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चन्देरी का गौरव : कीर्ति दुर्ग
May 16, 2019 • मजीद खाँ पठान

मुनि कान्ती सागरजी महाराज लिखते हैं कि “भारतवर्ष का सांस्कृतिक वैभव खण्डहरों में बिखरा पड़ा है, खण्डहर मानवता के भव्य प्रतीक हैं। भारतीय जीवन सभ्यता और संस्कृति के गौरवमय तथ्य पाषाणों की एक-एक रेखा में विद्यमान है। यह हमारी मौलिक सम्पत्ति है। खण्डहर संस्कृति प्रकृति और कला का त्रिवेणी संगम है। जहाँ सत्यम्-शिवम्- सुन्दरम् का साक्षात्कार होता है। खण्डहरों में ही हमें सत्य के दर्शन होते हैं।''

यही नहीं भारतीय, खण्डहरों के संबंध में श्री लक्ष्मीचन्द जैन ने क्या खूब लिखा हैवह लिखते हैं कि खण्डहरों का वैभव हमारा सांस्कृतिक वैभव है। यह हमारा ऐसा उत्तराधिकार है जिसका मूल्य सोने-चाँदी से नहीं आका जा सकता हमें धर्म राज्य मंत्र इन्हीं खण्डहरों से प्राप्त हुए हैं।

वास्तव में खण्डहरों की दुनियाँ भी अजीब है, जहाँ कभी वह सब कुछ था जो राज्य में किसी के भी पास नहीं था। जहाँ कभी बड़े-बड़े शूरमा सिर झुकाया करते थे, जहाँ से निकली हुई आवाज अंतिम आवाज मान्य की जाती थी, जहाँ कभी हर जलबा अफरोज हुआ करते थे। उन खण्डहरों में आज दिया-बाती के लाले पड़ रहे हैं।

उक्त कथन को ध्यान में रखते हुए ईसा पूर्व छटी शताब्दी के आसपास महाजनपद काल में हुए 16 प्रमुख जनपदों में से एक चेदि जनपद के नाम से प्रसिद्ध एवं महाभारत काल में युग योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण के प्रबल प्रतिद्वंदी रहे चेदि नरेश शिशुपाल की राजधानी के रूप में ख्याति प्राप्त चन्देरी के सम्मान-गौरव का प्रतीक कीर्ति दुर्ग आसमानी-सुल्तानी मार से बचते-बचाते आज हमारे सामने मूक भाषा में सब कुछ कह रहा है जो उसने सदियों से झेला है, देखा है। आशय यह है कि चन्देरी का किला चन्देरी के वैभव, सम्पन्नता, कला, संस्कृति मिश्रित वास्तुकला सौहार्द का प्रतीक सब मिलाकर 'कीर्ति दुर्ग' चन्देरी के अतीत का आईना है।

कीर्ति दुर्ग उन तमाम किस्से-कहानियों, वीरता, शौर्य की गाथाओं, न्याय-अन्याय, घात-प्रतिघात, वफादारी-गद्दारी इत्यादि का साक्षी होकर आज हमारी अमूल्य धरोहर है, हमारी विरासत है, जिस पर हमें नाज है। कहना यह है कि अनेकों-अनेक विशेषताओं से परिपूर्ण यह दुर्ग भारत में स्थित अन्य दुर्ग से कहीं ज्यादा जानकारियाँ अपने आप में समाहित किए हुए है जो भारत में कुछ ही दुर्ग-किलों को नसीब हुई है।

09-10वीं सदी में भारत में स्थित कन्नौज क्षेत्र में राज कर रहे प्रतिहार वंश की एक गौण शाखा इस क्षेत्र पर राज्य कर रही थी। पूर्व चन्देरी जिसे आज बूढ़ी चन्देरी के नाम से पहचाना जाता है पर राज कर रहे प्रतिहारवंशी राजा कीर्तिपाल द्वारा 10-11वीं सदी में इस दुर्ग का निर्माण करा कर वर्तमान चन्देरी की स्थापना कर प्रामाणिक इतिहास को गति प्रदान की है। दुर्ग के साथ ही एक तालाब एवं एक मन्दिर का भी निर्माण कराया गया।

उक्त तीनों संरचनाओं के नाम राजा कीर्तिपाल के नाम पर ही निर्धारित हुए जिन्हें क्रमशः किले का नाम कीर्ति दुर्ग, तालाब का नाम कीर्ति सागर एवं मंदिर का नाम कीर्तिनारायण का मंदिर रखा गया। राजा कीर्तिपाल के उक्त निर्माण की पुष्ठि चन्देरी में प्राप्त तिथि रहित अभिलेख से होती है, उक्त अभिलेख में राजा कीर्तिपाल की आगे-पीछे की वंशावली की जानकारी भी मिलती है।

