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चंदेरी साड़ियाँ
August 30, 2019 • मजीद खाँ पठान

चंदेरी का इतिहास गवाह है कि इस धरती पर अनेक राजवंशों ने बुलंदी के परचम को फहराया है। नगर में राज कर रहे राजा, सुल्तान, गर्वनरों की मनचाही नीतियों का प्रभाव इस कुटीर उद्योग पर भी पड़ा और उनकी पसंद एवं शौक अनुसार कपड़ा निर्माण होता रहा। जहाँ प्रारंभ में मलमल नामक कपड़ा का उत्पादन किया गया वहीं मध्यकालीन चंदेरी में साड़ी के अलावा साफा, पगड़ी, पेचे, दुपट्टे लुगड़ा आदि का उत्पादन किया जाने लगा। पूर्वकाल में हाथकरघा के ताना में उपयोग किया जाने वाले धागे का उत्पादन भी स्थानीय स्तर पर किया जाता था।

नगर में चंदेरी वस्त्र हस्तशिल्प कला का जन्म 14वीं सदी के प्रथम दशक में मलमल कपड़े के रूप में हुआ और शनैः शनैः हथ-करघा सहित इस हस्तशिल्प कला ने अपनी जीवन यात्रा को सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया। नगर में निरंतर उपस्थिति इस हस्तशिल्प कला की विशेषता उल्लेखनीय उपलब्धियों में शुमार है।

चंदेरी का इतिहास गवाह है कि इस धरती पर अनेक राजवंशों ने बुलंदी के परचम को फहराया है। नगर में राज कर रहे राजा, सुल्तान, गर्वनरों की मनचाही नीतियों का प्रभाव इस कुटीर उद्योग पर भी पड़ा और उनकी पसंद एवं शौक अनुसार कपड़ा निर्माण होता रहा।

जहाँ प्रारंभ में मलमल नामक कपड़ा का उत्पादन किया गया वहीं मध्यकालीन चंदेरी में साड़ी के अलावा साफा, पगड़ी, पेचे, दुपट्टे लुगड़ा आदि का उत्पादन किया जाने लगा। पूर्वकाल में हाथकरधा के ताना में उपयोग किया जाने वाले धागे का उत्पादन भी स्थानीय स्तर पर किया जाता था।

मुगलिया सल्तनत के अंतिम दौर में सूती कपड़े को अत्यधिक पसंद किया जाने के कारण चंदेरी हस्तशिल्प कला ने नई ऊँचाइयों को छना प्रारंभ कर दिया।

आगे आने वाले समय में जब बुंदेला राजाओं की नगर में तूती बोल रही थी तब चंदेरी निर्मित सूती कपड़ा उच्च स्तरीय होने के कारण देश के चारों दिशाओं में अपनी पहचान बनाने के साथ ही निर्यात भी किया जाने लगा।

दुनियाँ में जो आया है सो जायेगा क्या राजा क्या रंक

ऐसा हमने ही नहीं सभी ने माना है फिर चंदेरी इस प्रक्रिया से कैसे अछूती रहतीदिल्ली सल्तनत के नुमाइंदे, मालवा सुल्तान आए गए, तो मुगल बादशाह आए, मुगल बादशाहों ने पीठ फेरी, तो बुंदेला राजा आए, बुंदेला राजाओं ने चंदेरी को अंतिम सलाम किया, तो महाराजा सिंधिया का आगमन हुआ।

मगर नहीं रोका तो वह है चंदेरी हस्तशिल्प कला विकास का वह चक्र जी सदियों पूर्व प्रारंभ होकर बदस्तूर आज तक जारी है।

आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह चक्र आगे भी यूँ ही चलता रहेगा और इंसानों द्वारा निर्मित, इंसानों के लिए, इंसान की मूलभूत आवश्यकता रोटी के बाद कपड़े की पूर्ति करता रहेगा।

सिंधिया रियासत में सूती कपड़ा के साथ-साथ साड़ी ने पुनः अपना खोया हुआ स्थान पाकर हस्तशिल्प कला विकास को नए रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया। तब से लेकर आज तक यह प्रक्रिया निरंतर प्रगति की ओर अग्रसर है।

