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ग्लोबल वार्मिंग व जल-संकट का भ्रम
April 1, 2017 • Dr. A.Kritivardhan

भौतिक सुख की दौड़ में, दौड़ रहे जो लोग,

प्रदूषण फैला रहे, नहीं सत्य का बोध।

ए.सी, कूलर, फ्रीज से, गैसों का उत्सर्जन,

जल में भी करने लगे, रसायनों का उपयोग।

जी हाँ, वातानुकूलित कमरे में बैठनेवाले, गाड़ियों में चलनेवाले तथा नदियों में रसायनयुक्त जल व नगर की नालियों का पानी मिलानेवाले प्रकृति के सबसे बड़े दुश्मन हैं, मगर विकास की परिभाषा भौतिक सुख माननेवाले विकसित देश अपनी आर्थिक समृद्धि को बनाए रखने के लिए विकासशील देशों के मन-मस्तिष्क में यह बात बैठाने में पूर्णतया सफल हैं कि राष्ट्र का विकास भौतिक साधनों की वृद्धि से ही सम्भव है। कभी ग्लोबल वार्मिंग तो कभी जलसंकट, ओजोन परत विवाद, प्रदूषण, आदि सभी विषय विकसित देशों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम हैं।

भारत का आधार प्रकृति है। हमारे यहाँ जल, धरा, आकाश, वृक्ष, अग्नि, पत्थर- सभी कुछ पूजनीय हैं। हमारी अवधारणा हैकि भगवान् पाँच तत्त्वों- भू, गगन, वायु, अग्नि व नीर से मिलकर बना है। प्रकृति के इन पाँचों तत्त्वों की दिन-प्रतिदिन पूजा की प्रावधान ही भारतीय संस्कृति है। पीपल, नीम, तुलसी, बड़ (वट), आदि सभी वृक्षों की पूजा, सुरक्षा एवं संरक्षा, नदी, तालाब व सरोवरों का संरक्षण, वायुमण्डल को शुद्ध बनाए रखने के लिए हवन आदि सभी धार्मिक क्रियाएँ अंधविश्वास नहीं अपितु प्रकृति को संरक्षित रखने के वैज्ञानिक एवं दूरदर्शी उपाय ही हैं।

आधुनिक वैज्ञानिकों का लक्ष्य समग्रता और पूर्णता के साथ बिना सृष्टि का विकास नहीं है। प्रत्येक वैज्ञानिक एक निश्चित दृष्टि से (जिस प्रकार घोड़े की आँख पर कवच- मोहरा) देखता और शोध करता है तथा अपने शोध पर आधारित परिणाम प्रस्तुत करता है। स्वार्थी राजनेता, व्यापारी व संस्थाएँ अपने लाभ के आधार पर इन विचारों का प्रचार-प्रसार करती हैं। भारत के गाँव-गाँव तक पैर पसारते घरों में लगनेवाले वाटर प्योरीफायर उपकरण इसी व्यापारिक सोच का परिणाम हैं। ऐसा प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है जैसे कुएँ, नहर या नल से पानी पीनेवाले बीमार पड़ जाएँगे, मर जाएंगे, किसलिए? हो सकता है कि किसी नगर या क्षेत्रविशेष में कोई समस्या हो, तो यह वहाँ की सरकार का दायित्व है कि समस्या का समाधान करे। ग्लोबल वार्मिंग की बात करें, तो बड़ी भयावह तस्वीर दिखाई जाती है। ऐसा लगता है कि हमारी धरती जल जाएगी, सारे ग्लेशियर पिघल जाएँगे, समुद्रों के किनारेवाले शहर डूब जाएँगे। यह भयावह-डरावना दृश्य ही विकसित देशों के विकास का खेल है। यह कटु सत्य है कि नगर की तुलना में गाँव में गर्मी का प्रकोप कम है, बाग-बगीचों में तापमान अत्यधिक कम है। नदियों-तालाब व सरोवरों के नजदीक रात्रि में इतना ठण्ढा हो जाता है कि वहाँ बिना कपड़ा ओढ़े सो नहीं सकते, मगर किसी भी विकसित देश ने अपने यहाँ अथवा विकासशील देशों में वृक्षारोपण पर कोई जोर नहीं दिया। दूसरी बात ग्लोबल वार्मिंग से पिघलनेवाली बर्फ आखिर कहाँ गयी? नदियों में कहीं भी जलस्तर नहीं बढ़ा। भूजलस्तर भी नहीं बढ़ा, फिर वह पानी कहाँ गया? तीसरी बात, ग्लोबल वार्मिंग का असर यदि ग्लेशियरों के पिघलने पर पड़ रहा है तो इसका असर पानी के वाष्पीकरण पर भी तो पड़ना चाहिए। यदि पड़ रहा है, तो वर्षा में वृद्धि क्यों नहीं? विश्व में सर्वाधिक वर्षावाला स्थान चेरापूँजी भी अब बरसात को । तरसता है। अब बात करते हैं समुद्र के जलस्तर के बढ़ने की, तो यह बात तो बिल्कुल सच है कि समुद्र में जलस्तर बढ़ रहा है, परन्तु क्या केवल ग्लेशियरों के कारण? विचार कीजिए, समुद्र के किनारों । का अतिक्रमण कर नये-नये नगर बसाना, सभी औद्यौगिक व नगरीय कचरे का समुद्र में निस्तारण, अत्यधिक मात्रा में विशाल जलपोतों का समुद्र पर दबाव भी समुद्रीय जलस्तर बढ़ने के कारण हैं। विकसित देशों ने तो समुद्र के अन्दर सड़कें, रेल-लाइनें तथा दुबई-जैसे आर्थिक सम्पन्न देशों ने विशाल भवन तक समुद्र के अन्दर ही खड़े कर दिए हैं।

ग्लोबल वार्मिंग के सन्दर्भ में वैज्ञानिकों द्वारा बताया जा रहा है कि इसके लिए ग्रीन हाउस गैसें ज्यादा ज़िम्मेदार हैं, जिसमें कार्बन-डाइ-ऑक्साइड सबसे अहम् है। कार्बन-डाइ-ऑक्साइड यानि सीओ2 का उत्सर्जन हम लोग अपनी साँस से भी करते हैं। अब भारतीय संस्कृति के इस पहलू पर भी विचार करें कि मनुष्यों के आवास के पास फलों के छायादार वृक्ष हों। पीपल, बरगद व तुलसी की पूजा, काटने पर पूर्णतया प्रतिबन्ध आखिर क्यों? यही है। वैज्ञानिक सच कि वृक्ष कार्बन-डाइऑक्साइड को खींचते हैं और बदले में ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं। पीपल आदि वृक्ष 24 घंटे ऑक्सीजन देते हैं यानी जितना भी कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का उत्पादन, वह सब वृक्षों द्वारा शोषण। जिस जगह वृक्षों की रखवाली, वहाँ गर्मी पर लगा निशान सवाली? यानी गर्मी का सत्र बहुत कम- परिणामतः ए.सी., फ्रिज कीआवश्यकता खत्म। अर्थात् ग्रीन हाउस गैस के उत्पादन में कमी। कहने का तात्पर्य यह है कि मुद्दा ग्लोबल वार्मिंग नहीं है अपितु मनुष्य द्वारा निज स्वार्थों में वन का संहार है।

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