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गुरुकुल-परम्परा का संवाहक : कान्यवन शोध संस्थान
May 1, 2017 • Preeti Sharma

राजस्थान के भरतपुर जिले के काम्यवन नामक स्थान पर स्थित ‘काम्यवन शोध संस्थान' प्राचीन गुरुकुल-परम्परा का निर्वहन कर रहा है। इस संस्थान की स्थापना सर्वश्री जगन्नाथदास जी एवं श्यामसुंदर दास जी की प्रेरणास्वरूप सन् 1973 में डॉ. रमेशचन्द्र मिश्र द्वारा की गई तथा संस्कृत- भाषा के प्रचार-प्रसार के लिए इसे समर्पित किया गया। डॉ. रमेशचन्द्र मिश्र ने अथक परिश्रम एवं प्रयासों से इस संस्थान को सींचकर जीवन्तता प्रदान की जो उनके द्वारा आज भी अनवरत जारी है।

इस आश्रम में प्रातःकाल नित्यक्रिया से निवृत्त होकर प्रत्येक विद्यार्थी विधिअनुसार वैदिक संध्या वंदन करता है : संध्या स्नानं जपो होमो देवतानां च पूजनम्।आतिथ्यं वैश्वदेवं च षट्कर्माणि दिने दिने।

उक्तानुसार षट्कर्मों के अभ्यास के साथ प्रातःस्मरण, संध्या, गायत्री मंत्र का जप, तर्पण, बलि, सूक्त पाठ, स्वस्तिवाचन एवं वैदिक पद्धति से विविधोपचारों का संज्ञानपवूक देवपूजन का अभ्यास कराया जाता है। इसके अतिरिक्त सोलह संस्कारों, विभिन्न पुराणों, व्रतकथाओं एवं दुर्गासप्तशती इत्यादि का पाठ कराया जाता है। विभिन्न स्तोत्रों एवं शास्त्रों का विधिपूर्वक अभ्यास कराया जाता है।

रक्षाबंधन (श्रावण पूर्णिमा के दिन गायत्री-जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दिन तीर्थराज विमल कुण्ड पर प्रातः सभी विद्यार्थियों से पापों के प्रायश्चित्त हेतु हेमाद्रि संकल्पपूर्वक दशविध स्नान, दूर्वा-कुशा, अपामार्ग-मार्जन, स्नानांतर्पण, नवीन यज्ञोपवतीत धारण, संध्या-तर्पण, ऋषि- पूजन, ऋषि-तर्पण, ऋषि-श्राद्ध, यज्ञोपवीत-प्रतिष्ठा एवं दान-हवन करवाया जाता है तथा विद्यार्थियों का यज्ञोपवीत- संस्कार भी होता है। यहाँ विशेष पर्वोत्सवों पर अवकाश न रखकर धार्मिक संस्कार कराए जाते हैं। रक्षाबंधन, कृष्णजन्माष्टमी, दीपावली, देवप्रबोधिनी एकादशी व श्रीरामनवमी आदि त्योहारों पर शास्त्रसम्मत कर्मकाण्ड संपन्न होता है। नवरात्रों में व्रत, उपवास के साथ दुर्गासप्तशती के पाठ का अभ्यास होता है।

काम्यवन शोध संस्थान में विभिन्न साहित्यिक गतिविधियों एवं विषयों का दिशा-निर्देश प्रदान किया जाता है। यहाँ ‘प्रथमा' से 'आचार्य' तक संबंधित विषयों का अध्यापन कराया जाता है। साहित्य, व्याकरण आदि विषयों के साथ हिंदी एवं अंग्रेजी सहायक विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। साथ ही वेदी-निर्माण, वेदीसज्जा, पीठ-निर्माण, कुण्ड, मण्डप आदि का भी अभ्यास कराया जाता हैपञ्चगव्य, पञ्चामृत, गण्डमूल-निवारक औषधियाँ, जल-भस्त्रिका आदि का व्यावहारिक ज्ञान भी कराया जाता है।

दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश, हिमाचलप्रदेश आदि स्थानों से यहाँ विद्यार्थी ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड का ज्ञान प्राप्त करने आते हैं। यहाँ विद्यार्थियों पर किसी भी प्रकार के शुल्क का भार नहीं है। काम्यवन शोध संस्थान आज भी गुरुकुल-व्यवस्था को संजोए हुए है, जहाँ गुरु-शिष्य परम्परा का पूर्णतः निर्वहन होता है। स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वर्तमान में भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को बनाए रखने एवं उसके विकास में काम्यवन शोध-संस्थन की अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

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