तमाम तरह की परेशानियाँ, अनेक उतार-चढ़ाव झेलते हुए, खट्टे मीठे अनुभावों में हस्तशिल्प कला परचम को ऊँचाइयाँ प्रदान कर रही है।

वह दिन दूर नहीं जब यनेस्को जैसी विश्व प्रसिद्ध संस्था इस जीती-जागती चंदेरी विरासत, चलते फिरते गौरवमय अतीत को अपने अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज में सम्मानजनक दर्जा प्रदान करेगी।

चंदेरी साड़ियाँ सदियों से अपनी पारदर्शिता बारीक बुनाई तथा साड़ियों में बनाई जा रही बूटी के लिए प्रसिद्ध है। नजाकत महीनता साड़ी का महत्वपूर्ण घटक होकर अपने आप में एक अनोखा लक्षण है जो सामान्यतया किसी अन्य कपड़ों में देखने को नहीं मिलता।

साड़ियों पर बूटी कारीगर के हाथ एवं कारधा के मिश्रित मेहनत का फल है। चंदेरी बुनकर इस हुनर में परंपरागत महारथ हासिल किए हुए हैं। हाथ से बनी हुई बूटी स्थाई रहती है। बूटी का मूल आकार साड़ी के उपयोग के बाद भी वैसा का वैसा बना रहता है रंग जगमगता रहता है। अतिरिक्त

हस्त शिल्पकला का नायाब नमूना-चन्देरी साड़ियाँ

10-11वीं सदी से निरंतर आबाद यह पुरातन नगर एक नहीं अनेक कारणों से आज भी भारतीय इतिहास में उल्लेखनीय भूमिका दर्ज कराए हुए है। फिर चाहे यह सल्तनत मध्यकालीन युद्ध एवं जौहर के कारण या फिर मध्यकालीन लोक सांस्कृति का प्रतिनिधित्व करते संगीत सूर्य बैजू बावरा के कारण या फिर सूफी-सत परम्परा के कारण या फिर हस्त शिल्पकला के कारण आज भी चर्चित बना हुआ है।

 मध्य प्रदेश के जिला अशोकनगर अतर्गत स्थित ऐतिहासिक एवं पर्यटन नगर चन्देरी यूँ तो अपने किला, महल, गढ़ी- हवेलियाँ, मठ-मकबरा-मीनारे, दरवाजे, मंदिर-मस्जिद, कुआ-बावड़ियाँ शैलचित्र इत्यादि उल्लेखनीय पक्ष को उजागर करने में समक्षता हासिल किए हुए है।

अलावा इसके नगर की सांस्कृतिक विरासत हाथ करधा, हस्त शिल्प कला का नायाब नमूना चन्देरी वस्त्र एवं साड़ियाँ एक अलग ही दास्ता बयान करती हैं। आज यह नगर हस्त शिल्पकला क्षेत्र में पीढ़ी-दर- पीढ़ी प्राप्त वंशानुगत अनुभव-हुनर के दम पर बुनकरों के माध्यम से हाथकरधा पर निर्मित सुंदर कलात्मक, परम्परागत वस्त्र, चन्देरी साड़ियों के कारण राष्ट्र ही नहीं अपितु अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान स्थापित किए हुए है।

कहा गया है कि वस्त्र मानव समाज संस्कृति और सभ्यता के सूचक ही नहीं वरन् शिल्प परम्परा के सर्वोत्तम उदाहरण हैं। जो मात्र मनुष्य के अंग को ही नहीं ढ़कते बल्कि हमारे अपने गौरवमयी अतीत की यादों को ताजा कर इतिहास, सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष, लोक संस्कृति आदि विभिन्न पहलुओं को उजागर करने में सहायक सिद्ध होते हैं।

