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गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय और अंतरराष्ट्रीय श्रीकृष्ण भावनामृत संघ
February 1, 2017 • Parmod Kumar Kaushik

गाैडीय वैष्णव संप्रदाय की I आधारशिला 16वीं शती में बंग और उत्कल क्षेत्र में भक्तियोग के परम प्रचारक चैतन्य महाप्रभु (1486-1534) द्वारा रखी गई थी। इसलिए इस सम्प्रदाय को ‘चैतन्य सम्प्रदाय' भी कहा जाता है। इस सम्प्रदाय का दर्शन अचिन्त्यभेदाभेदवाद है। इस सम्प्रदाय का विश्वास है कि चैतन्य महाप्रभु भगवान् कृष्ण के प्रेमावतार थे। चैतन्य द्वारा प्रारम्भ किए गए 32 अक्षरोंवाले तारकब्रह्ममहामंत्र नामसंकीर्तन (हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे) का अत्यंत व्यापक व सकारात्मक प्रभाव आज पश्चिमी जगत् तक में है।

चैतन्य ने जिस मत का प्रचार किया, उसके विषय में स्वयं कोई ग्रंथ नहीं लिखा। उनके सहकारी अद्वैताचार्य और नित्यानन्द का भी कोई ग्रंथ नहीं मिलता। चैतन्य के दोनों शिष्य- रूप गोस्वामी और सनातन गोस्वामी के कुछ ग्रंथ मिलते हैं। उनके बाद उनके भतीजे जीव गोस्वामी दार्शनिक क्षेत्र में उतरे। इन्हीं तीनों आचार्यों ने अचिन्त्यभेदाभेद मत का वर्णन किया है। परन्तु इन्होंने भी न तो ब्रह्मसूत्र पर कोई भाष्य लिखा और न वेदान्त पर कोई प्रकरण-ग्रंथ की रचना की। अठारहवीं शती में बलदेव विद्याभूषण ने पहले-पहल अचिन्त्यभेदाभेदवाद के अनुसार ब्रह्मसूत्र पर गोविन्दभाष्य लिखा। रूप, सनातन आदि आचार्यों के ग्रंथों में में श्रीकृष्ण की दो प्रकृतियाँ- अक्षर व अर बताई गई हैं। श्रीकृष्ण की चैतन्य प्रकृति को ब्रह्म का रूप माना जाता है, परन्तु इसमें यह भी दर्शित है कि लीलापुरुषोत्तम तो अक्षर ब्रह्म से भी परे है और उन्हीं का रूप अन्तर्यामी बनकर प्राणीमात्र के हृदय में स्थित है। महाप्रभु वल्लभाचार्य ने इस जगत् को ही श्रीकृष्ण का आधिभौतिक रूप मानते हुए इसे भगवान् का कार्य माना तथा यह प्रतिपादित किया कि यह समूचा जगत् ही श्रीकृष्ण का लीलाक्षेत्र है। पुष्टि का अर्थ पुष्ट करने से होता है। वल्लभ संप्रदाय में भगवान् की पूजा पुष्टि-पद्धति से ही सेवित होती है।

वल्लभचार्य ने पुष्टिमार्ग के सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार के लिए तीन बार सम्पूर्ण भारत की परिक्रमा की। इस परिक्रमा को ‘धर्म क्रान्ति' और 'वल्लभ-दिग्विजय' कहा जाता है। महाप्रभुजी ने चौरासी बैठकों की स्थापना करके सुदूर उत्तर से दक्षिण तक एवं पूर्व से पश्चिम तक सम्पूर्ण देश को सांस्कृतिक एकता के रूप में जोड़ने का अनूठा कार्य किया। आपने इस सांस्कृतिक क्रान्ति में अपना स्थान आंध्र से हटाकर उत्तरप्रदेश में प्रयाग के पास गंगातट पर अडैल नामक स्थान पर स्थापित किया। श्रीनाथजी श्रीमद्वल्लभाचार्य के प्रमुख सेव्य स्वरूप हैं। उन्हें भक्ति दर्शन का संदेश श्रीनाथजी से ही प्राप्त हुआ था। श्रीनाथजी की प्रतिष्ठा के उपरांत पुष्टिमार्ग में सप्तपीठों की स्थापना हुई। महाप्रभुजी के विषय में मान्यता है कि वे आज भी अग्निपुंज गिरिराज जी की बैठक में विराजमान हैं। उनके द्वितीय पुत्र विठ्ठलनाथ जी ने अपने सातों पुत्रों को सात स्वरूप सौंप दिये। इन सात पुत्रों ने भारत में सात पीठों की स्थापना की जो इस प्रकार है

