ति कहीं भी जन्मा हो, रहा हो या फिर कहीं भी काम कर रहा हो, उसमें एकात्मता का भाव जगाने का कार्य इस पावन धरा पर जन्मे महापुरुषों ने किया है। एक राष्ट्र के रूप में यूनाइटेड किंगडम, अमरीका या किसी भी काम कर रहा हो, उसमें एकात्मता का भाव जगाने का कार्य इस पावन धरा पर जन्मे महापुरुषों ने किया है। एक राष्ट्र के रूप में यूनाइटेड किंगडम, अमरीका या किसी भी अन्य पश्चिमी देश की आयु कुछ सौ साल हो सकती है। मगर यह पुण्यभूमि भारत सैकड़ों नहीं, हजारों वर्षों से एक राष्ट्र है। भारतवासियों को अपनी इस विरासत पर गर्व होना चाहिए, और यह हुंकार भरने में भी संकोच नहीं होना चाहिए कि हम दुनिया की प्राचीनतम सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीयता के वारिस हैं।

अनेक लोगों के मन में प्रश्न आ सकता है कि जिस सनातन राष्ट्रीय धारा का वर्णन यहाँ किया जा रहा है, उसके प्रमाण क्या हैं? प्रमाण चाहिये तो सीधे रामायण के युग में लौट चलिए। यदि अयोध्या से लेकर रामेश्वरम् तक एक ही सांस्कृतिक धारा नहीं बह रही थी तो उत्तर में कोसल प्रदेश के राजकुमारों की अगुआई में सुदूर दक्षिण तक, आतंक का पर्याय बनी ताकतों के खिलाफ संयुक्त संघर्ष नज़र नहीं आता। यदि भारत एक राष्ट्र नहीं होता और देश के सुधिजनों को इसकी समग्र चिंता नहीं होती, तो वर्तमान बिहार में जन्मे विष्णुगुप्त चाणक्य देश के उत्तर-पश्चिम में सिकन्दर के हमले के खिलाफ चन्द्रगुप्त की अगुआई में प्रतिरोध की दीवार नहीं खड़ी करते। हमारे संत-महात्मा वेदकाल से ही इस राष्ट्रीय इकाई के सर्वांगीण पोषण की चिन्ता करते रहे हैं। दक्षिण में केरल की धरती पर जन्मे शंकराचार्य ने चार मठों की स्थापना के लिए इस सनातन राष्ट्र के चार कोनों को चुना- उत्तर में बद्रीनाथ के पास ज्योतिर्मठ की स्थापना की तो पूर्व में जगन्नाथपुरी के पास गोवर्धन मठ, दक्षिण में कर्नाटक में श्रृंगेरी शारदा मठ तो पश्चिम में द्वारकापुरी के पास द्वारका शारदा मठ की स्थापना की। आदि गुरु शंकराचार्य का जन्म भले ही केरल में हुआ, लेकिन उनके मन में कल्पना सम्पूर्ण भारतवर्ष की थी। कश्मीर के ब्राह्मण दक्षिण में गए तो दक्षिण के ब्राह्मण पूजा-अर्चना के लिए बद्रीनाथ गये। जब ये महापुरुष देश के किसी एक हिस्से से दूसरे हिस्से में गए, तब उनके मन में केवल एक भारत की कल्पना ही थी, यह सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चेतना छत्रपति शिवाजी से लेकर गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय में भी दिखाई देती है। सिख-गुरुओं की वाणी-संकलन हेतु जब आदि गुरुग्रन्थ साहिब का प्रकाश किया गया, तो उसमें देश के हर क्षेत्र की हर जाति के संतों की वाणी को सम्मिलित किया गया।

यही कारण है कि जब आनन्दपुर साहिब में दशमेश पिता ने एक के बाद एक पाँच शिष्यों से सिर मांग लिए तो उनमें द्वारका से लेकर लाहौर, हस्तिनापुर, बीदर और ओडिशा के जगन्नाथपुरी तक के और विभिन्न जतियों से संबंध रखनेवाले पांच प्यारे उठ खड़े हुए। अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, काशी, काञ्ची, उज्जैन आदि मोक्षदायक पुरियाँ, जहाँ देश के प्रत्येक क्षेत्र से आकर लोग अपने को धन्य मानते हैं। गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु, कावेरी, आदि नदियों का माँ के रूप में पूजन और उनमें स्नान से पुण्य की कल्पना। समान शाश्वत जीवनमूल्य, समान शत्रु-मित्र भाव, जिसे किसी भी भाषाएँ, बोली, आस्था और जीवनशैलीवाला भारतीय अपनाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् के सूत्र ने केवल भारत ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को ही अपना मानने का मार्ग प्रशस्त किया।

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