14वीं सदी के प्रथम दशक में ढाका के आसपास स्थित लखनौटि नामक क्षेत्र से आए बुनकरों के माध्यम से इस वस्त्र कुटीर उद्योग ने चन्देरी में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हुए सर्वप्रथम मलमल नामक कपड़े का उत्पादन प्रारंभ कर अपनी विकास यात्रा को गति प्रदान कर अपनी रोजी-रोटी प्रबंध का प्रमुख माध्यम बनाया। उस काल में ढ़ाका की मलमल नामक कपड़ा प्रसिद्ध कपड़ों में शुमार हुआ करता था।

चूंकि चन्देरी आए मजदूर-बुनकर भी उसी क्षेत्र से संबंधित थे, स्वाभाविक है कि मलमल निर्माण प्रक्रिया भी वहीं रही जो ढ़ाका क्षेत्र में अपनाई जा रही थी। परिणामस्वरूप ढ़ाका मलमल के साथ चन्देरी मलमल का नाम जुड़ना प्रारंभ हुआ और धीरे-धीरे कपड़ा क्षेत्र में चन्देरी का नाम मशहूर हुआ। ढ़ाका और चन्देरी मलमल को लेकर पूर्वकाल में एक कहावत प्रसिद्ध हुई जो आज भी नगर में गाहे-बगाहे सुनने को मिलती है।

ढ़ाका और चन्देरी में, मलमल महीन बनती थी।

पूरे भारत में, चन्देरी की पहली गिनती थी

समय परिवर्तनशील है। काल और परिस्थितियाँ, क्षेत्रीय आवश्यकताओं के दृष्टिगत, इससे भी कहीं अधिक चन्देरी में राज कर रहे राजा-महाराजा, राजपरिवार, उच्च वर्ग की मन पसंद अनुसार इस हस्त शिल्पकला द्वारा मलमल नामक कपड़ों के साथ-साथ साड़ी, पगड़ी, पगला, पेचे, लुगड़ा, दुपट्टा, सैला-ओढ़नी, धोती, सूती कपड़ा आदि वस्त्रों का उत्पादन किया जाने लगा। चन्देरी वस्त्र बारीक पारदर्शी, वजन में हल्के, कशीदाकारी आदि के कारण भारत के विभिन्न भागों में राज कर रहे राजवंश, राजदरबारों में पसंद किए गए।

15वीं सदी में चन्देरी पर राज कर रहे मालवा सुल्तानों द्वारा इस हस्त शिल्प को संरक्षण दिए जाने के कारण फलने-फूलने का भरपूर अवसर मिला। चन्देरी वस्त्र अपनी विशेषताओं खासकर महीनता के कारण सुल्तान एवं राजकीय परिवार का पसंदीदा परिधान हुआ, करता था।

15-16वीं सदी चन्देरी अपनी भौगोलिक स्थिति के कारण सामरिक महत्व, राजनैतिक, व्यापारिक तथा समाजिक महत्ता, बरकरार रखे हुए थी मालवा एवं बुन्देलखण्ड की सीमाओं पर स्थित होने के कारण एवं नगर से गुजरे व्यापारिक मार्ग के कारण यह नगर एक व्यापारिक केन्द्र बन कर उभरा जिसका समस्त व्यापार हस्त शिल्पकला के इर्द-गिर्द घूमता था। चन्देरी-गागरोन राजा मेदिनीराय राजपूत के समय राजस्थान से मारवाड़ी परिवारों का चन्देरी आगमन, साड़ी व्यापार से जुड़ना आज तक जुड़े रहना सफल दास्तां है।

मुगलकाल चन्देरी हस्त शिल्पकला के नजरिए से बेहद फायदेमंद साबित हुआ और नगर में राजकीय संरक्षण प्राप्त शाही कारखाना की स्थापना किया गया ताकि कपड़ा उत्पादन को और बेहतरीन बनाया जा सके। 17-18वीं सदी चन्देरी में बुन्देला राजा अपना परचम फहरा रहे थे। हस्त शिल्पकला भी उन्नति के नए आयाम तय करते हुए आगे बढ़ रही थी। स्थिति यह बन बैठी कि चन्देरी निर्मित सूती कपड़ा निर्यात किया जाने लगा।