इस प्रकार वल्लभ संप्रदाय ने अपने सिद्धांतों व परिवेश से तत्कालीन भारतीय परिवेश की भावनात्मक एकता में महान् योगदान दिया। इस संप्रदाय को इतिहास की दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि इसने वास्तुकला, मूर्तिकला और चित्रकला को काफी प्रभावित किया। 15वीं-16वीं शती में ब्रजभूमि से विशेष रूप से राजस्थान में आगत वल्लभ-संप्रदाय के भक्तों द्वारा कलात्मक दृष्टि से अत्यधिक वैभव एवं वैशिष्ट्यपूर्ण मन्दिरों के निर्माण की परम्परा निरन्तर समृद्ध हुई। इनमें वल्लभ- संप्रदाय के मतानुयायियों द्वारा श्रीनाथद्वारा में 1671 ई. में प्रतिष्ठित अति वैभवशाली श्रीनाथजी का मन्दिर, 1719 ई. में निर्मित कांकरोली का भव्य श्रीद्वारकाधीश मन्दिर, 1744 में स्थापित कोटा का श्रीमथुराधीश मन्दिर उल्लेखनीय है।

वल्लभ-सम्प्रदाय के मन्दिर वस्तुतः वास्तुकला में मन्दिर का स्वरूप न होकर हवेली परम्परानुसार बनाए गए जिनमें कोई शिखर नहीं होता। संप्रदाय के विद्वानों का मानना है कि वल्लभ-संप्रदाय में शिशु कृष्ण की पूजा सेवित है। बाल गोपाल उस समय बाबा नन्द की हवेली में पोषित हुए, अतः उनके मन्दिर हवेली परम्परानुसार ही निर्मित होते रहे। इस संप्रदाय के ब्रजभूषण, दामोदर व गोविन्द जी जैसे संत मुख्य हैं। सूरदास, कुंभनदास, छीतस्वामी आदि अष्टछाप कवियों ने संगीत का भक्ति से समन्वयकर उसे उच्चतम शिखर पर पहुँचाया। पुष्टिमार्गीय मन्दिरों में भव्य एवं नयनाभिराम श्रीकृष्ण अथवा श्रीकृष्ण के विभिन्न देवविग्रहों की प्रतिष्ठा ने देवमूर्तियों की तक्षण कला तथा लालित्य को उत्कृष्टता प्रदान की। इस संप्रदाय के विशेष तौर से राजस्थान में प्रविष्ट होने के अनन्तर चित्रकला की ‘नाथद्वारा शैली' का आरम्भ हुआ।

इस प्रकार वल्लभ-संप्रदाय ने अपने उद्धव से लेकर पूरे देश में अपनी भक्ति, समरूपता, सिद्धान्तों सहित धार्मिक भावना, सेवा, चित्रांकन, मूर्ति एवं स्थापत्यकला से पूरे देश में अपनी अनोखी छाप छोड़ी जो आज के वातावरण में भी अपनी उसी गरिमा के साथ प्रतिष्ठित है। पुष्टिमार्ग वात्सल्यमय भक्ति का एक अनुपम मार्ग है।

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