आज भी यह तिथि रहित अभिलेख पुरातत्त्व संग्रहालय गुजरी महल ग्वालियर में सुरक्षित एवं प्रदर्शित होकर वर्तमान चन्देरी प्राचीनता का प्रथम प्रामाणिक स्रोत है। अभिलेख हिन्दी अनुवाद श्री हरिहर निवास द्विवेदी द्वारा निम्न प्रकार वर्णित हैं - जैत्रवर्मन-चन्देरी- प्रस्तर लेख, पंक्ति 32, लिपि प्राचीन नागरी, भाषा संस्कृत। प्रतिहार वंशावली दी हुई है। ग्वालियर सू. सं. 2107 गाइड टू चन्देरी पृष्ठ 8 इसके अनुसार प्रतिहार वंशावली- नीलकण्ठ, हरिराज, भीमदेव, रणपाल, वत्सराज, स्वर्णपाल, कीर्तिपाल, अभयपाल, गोविंदराज, राजराज, वीरराज, जैत्रवर्मन। कीर्तिपाल और कीर्तिदुर्ग, कीर्तिसागर तथा कीर्ति स्मारक मंदिर के निर्माण का उल्लेख।

भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण द्वारा राष्ट्रीय महत्त्व का घोषित एवं संरक्षित यह स्मारक मात्र पुरातत्त्व, इतिहास दृष्टिकोण से ही नहीं अपितु अन्य कई कारणों से भी जग जाहिर है। प्रथम यह किला नगर से लगभग 225 फीट ऊँची पहाड़ी पर स्थित हैइस पहाड़ी की बनावट प्राकृतिक रूप से कुछ इस प्रकार की है कि चारों ओर से एक समान गहराई अथवा ऊँचाई धारण किए हुए है। अतएव प्राचीनकाल में प्रचलित सुरक्षा मान से यह किला अजेय मान्य किया जाता था। दूसरे पहाड़ी पर ही स्थापित दुर्ग सुरक्षा दीवार, बुर्ज, दरवाजा इसको और अधिक मजबूती सुरक्षा प्रदान करते हैं।

वर्तमान में दिखाई देने वाला दुर्ग पूर्वकाल में स्थापित दुर्ग का एक हिस्सा मात्र भी नहीं है। पूर्वकाल में यह दुर्ग विशाल भू-भाग पर विस्तीर्ण हुआ करता था। आज भी यहाँ-वहाँ खड़े खण्डहर सम्पूर्ण दुर्ग की उपस्थिति का बोध कराने में सक्षम हैं।

चन्देरी की भौगोलिक स्थिति, अतिरिक्त इसके चन्देरी का मालवा एवं बुन्देलखण्ड की सीमा पर स्थित होकर बुन्देलखण्ड-मालवा का प्रवेश द्वार होना। इसके अलावा उस काल में उत्तर दिशा की ओर से दक्षिण दिशा की ओर जाने वाले मुख्य मार्ग का चन्देरी से गुजरना इत्यादि ऐसे महत्त्वपूर्ण कारण रहे जिसके चलते कीर्ति दुर्ग का प्रत्येक काल खण्ड में समान सामारिक महत्व कायम रहा। क्योंकि दिल्ली की गद्दी पर आसीन शासक की यह अनिवार्य नीति रही कि चन्देरी के दुर्ग पर दिल्ली सल्तनत का परचम फहराता रहे ताकि मालवाबुन्देलखण्ड में साम्राज्य विस्तार नीति को आसानी से लागू किया जा सके और अपनी मनमर्जी अनुसार योजनाओं को अमलीजामा पहनाया जा सके।

इसके अलावा चन्देरी उसकाल में एक मुख्य व्यापारिक केन्द्र के रूप मे सब दूर ख्याति अर्जित किए हुए था, व्यापारियों के कारवाँ आगमन, नगर का आर्थिक रूप से अधिक सम्पन्नता से परिपूर्ण होना। तमाम ऐसे कारण रहे जिसका खमियाजा कीर्ति दुर्ग को एक बार नहीं कई बार भुगतना पड़ा।

|मान न मान मैं तेरा मेहमान की तर्ज पर मुस्लिम शासक बलबन (1251 ईस्वी) मलिक काफूर, आईन मुल्क मुल्तानी, अलाउद्दीन खिलजी उसका सेनापति मलिक तमर (1305 ईस्वी पुनः 1309 ईस्वी) मुहम्मद तुगलक, सिकंदर लोदी द्वारा किए गए हमले को कीर्ति दुर्ग ने बखूबी झेला है।