19वीं सदी में जैसे ही चन्देरी ने ग्वालियर रियासत का दामन थामा वैसे ही इस हस्तकला के और भी अच्छे दिन आना प्रारंभ हो गए। 1910 ई. में तत्कालीन महाराजा श्रीमत माधवराव सिंधिया ने नगर में वस्त्र उद्योग को बढ़ावा देने हेतु प्रशिक्षण केन्द्र की स्थापना कर नई दिशा की ओर ले जाते हुए, आगे भी इस शिल्पकला को संरक्षण सवर्धन प्रदान करते हुए निरंतर चलायमान रखा। संयोग देखें जिस भवन में सिंधियाजी ने केन्द्र की स्थापना की थी वर्तमान में भी उसी भवन में शासकीय प्रशिक्षण केन्द्र एवं साड़ी संग्रहालय शासन द्वारा संचालित है।

आशय यह है कि चन्देरी साड़ी एवं अन्य कपड़ा एक लम्बी सफल यात्रा तय करते हुए देश आजादी के बाद 1 नम्बवर 1956 ई. को म.प्र. राज्य गठन के साथ शासन सरंक्षण में आज भी हमारे समक्ष अतीत की दास्ता सुनाने में सक्षम है।

चन्देरी साड़ी का महत्वपूर्ण पहलू है उसका निर्माण करने वाले बुनकर आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्राप्त वंशानुगत हुनर को बखूबी सहेजे हुए हैं। उन्हें किसी प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं है। देखी जाने वाली बात यह है कि साड़ी निर्माण प्रक्रिया में बुनकर परिवार के सभी सदस्यों का कुछ- न-कुछ सहयोग अवश्य शामिल रहता है।

क्योंकि साड़ी बनाने की विधि थोड़ी जटिल रहती है। हाथकरघा के ताना-बाना में जब यह सूती-रेशमी धागों का समिश्रण पहुँचता है। उसके पूर्व इन धागों को कई अवस्थाओं से गुजरना पड़ता है। जिसमें एक से अधिक मजदूरों का श्रम शामिल रहता है। अतएव एक बार में बारह साड़ी का कच्चा मटेरियल तैयार किया जाता है ताकि बार-बार की परेशानियों से बचा जा सके।

रियासतकाल में साड़ी में उपयोग किया जाने वाला धागा-सूत स्थानीय स्तर पर ही हाथ से तैयार कर उसे मजबूती प्रदान करने के लिए स्थानीय जंगली वनस्पति के रस का समावेश किया जाता था। आजकल रेशम, कतार, कॉटन-सूती, मसराईज्ड कॉटन धागा एवं जरी देश के धागा-जरी व्यापारी उपलब्ध करा रहे हैं। पूर्वकालीन साड़ी में मात्र असली जरी (सोना-चाँदी युक्त) का उपयोग होता था, वर्तमान में असली एवं सादा दोनों का उपयोग चलन में है।

साड़ी उत्पादन क्रिया में सर्वप्रथम बुनकर ताना में उपयोग किए जाने वाले रेशम एवं बाना में उपयोग किए जाने वाले कतान धागा की रंगाई कर आगामी कार्य ताना भरने का करता है जिसे स्थानीय स्तर पर बीम भरना कहा जाता है। अधिकतर यह कार्य रास्तों अथवा खुले मैदान में किया जाता है क्योंकि ताना भरने में लम्बे स्थान की आवश्यकता होती है। इसके बाद ताना जुड़ाई, नाका बाँधना, डिजाईन बाँधना आदि कार्य पूर्ण किए जाते हैं।

ठीक इसी प्रकार बाना में उपयोग किए जाने वाले धागा कतान आदि रंगाई उपरांत बाबीन भरना नामक प्रक्रिया से गुजरते हैं। इस क्रिया में निवास पर ही अधिकतर महिलाएँ छोटा चरखानुमा उपकरण चला कर पूर्ण करते हैं जिसे विमल भरना कहा जाता है एवं उपयोग में लाए जा रहे उपकरण को चरखा पलीता कहा जाता है।

