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गुरु नानक ने भी देखी थी श्रीरामजन्मभूमि
August 1, 2016 • Rajendra Singh

सिक्ख-इतिहास के मौलिक स्रोतों के अध्ययन से ज्ञात होता है कि गुरु नानकदेव ने अपनी पहली तीर्थयात्रा के काल (चैत्र 1564 - फाल्गुन 1566 वि.) में अयोध्या के पावन तीर्थस्थल श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर के दर्शन किए थे। भाई शम्भूनाथ वाली आदि साखीओ : जनमपत्री बाबे नानक जी की (1758 विक्रमी) और पुरातन जनमसाखी श्रीगुरु नानकदेव जी की (1791 विक्रमी) में लिखा है कि गुरु नानकदेव : ‘गंगा गोदावरी गए। प्रयाग, वाराणसी, गोमती, ‘अयोध्या', द्वारका, जगन्नाथ, उड़ीसा इत्यादि अड़सठ तीर्थों के दर्शन किए और सबका फल प्राप्त किया, वहाँ स्नान किया और सब धरती देखी।' (आदि साखीआं, 1758 वि, डॉ. प्यार सिंह द्वारा संपादित, लाहौर बुक शॉप, लुधियाना, तीसरा संस्करण, 1983 ई, पृ. 165,168 तथा पुरातन जनमसाखी श्रीगुरु नानकदेव जी की, 1791 वि., शमशेर सिंह अशोक द्वारा संपादित, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी, अमृतसर, 1969 ई., पृ. 64)।

यह उल्लेखनीय है कि किसी भी तीर्थ के दर्शन का तब तक कोई सार्थक फल प्राप्त नहीं होता जब तक विधि के अनुरूप उस तीर्थ- विशेष में सुप्रतिष्ठित प्रधान देव या देवी की मूर्ति के दर्शन न कर लिए जायें। चूंकि उपर्युक्त दोनों जनमसाखियों में स्पष्ट बताया गया है कि गुरु नानकदेव ने अपने तीर्थयात्रा-काल में सभी 68 तीर्थों का फल प्राप्त किया था, इसलिए यह बात स्वतः सिद्ध हो जाती है कि वहाँ पर ऐसे मन्दिर अवश्य ही विद्यमान थे जिनके गर्भगृह में तत्सम्बन्धी प्रधान देव या देवी की सुप्रतिष्ठित मूर्ति के नानकदेव जी ने दर्शन कए थे।

सुल्तानपुर से अयोध्या की ओर

सुल्तानपुर में दो वर्ष तक उग्र तप करने, गुरु-रूप में प्रतिष्ठित होने और फिर 68 तीर्थों पर जाने का शुभ संकल्प करके गुरु नानकदेव समाणा, कौरा, पिहोवा, कुरुक्षेत्र, पानीपत और दिल्ली होते हुए वैशाखी पर्व 1564 विक्रमी के शुभावसर पर हरिद्वार जा पहुँचे। फिर हरिद्वार में कुछ दिन बिताने के बाद वहाँ से पौड़ी, केदारनाथ, बदरीनाथ, जोशीमठ, लिपुलेख दर्रा, दुर्गापीपल (रीठा साहिब), गोरखमता (नानकमता), टाण्डा और पीलीभीत से होकर गुरु नानकदेव अपने सहयात्री भाई मरदाना के साथ गोला पहुँचे।

गुरु नानकदेव के कनिष्ठ पुत्र बाबा लक्ष्मीचन्द (1553 विक्रमी में जन्मे) के आठवें वंशज बाबा सुखबासी राम बेदी कृत एक पूर्ववर्ती रचना ‘गुरु नानक बंस प्रकाश' (1886 विक्रमी) में गुरु नानक का नैमिषारण्य से होते हुए अयोध्या जाना लिखा हुआ है। अतः इसमें कोई सन्देह नहीं कि गुरु नानकदेव गोला से नैमिषारण्य के मार्ग से अयोध्या पहुंचे थे।

श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर के दर्शन करना

गुरु गोविन्द सिंह के दीवान भाई मनी सिंह अपनी रचना पोथी जनमसाखी (1787 विक्रमी) में बताते हैं : ‘तब बाबा जी अयोध्या को जा पहुँचे और कहा : मरदाना ! यह नगरी श्री रामचन्द्र जी की है। सो चल इसका दर्शन करें। तब बाबा जी नदी पर जा उतरे।' (पोथी जनमसाखी, 1787 विक्रमी, चिरागुद्दीन सिराजुद्दीन मुस्तफाई छापाखाना, लाहौर, 1947 विक्रमी, पृष्ठ 213)।