1398 ईस्वी लगायत 1520 ईस्वी यह नगर मालवा के सुल्तानों की नीतियों का पालन करने के कारण किले का विस्तार हुआ, दुर्ग सुरक्षा दीवार, मस्जिद अन्य निर्माण आज भी दुर्ग से अपने संबंधों के बखान कर रहे हैं।

1528 ईस्वी में विदेशी हमलावर मुगल बाबर द्वारा विशाल सेना मय तोपखाना सहित चन्देरी दुर्ग पर की गई चढ़ाई तत्पश्चात हुआ राजपूतों के साथ युद्ध मध्यकालीन भारतीय इतिहास के प्रमुख युद्धों में शामिल है। उक्त युद्ध में चन्देरी राजा राजपूत मेदिनीराय को वीरगति को प्राप्त होना तथा रानी मणिमाला एवं अन्य 16 सौ वीरागनाओं द्वारा दुर्ग परिसर में किया गया सामूहिक जौहर भारतीय इतिहास के साथ-साथ चन्देरी इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठ है।

17वीं सदी के प्रथम दशक में चन्देरी को पृथक राज्य कायम करते हुए मुगल शासक जहाँगीर द्वारा ओरछा राजा बुन्देला रामशाह को चन्देरी में पदस्थापना करने के साथ नगर में बुन्देला राजवंश का जन्म होना तत्पश्चात लगातर पीढ़ी-दर-पीढ़ी 19वीं सदी तक किले पर अपना झंड़ा लहराते हुए दुर्ग के मान-सम्मान में अपनी आवश्यकता अनुसार विस्तार विकास यात्रा का अहम पड़ाव का साक्षी यह कीर्ति दुर्ग है।

 

आशय यह है कि भारत में स्थित अधिकांश किलो की एक समान कहानी रही है। जिस राजा ने किला का निर्माण कराया उसके वंशज क्रमशः उस किले में निवास करते रहे हैं। आज भी देश में ऐसे अनेक किले मौजूद हैं जिनमें राजघरानों के उत्तराधिकारी निवास कर रहे हैं तथा वह उस किला के स्वत्व, स्वामित्व तथा आधिपत्यधारी है।

इसके विपरीत उंगलियों पर गिनने वाले ऐसे दुर्ग भी हैं जिन्हें एक नहीं अनेक बार अलग-अलग राजवंशों के रहवास एवं उनकी नीतियों का संचालन करने का अवसर प्राप्त हुआ है। जिसमें से एक हैचन्देरी का कीर्ति दुर्ग। जिसके निर्माण का श्रेय प्रतिहारवंशी राजा कीर्तिपाल के खाता में दर्ज है।

आगे आने वाले समय में दिल्ली शासकों के प्रतिनिधि के अलावा सुल्तान उनके गर्वनर, मुगल शासकों के प्रतिनिधि, राजपूत, बुल्देला राजाओं इत्यादि की भरपूर उपस्थिति का गवाह एवं उनके क्रिया-कलापों का साक्षी है कीर्ति दुर्ग।

यह एक ऐसा किला है जिसे विभिन्न कालखण्डों में विभिन्न शासकों ने अपनी आवश्यकता-परिस्थिति अनुसार सजाया- संवारा है। इस दुर्ग ने कई बार विस्ताररूपी रेखाओं को छुआ तो कई बार घ्वस्तरूपी गाज गिराने के कारण जमीदोंज होना पड़ा है। यानि इस किले को अनेक मौकों पर अनेक अवस्थाओं से गुजरना पड़ा है। कई बार उजड़ना पुनः बसना पड़ा है। यही कारण है कि किला स्मारक पर विभिन्न काल खण्ड वास्तुकला के मिश्रित दर्शन होते है।

विभिन्न प्रकार की आपदाओं से पार पाकर एक हजार साल पुराना कीर्ति दुर्ग आज भी परिसर में स्थित जौहर स्मारक, जौहर तलैया, मस्जिद, हवा महल, नौखण्डा महल, दुर्ग सुरक्षा दीवार, बुर्ज, खूनी दरवाजा, हवापौर दरवाजा, बारादरी, दरगाह, तालाब इत्यादि स्मारक दुर्ग के साथ-साथ स्वयं के साथ घटी प्रत्येक घटना के सहभागीदार साक्ष्य है।