उक्त क्रियाएँ सम्पन्न होने के उपरांत धागा हाथकरघा ताना-बाना में अपनी जगह सुनिश्चित करता है। अब बारी है बुनकर द्वारा साड़ी निर्माण (बुनाई) करना, साड़ी बुनाई के साथ-साथ माँग अनुसार छोटी-बड़ी बूटी, बार्डर, डिजाइन तैयार करना। अंत में खूबसूरत पल्लू की बुनाई की जाती है, सब मिला कर परिणाम जो सामने आता है उसका नाम है चन्देरी साड़ियाँ । 

पेट की भूख शांत करने वाली यह सम्पूर्ण प्रक्रिया मजदूर-बुनकर के जीवन का अभिन्न अंग है। पूर्वकाल में एक हाथकरघा पर दो मजदूर चाहे वह पुरुष हो या महिला एक साथ बैठकर कार्य करते थे, वर्तमान में अधिकतर एक मजदूर ही कार्य कर रहा है। कभी-कभी महिला-पुरुष को एक साथ एक ही हाथकरघा का कार्य करते हुए देखा गया है।

साड़ी उत्पादन मुख्यता तीन क्षेत्र में किया जा रहा है। प्रथम निजी क्षेत्र इसमें बुनकर स्वयं निवेश कर स्वयं साड़ी तैयार कर कहीं भी विक्रय कर देता है, लेकिन ऐसे बुनकरों की संख्या न्यून है। द्वितीय मजदूरी क्षेत्र इसमें बुनकर मास्टर बुनकर से सभी कच्चा मटेरियल प्राप्त कर, साड़ी की डिजाइन अनुसार मजदूरी तय उपरांत साड़ी तैयार कर मास्टर बुनकर के यहाँ जमा कर देता है और तयशुदा मजदूरी प्राप्त कर लेता है। नगर के अधिकांश बुनकर इस श्रेणी में आते हैं। तृतीय सहकारी क्षेत्र जिसमें बुनकर सहकारी समिति के माध्यम से इस कुटीर उद्योग से जुड़े हुए हैं। नगर में एक दर्जन से अधिक बुनकर सहकारी समिति में कार्यरत है।

ठीक इसी प्रकार क्षेत्र में प्रथम शासकीय क्षेत्र-जिसमें म.प्र. शासन के उपक्रम देश भर में फैले शासकीय 'मृगनयनी' नामक शोरूम के माध्यम से विक्रय करते हैं। द्वितीय निजी क्षेत्र-बुनकर एवं मास्टर बुनकर अपनी योग्यतानुसार साड़ी विक्रय करते हैं। सहकारी क्षेत्र में समितियाँ हाट-बाजार, शासन द्वारा आयोजित मेला-प्रदर्शनी इत्यादि के माध्यम से विक्रय करते हैं।

भारत सरकार द्वारा विदेशों में आयोजित प्रदर्शनियों में विशेष रूप से जर्मनी, इटली, बिट्रेन, पेरिस में चन्देरी वस्त्रों ने प्रभावशाली छाप छोड़ कर निर्यात हेतु नए द्वार खोल दिए हैं। फलस्वरूप 1999 ई. में इटली के लिए हाथकरघा निर्मित वस्त्र जिसमें करटेन, कवर, कुश्न कवर, ड्रेस मटेरियल, पर्वा आदि का निर्यात किया गया।

साड़ी निर्माण क्षेत्र में प्रमुख रूप से मुस्लिम, कोली समुदाय के अलावा अन्य वर्ग की भी महती भूमिका सम्मलित है। यानि सभी समाज की सहभागीदारी नगर के सद्भाव भाईचारा आपसी मेल-मिलाप का माध्यम बन कर सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय एवं जीयो और जीने दो में का अटूट विश्वास करने की प्रेरणा प्रदान करते हुए चन्देरी साड़ियाँ हिन्दुस्तान के मशहूर शायर इकबाल की निम्नलिखित पँक्तियाँ दोहराने को विवश कर देने का जरिया हैं।