गुरु नानकदेव ने अयोध्या को रामचन्द्र जी की नगरी' बताकर यह स्पष्ट कर दिया है कि यहाँ के आराध्य श्रीराम हैं। अयोध्या के दर्शन से श्रीगुरु जी का क्या आशय है, इसका भेद भाई बाले वाली जनमसाखी खोलती है। इस सर्वप्रचलित और लोकप्रिय जनमसाखी में साखी तीर्थयात्रा की' शीर्षक से लिखा हैः गुरु जी अयोध्या को गए। श्रीगुरु जी ने कहा : भाई बाला! यह ही नगरी श्री रामचन्द्र जी की है। यहाँ श्री रामचन्द्र जी ने अवतार धारण करके लीला-चरित्र किए हैं। सो देख के ही चलें। तब श्रीगुरु जी सरयू नदी के किनारे पर जा बैठे' (भाई बाले वाली जनमसाखी, 1940 विक्रमी, ज्ञानी महिन्दर सिंह द्वारा संपादित, भाई चतुरसिंहजीवनसिंह, अमृतसिंह, पृ. 261)।

ऐसे लीलास्थल को देख के ही चलने के दृढ़ निश्चयी गुरु नानकदेव के अपने वंशज बाबा सुखबासी राम बेदी अपनी रचना गुरु नानक बंस प्रकाश (1886 विक्रमी, डॉ. गुरमुख सिंह द्वारा संपादित, पंजाबी यूनीवर्सिटी, पटियाला, 1986 ई.) के छन्द 1000-1001 में स्पष्ट बताते हैं : चले तहां से सतिगुरु मरदाना ले संगि।

आए अवध पुरी विखे सरजू नदि जिह संगि॥

सरजू जल मंजन कीआ ‘दरसन राम निहार।

आतम रूप अनंत प्रभ चले मगन हितु धार॥

अर्थात्, वहाँ (नैमिषारण्य) से चले सद्गुरु नानकदेव मरदाना के संग अयोध्यापुरी आ पहुँचे जिस पुरी के संग सरयू नदी बहती है। श्रीगुरु जी ने सरयू नदी के जल में स्नान किया और श्रीराम के निहारकर दर्शन किए।

उपर्युक्त छन्द से यह भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है कि अयोध्या में ‘श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर' नामक लीलास्थल में सुप्रतिष्ठित रामललामूर्ति के गुरु नानकदेव ने निहारकर अर्थात् एकाग्रचित्त होकर दर्शन किए थे। अर्थात् गुरु नानकदेव की यात्रा के समय अयोध्या में श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर निश्चित रूप से विद्यमान था। अतः, ‘अयोध्या-विवाद में एक पक्षकार ‘सुन्नी सेण्ट्रल बोर्ड ऑफ़ वक्फ्स, यूपी के इस कथन में कोई सार नहीं है कि बाबर ने तो खाली जमीन पर मस्जिद बनवाई थी क्योंकि उसके समय में वहाँ ऐसा कोई ‘जन्मभूमि-मन्दिर' था ही नहीं जिसे तोड़कर वह उसे मस्जिद का रूप दे देता !!!

अयोध्या में श्रीगुरु जी का तपभरा निवासकाल 

जनमसाखियों के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि अयोध्या में कुछ मास तक निवास करते हुए गुरु नानकदेव ने श्रीरामजन्मभूमि-मन्दिर के समीप ही तपस्या की थी। इस सन्दर्भ में गुरु अर्जुनदेव के सगे भतीजे और शिष्य सोढ़ी मनोहरदास मेहरबान (1637-1697 विक्रमी) अपनी रचना ‘सच खण्ड पोथी : जनमसाखी श्रीगुरु नानकदेव जी' (1669 विक्रमी, भाग-1, पालसिंह-शमशेरसिंह अशोक द्वारा संपादित, खालसा कॉलेज, अमृतसर, 1962 ई., पृ. 186-187, 190) में बताते हैं : ‘तब गुरु बाबा नानक, पूरब की धरती नगरी अयोध्या में जा बसे... तब अयोध्या में गुरु बाबा नानक बैठे भक्ति करते थे।...

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