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गोर धर्म
August 1, 2018 • Kisanrav Rathodh

गोर धर्म यह विशेष धर्म के अंतर्गत आता है। विशेष धर्म उसको कहते हैं कि जो धर्म के विशेष अधिकारानुसार विशेष रूप से विहित हो। विशेष धर्म की महिमा यह है कि विशेष धर्म केसाधन द्वारा ही जीव अपने-अपने अधिकार की उन्नति कर सकता है।

गोर जाति की विशेषतः मौलिकता तथा अन्य जाति के साथ पृथकता समझने योग्य है। आजकल ‘गोर' शब्द को लेकर अनेक प्रकार के वादानुवाद उत्पन्न हो रहे हैं। कोई इसे वंश या जातिसूचक मानता है तो कोई प्रांतसूचक। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि धर्म के साथ ‘गोर' शब्द जुड़ने से इस शब्द का अर्थ ‘श्रेष्ठ' ही हुआ; क्योंकि श्रेष्ठ शब्द का एक अर्थ ‘गोर' ही होता है। इसलिए नानक जी ने बनजारे के एक समूह को 'गोर' (गोर्ह) शब्द से संबोधित किया था- 'गो' यानी भूमि यानी रक्षणा इस अर्थ से सम्पूर्ण भूमि के संरक्षण के उद्देश्य है भ्रमण करनेवाले इस समूह को ‘गोर' यानी ‘श्रेष्ठ' कहना ही उचित होगा।

जो जातिसमूह सृष्टि के नियमन का पालन तथा पञ्चमहाभूतों के पूजन में विश्वास करती है, वही ‘गोर' जाति है। इसके सिवाय धात्वार्थ तथा गुणानुसार भी गोर जाति के अधिक लक्षण होते हैं। ‘गो' अर्थात गतिशील है। गति जो चलता है, करता है वह ‘गोर' जाति श्रेष्ठ ही है। सभी निर्माण-स्थान और साधन ‘गो' ही है। प्रथम निर्माण ब्रह्माण्ड है और उसका निर्माण-क्षेत्र दस गुणा बड़ा ‘गोलोक' है। सूर्य का तेज भी 'गो' है, जिससे जीवन चलता है। यों कहें कि प्राचीन मनिषियों ने हर उस पदार्थ को ‘गो' के दायरे में रखा, जो गतिशील है। इसलिए पृथिवी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, तारे- ये भी ‘गो' ही हैं। इसलिए इसके श्रेष्ठतम लक्षण को ‘गोर' ही कहा गया है। अस्तु।

'गो' का अर्थ भूमि होने से और पूर्वकाल से भ्रमणशील होने की वजह से समस्त 'कोर' जाति से उच्चतम दर्जा प्राप्त कर लेने से इस भूमि-संरक्षक जाति को ‘गोर' कहा गया है। बनजारा धर्मगुरु महान् तपस्वी रामराव जी महाराज ने किसी सभा में इस जाति को 'ईश्वरपुत्र' इसलिए कहा कि ईश्वर के पुत्र को श्रेष्ठ कहते हैं और श्रेष्ठता में ही ‘गोर' शब्द निहित है। निरुक्त में यास्क मुनि ने श्रेष्ठ जाति

निरुक्त में यास्क मुनि ने श्रेष्ठ जाति का लक्षण वर्णन करके उल्लिखित ‘वीरता' के अतिरिक्त आध्यात्मिक पूर्णता का भी प्रमाण श्रेष्ठ जाति के लिए प्रदर्शित किया है, तदनुसार उन लक्षणों से यह सिद्ध होता है। कि, न्यायपथावलम्बी, प्रकृतिप्रेमी, कर्तव्यपरायण जाति ही श्रेष्ठ जाति है।

संसार के सभी जीव प्रकृतिप्रदत्त अन्न से परिपुष्ट होकर अपनी निर्दिष्ट आयु बिताया करते हैं, परन्तु यथार्थ में श्रेष्ठतम जीवन नहीं बिताया, जिसमें आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होकर अपना और जगत् का परम कल्याण हो। अन्यथा प्रकृतिमाता का अन्न ध्वंस कर- के विषय के पंकिल प्रवाह में अपनी आत्मा को डालकर जीवन बिताना ‘कोर सुलभ जीवन धारण है।

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