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ग्वालियर के मराठों की पोशाक (वस्त्र)
August 30, 2019 • नरेश कुमार पाठक

ग्वालियर रियासत के मराठों की पोशाक के संबंध में कप्तान सी.ई. लुअर्ड ने गजेरियर रियासत ग्वालियर 'इलाहाबाद 1912 के पृष्ठ 368-369 पर दिया गया है। पोशाक के लिहाज से मराठे अगरखा पहनते थे, उनके नीचे कुरता रहता है, पाजामा चुस्त होता है, पंगड़ी निकोनी होती है, बगल में एक दुपट्टा रहता है, दक्षीणी ब्राह्मणों की पोशाक वैसी है, जैसी मराठों की। लेकिन वह आमतौर से पायजामे की बजाय धोती इस्तेमाल करते है। उनकी पगड़ी गोल चक्करदार होती है, गर्मियों का अंगरखा सफेद लकलार या मलमल का होता है, कुर्ता और पायजामे भी सफेद होते है, दुपटा या तो सफेद होता है या रंगीन। लेकिन पगड़ी आमतौर स गहरी सूर्ख रंग की होती है, जाड़े में अवरें का अंगरखा पहना जाता है, जिसके लिये ग्वालियर मशहूर है। अमीरों के अंगरखों में लेस यानी चमक पट्टी लगी रहती है, और पेश में दाहिने कन्धे की नीचे कमर तक जरदोजी के काम की रेशमी धुन्डियाँ लगी हुई, बड़ी खूब सूरत मालूम होती है। सरदार साहिबान सुनहरी रूपहरी जरदोजी काम की सांटन या रेशम इस्तेमाल करते हैं, ग्वालियर के अगरखो का फेशन ऐसा नहीं है, जैसा कि इधर के मुल्के के दूसरे हिस्सों में है। इनमें सांटन के अस्तर वाले बड़े-बड़े कफ होते है, जिनको नीचे से लौटकर करीब कोहनी तक इस गरज से ले आते है, कि रंगीन चमकदार अस्तर नजर आता रहे मराठा और दक्षिणी ब्राह्मणों की ओरतें कन्धे से रखने तक नीली साढी पहनती है, यह साढ़िया आठ नौ गज लम्बी होती है, और उनका अर्ज 44 से 52 तक होता है। इन को या तो देशी जुलाहे बनाते या महेश्वर, लुरहानपुर, चन्देरी, अहमदाबाद और बनारस से मंगवा लेते है। देसी ब्राह्मणों और वैशों की पोशाक ज्यादातर वैसी है, जैसी दक्षिणियों की लेकिन पगड़ी मुख्तलिक किस्म की बहुत छोटी और हल्की होती है, इनकी ओरतों को पोशाक में धोती या दुपटा और लहंगा शामिल है, मुसलमानों के अंगरखों में सिफ यह फर्क होता है, कि हिन्दुओं के अंगरखे का गिरेबान दाहिने तरफ होता है और मुसलमानों के अंगरखे का वायीं तरफ मुसलमानों की ओरते ओढ़ती है, उनके नीचे एक कुरता और पायजामा पहनती है, आडी कौनों के कपड़ों में धोती, मिर्जई या बन्डी और पगड़ी या साफा है, लेकिन सिवाय तीज त्यौहार के मौकों के देसी कपड़ों की बजाय यूरोपियन होने लगे है। आज तक शहर की निहायत पसन्दीदा पोशाक में जोधपुर वृचेज, लम्बा पारसी कोट मय नेक टाई कॉलर और जरदोजी का काम की कुहाल पर बंधा हुआ साफा शामिल है।