मजहब नहीं सिखाता,

आपस में बैर रखना।

हिन्दी हैं हम,

वतन है हिन्दोस्ता हमारा।।

 चन्देरी साड़ियाँ सदियों से अपनी पारदर्शितायुक्त बारीक बुनाई तथा साड़ियों पर बनाई जा रही बूटी के लिए प्रसिद्ध है। नजाकत-महीनता साड़ी का महत्वपूर्ण घटक होकर अपने आप में अनोखा लक्षण है। साड़ियों पर बूटी कारीगर के हाथ एवं करघा के मिश्रित मेहनत का फल है। हाथ से बनी हुई बूटी स्थाई रहती है।

चन्देरी साड़ी की विशेषता ही कहीं जायेगी कि साड़ी के बार्डर में जो डिजाइन चौड़ी बार्डर सूती-रेशमी छोटे-बड़े बेलबूटे बनाए जाते हैं। चन्देरी साडी अन्य साड़ियों के मुकाबले हल्की होती है। चन्देरी साड़ी पर मोर, बखत, विभिन्न झाड़, फूल-पत्ती आदि की आकृतियाँ साड़ी को और भी सुन्दर बनाती है।

बुनाई कार्य में दक्ष बुनकर को यह महारथ हासिल है कि वह किसी भी प्रकार की डिजाइन साड़ी पर बुनाई के माध्यम से प्रदार्शित करते है। चन्देरी पत्थरों का ऐतिहासिक नगर होने के कारण मध्यकालीन स्मारकों पर बेहद खूबसूरत पेचीदा डिजाइने, नक्काशी उत्कीर्ण है, जिसे बुनकर साड़ी पर बनाई के माध्यम से उजागर करते रहते है।

लगभग 35 हजार आबादी वाला यह मझौला कस्बा में आधी से अधिक आबादी प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से इस कुटीर उद्योग से जुड़ी हुई है। लगभग छः हजार हाथकरघा बुनकरों के निवास स्थलों पर स्थापित होकर रास्तों से गुजरने वाले राहगीर-पर्यटकों को खट-खट की आवाज सुना कर आकर्षित कर रहे है। यही क्षेत्रीय सासंद श्री ज्योतिरादित्य सिधिया के प्रयासों से स्थापित हेण्डलूम पार्क में 240 बुनकर एक छत के नीचे खुली स्वच्छ-स्वस्थ हवा में साड़ी निर्माण कर आ रहे पर्यटकों की जिज्ञासाओं का समाधान कर रहे है।

वर्तमान समय में चन्देरी के दस्तकारों द्वारा हर वर्ग को लुभाने वाली साड़ियों को निर्माण किया जा रहा है जिनमें पुराने डिजाइन भी शामिल हैं। कुछ डिजाइन ऐसे हैं जिनका उपयोग विशेष अवसर या शादी-विवाह आदि के मौके पर किया जाता है जैसे-नक्शी टिसू, जैकार्ड बार्डर, मेंहदी लगे हाथ, नाल फेरमा, अड्डा बार्डर, पटेला आदि।

साड़ी के अलावा चन्देरी सूट को भी खूब पसंद किया जा रहा है, उत्पादन अंतर्गत विभिन्न डिजाइन प्रचलन में है। सादे कपड़े के अलावा कुर्ता, शर्ट, रूमाल, पर्दा, कुशन कवर, दुपट्टा आदि का उत्पादन निरंतर जारी है। ओढ़नी, साफा और पगड़ी भी उपलब्ध हैं। पूर्वकाल में चन्देरी निर्मित साफा और पगड़ी, साड़ी की तरह प्रसिद्ध हुआ करते थे। सिंधिया राजघराना के अलावा देश के विभिन्न राजवंशों विशेषकर होल्कर, कोल्हापुर, बडौदा में चन्देरी पगड़ी बाँधने का प्रचलन आम था। बड़ौदा के महाराजा गायकवाड को चन्देरी पगड़ी बेहद पसंद होने के कारण वह हमेशा यही पगड़ी बाँधते थे।

2004 में भारत सरकार द्वारा विधिवत जी.आई. टैग प्राप्त नगर की जीवन रेखा कही जाने वाली चन्देरी साड़ियाँ एवं उन्हें निर्मित करने वाले बुनकरों ने अपने कला- कौशल के दम पर एक बार नहीं कई बार चन्देरी का नाम रोशन करते हुए उपलब्धियाँ हासिल की है। यहाँ के बुनकर भारत सरकार द्वारा जारी राष्ट्रीय सम्मान के अलावा राज्य स्तरीय सम्मान प्राप्त कर अपने हुनर का जलबा बिखेर रहे है।

