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ग्राम्य भारत के अभिनव प्रयोगकर्ता : नानाजी देशमुख
March 1, 2017 • Gunjan Aggrawal

  पं. दीनदयाल उपाध्याय द्वारा प्रणीत ‘एकात्म मानववाद’ दर्शन को व्यावहारिक धरातल पर उतारने का वास्तविक प्रयोग, प्रसिद्ध । समाजसेवी पद्म विभूषण चण्डिकादास अमृतराव (नानाजी) देशमुख ने किया है। नानाजी देशमुख ने सामाजिक- आर्थिक पुनर्रचना की प्रयोगशाला के तौर पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की। दीनदयाल शोध संस्थान ने ग्रामीण विकास के कई अनुकरणीय नमूने विकसित किए हैं और सफलतापूर्वक चलाए हैं। इसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलम्बन, गो-संवर्धन और कृषि विकास के प्रकल्प शामिल हैं।

मराठवाड़ा के तत्कालीन परभणी जिले में हिंगोली तालुका के कडोली गाँव में अमृतराव देशमुख और राजाबाई के घर 11 अक्तूबर, 1916 को उनकी पाँचवीं संतान चण्डिकादास ने जन्म लिया। शैशवावस्था में ही यह बालक अनाथ हो गया। बड़े भाई आबाजी देशमुख ने लालन-पालन किया। आसपास विद्यालय नहीं था। ग्यारह वर्ष की आयु तक अक्षर-ज्ञान से दूर इस बालक नेरिसोड़ नामक जगह पर पढ़ाई शुरू की। विद्यालय के शिक्षक चण्डिकादास की मेधा से प्रभावित हुए। यहीं पढ़ाई के दौरान इनका परिचय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से हुआ। आठवीं कक्षा के पश्चात् इन्हें रिसोड़ छोड़कर वाशिम आना पड़ा। वहाँ एक पाठक-परिवार में इन्हें आश्रय मिला, जहाँ वह उस घर के काम-काज में हाथ बँटाते। वाशिम में संघ-संस्थापक डॉ. केशवराव बळिराम हेडगेवार (1889-1940) बहुधा आते थे। धीरे-धीरे चण्डिकादास संघ से अच्छी तरह जुड़ गये।।

सन् 1937 में मैट्रिक-परीक्षा उत्तीर्ण होने के बाद आगे की पढ़ाई के चण्डिकादास ने शहर से फल-सब्जी आदि ख़रीदकर थोड़ा मुनाफ़ा लेकर संपन्न परिवारों में पहुँचाना प्रारम्भ किया। इस तरह इकट्ठे धन से उन्होंने राजस्थान के पिलानी ज़िला कॉलेज में दाखिला लिया। वहाँ की एक घटना उल्लेखनीय है, जिससे ज्ञात होता है कि भविष्य में चण्डिकादास सामाजिक कर्म में संलिप्त होंगे। कॉलेज के संस्थापक सेठ घनश्यामदास बिड़ला ने चण्डिकादास की योग्यता, कर्मठता, आत्मविश्वास और विश्वसनीयता से प्रभावित होकर प्राचार्य सुखदेव पाण्डेय से कहा कि मैं इस युवक को अपना निजी सहायक बनाना चाहता हूँ। इस एवज़ में उसे प्रतिमाह अस्सी रुपए वेतन एवं भोजन, आवास की सुविधा देने की इच्छा जतायी। चण्डिकादास की आर्थिक स्थिति एवं उस देश-काल के लिहाज़ से यह प्रस्ताव आकर्षक था। पर उन्होंने बिड़ला जी का यह प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। वस्तुतः उनके मन में भावी जीवन की रूपरेखा तय होने लगी थी। देश, समाज की सेवा के मार्ग पर चलने का इन्होंने निश्चय कर लिया था, जिसे निकट भविष्य में पूर्णतः निभाना था।

सन् 1940 में चण्डिकादास ने नागपुर में संघ शिक्षा वर्ग के प्रथम वर्ष का शिक्षण प्राप्त किया। वहाँ डॉ. हेडगेवार का अन्तिम भाषण सुना। परिणामस्वरूप तय कर लिया कि आगे पढ़ाई नहीं करनी हैऔर पूर्णकालिक कार्यकर्ता के रूप में कार्य करना है। डॉ. हेडगेवार के अलावा बाबा साहिब आपटे से भी वह बेहद प्रभावित थे। बाबा साहिब आपटे ने इन्हें भाऊ जुगादे के साथ संघ-कार्य के लिए आगरा भेज दिया। तब चण्डिकादास की उम्र चौबीस साल थी। इसी दौरान पं. दीनदयाल उपाध्याय कानपुर से बी.ए. पास कर एम.ए. की पढ़ाई के लिए आगरा आए थे। दीनदयालजी भी संघ के एक अच्छे कार्यकर्ता बन चुके थे। अतः आगरा में तीनों कार्यकर्ता एक कमरे में रहने लगे। साथ रहने से इनकी दोस्ती प्रगाढ़ हुई, जो जीवनभर क़ायम रही। आगरा में कुछेक माह रहने के बाद चण्डिकादास गोरखपुर भेजे गये। उन्हीं दिनों देश स्वाधीन हुआ और कुछ ही महीने बाद महात्मा गाँधी की हत्या हो गयी। उस घटना के बाद देश में व्यापक गिरफ्तारियाँ हुईं, जिनमें चण्डिकादास भी शामिल थे।

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