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जटा याद करो कुरबानी
September 1, 2016 • Gunjan Aggrawal

इतिहास के पन्ने सिकन्दर, मुहम्मद गजनवी, मुहम्मद गोरी, इब्राहीम लोदी, बाबर, अकबर, शाहजहाँ, औरंगजेब, लॉर्ड क्लाइव, लॉर्ड डलहौजी, लॉर्ड कर्जन, लॉर्ड माउंटबेटन आदि नामों से और उनकी कहानियों और बढ़-चढ़कर प्रशंसाओं से भरे पड़े हैं। लेकिन देश के लिए मर मिटनेवाले शहीदों या देश के निर्माण में जान लगा देनेवालों को इतिहास में योग्य स्थान नहीं मिला। पूर्वोत्तर के असंख्य बलिदानी वीरों, संत-महापुरुषों, समाज सुधारकों के साथ जो उपेक्षा की गई, वह एक अक्षम्य अपराध ही कहा जाना चाहिए। पुंजाभील, तलक्कल चन्दु, जादोनांग और जहराभगत- जैसे अनेक लोगों ने वन में रहते हुए देशहित में अपने प्राणों की आहुति दी और देश का मान बढ़ाया। लेकिन हमने उन्हें याद तक नहीं किया।

भोगेश्वरी फुकनानी

 

भोगेश्वरी फुकनानी का जन्म 1885 में असम के नगाँव जिले में बरहामपुर इलाके में हुआ भोगेश्वरी एक विवाहित स्त्री और बच्चों की माँ होने केबावजूद अंग्रेजी शासन के विरुद्ध महिला- संगठन में बढ़-चढ़कर भाग लेती थीं। 1930 में सत्याग्रह में भाग लेकर गिरफ्तार हुईं। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने 5 लोगों को मार दिया। स्थानीय लोगों ने उन्हें शहीद घोषित कर विजय दिवस मनाते हुए बरहामपुर शहर के काँग्रेस कार्यालय को मुक्त करवा दिया। बदले की भावना से अंग्रेजों ने कैप्टन फिनिश के नेतृत्व में सेना भेजी। देखते- देखते अंग्रेज़ और देशभक्तों के बीच जंग छिड़ गयी। कैप्टन फिनिश को रिवाल्वर तानते देख भोगेश्वरी उस ओर दौड़ पड़ी और झण्डे के डंडे से उसके सिर पर मारा। क्रोधित होकर फिनिश ने भोगेश्वरी पर गोली चलायी। घायल भोगेश्वरी फुकनानी ने तीन दिन बाद दम तोड़ दिया।

 राजा वीर टिकेन्द्र जीत सिंह

 

मणिपुर के राजा वीर टिकेन्द्र जीत सिंह एक सच्चे देशभक्त थे। मणिपुर का सिंह कहलाते थे। निर्भीकता से अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष किया। 1891 में उनकी सेना और अंग्रेजों के बीच की लड़ाई आंग्ल-मणिपुर युद्ध' के नाम से जानी जाती है। 1886 में मणिपुर के महाराज चन्द्र कीर्ति सिंह की मृत्यु के बाद शूरचन्द्र सिंह उनका उत्तराधिकारी बना। लेकिन सिंहासन की लड़ाई में ही भाई-कुलचन्द्र सिंह और टिकेन्द्र जीत सिंह के हाथों हारकर काछार की ओर पलायन कर लिया। कुलचन्द्र सिंह गद्दी पर बैठे और टिकेन्द्रजीत सिंह उनके सेनापति बने। इस बीच शूरचन्द्रसिंह ने वापस गद्दी हासिल करने हेतु अंग्रेजों से सहायता मांगी। ब्रिटिश ने महाराजा कुलचन्द्र सिंह को मान्यता देने, मणिपुर पर सैनिक आक्रमण कर टिकेन्द्रजीत को सजा देने की कूटनीति तैयार की। ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड लैंसडाउन के आदेश पर असम के मुख्य आयुक्त जे.डब्ल्यू. क्विन्टन 1891 में मणिपुर पहुँचा और महाराजा कुलचन्द्र सिंह से टिकेन्द्रजीत सिंह को सौंपने को कहा। मणिपुरी सेना टिकेन्द्र जीत सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना से भिड़ गयी। युद्ध में मणिपुरी सेना ने किंटन, ग्रिमनुड़ सहित पाँच अंग्रेज़ अधिकारियों को मार गिराया। 31 मार्च, 1891 को अंग्रेज सरकार ने सिलचर, कोहिमा और तमु से सेना की तीन अलगअलग टुकड़ियाँ युद्ध करने हेतु मणिपुर भेज दीं। टिकेन्द्र जीत सिंह के नेतृत्व में मणिपुरी सेना ने संघर्ष किया। अंततः मणिपुर के राजमहल पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया। टिकेन्द्र जीत सिंह और उनके सेनानी भूमिगत हो गये। 23 मई, 1891 को टिकेन्द्र जीत पकड़े गये और 13 अगस्त, 1891 को उनको और उनके प्रमुख सहयोगी थंगाल जनरल को फाँसी दे दी गयी।

कनकलता बरुआ

 

कनकलता बरुआ ने असम के विश्वनाथ जिले के बोरगाबाड़ी गाँव में जन्म लिया जो जोगोहपुर के निकट है। भारत छोड़ो आन्दोलन' के समय कनकलता गोहपुर उप-मण्डल में गठित युवाओं की ‘मृत्युवाहिनी' में शामिल हुई। 20 सितम्बर, 1942 को वाहिनी ने तय किया कि पुलिस थाने पर तिरंगा फहराया जाय। निहत्थे ग्रामीणों के दल का नेतृत्व करती कनकलता थाने की ओर बढ़ी। पुलिस की चेतावनी को अनसुनी कर वह आगे बढ़ती गयी। पुलिस ने गोली चलाई, कनकलता गिर पड़ी और गिरते राष्ट्रीय ध्वज को मुकुन्द काकोटी ने थाम लिया। बाद में काकोटी भी गिर पड़ा। पुलिस थाने में दोनों मारे गए। उस समय कनकलता की आयु सिर्फ 17 वर्ष थी।

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