26 जनवरी 1992 दिल्ली राजपथ पर म.प्र. शासन झाँकी के माध्यम से चन्देरी साड़ी बुनाई का प्रत्यक्ष प्रदर्शन बुनकरों की सफल कहानी है। यही नहीं अनेक बुनकर (पुरुष-महिला) शारजाह, इग्लैण्ड, दुबई, नेपाल, पाकिस्तान, जर्मनी आदि देशों की विदेश यात्राएँ कर चुके है। 2010 में दिल्ली में आयोजित कामनवैल्थ खेलों में विजेता खिलाड़ियो के गले में डाला जाले वाला स्कार्फ चन्देरी हाथकरघा की देन रही है।

यूँ तो चन्देरी साड़ी के चाहने वाले देश के प्रत्येक कोने में मौजूद है, वही दूसरी और वॉलीवुड का चन्देरी साड़ी प्रेम किसी से छुपा नहीं है। फिल्मी दुनियाँ की नामी- गिरामी अभिनेता-अभिनेत्रियाँ, पार्श्व गायक चन्देरी साड़ी की जबरदस्त प्रशंसक ही नहीं चन्देरी साड़ी का उपयोग कर आत्मसतुष्ठि, सुखद अनुभव का एहसास भोग रही हैं। भजन गायक अनूप जलोटा एवं सूफी गायक कैलाश खेर का चन्देरी आगमन उपरान्त चन्देरी वस्त्रों की दिल खोलकर प्रशंसा करना हमारी यादें हैं।

अभिनेत्री हेमा मालिनी, श्रीदेवी, विद्या वालन, मंदिरा बेदी आदि के अलावा 2009 में आमिर खान करीना कपूर का चन्देरी आगमन, बुनकरों के साथ बैठ कर उनके सुख-दुःख पूछना, साड़ी खरीदना, करीना कपूर द्वारा खरीदी गई साड़ी करीना साड़ी के नाम से भारत में प्रसिद्ध होकर माँग आज तक जारी रहना उल्लेखनीय है।

2018 में फिल्म सुई धागा की शूटिंग हेतु अभिनेता वरूण धवन अभिनेत्री अनुष्का शर्मा का चन्देरी आगमन, एक माह शूटिंग करना, अनुष्का शर्मा द्वारा साड़ी खरीदना तद्उपरान्त अनुष्का साड़ी के नाम से चलन में आकर माँग बढ़ना चन्देरी साड़ी का कामयाब फलसफा है।

1 मई 2019 मजदूर दिवस के मौके पर महामहिम म.प्र. राज्यपाल श्रीमती आनंदी बेन का चन्देरी आगमन, बुनकरों के निवास पर जाकर चन्देरी साड़ियों की बारिकियाँ समझना, साड़ी निर्माण को देखना चन्देरी साड़ी के लिए शुभ और सुखद अनुभूति है। यूनेस्कों क्रिएटिव सिटी अंतर्गत चन्देरी टेक्सटाइल श्रेणी में चयन हेतु प्रतीक्षारत है।

आज पश्चिमी सभ्यता की हवाओं द्वारा भारतीय वस्त्र शिल्पकला को प्रभावित करने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। बावजूद इसके सब कुछ होते हुए भी भारतीय परिवेश में पारम्परिक सतरंगी धागों के माध्यम से चन्देरी साड़ियाँ अपने लोक संस्कृति, सांस्कृतिक विरासत को बखूबी सहेजे हुए हैं। दुनियाँ में आज सब कुछ बदला-बदला सा है, नहीं बदला तो वह है चन्देरी साड़ी, वस्त्र आदि का निर्माण प्रक्रिया। निःसंदेह हाथकरघा वस्त्र कुटीर, हस्त शिल्पकला अपने आप में गौरवमय अतीत का आईना ही नहीं जिंदा चलती-फिरती विरासत-इतिहास है।