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गिलोय : एक औषधीय अमृत एवं इसकी वैज्ञानिक खेती
May 16, 2019 • हेमलता भारती

यह एक बहुवर्षीय लता है जिसका तना काफी मांसल व 25 मी. तक लम्बा होता है। यह पेड़ों/झाड़ियों पर सर्पिलाकार में लिपटी रहती है। इसका तना कोमल तथा 1से 12 सेमी तक मोटा होता है। इसकी पहचान यह है कि बाह्य छाल हल्के भूरे रंग की कागज जैसी लसदार परतों में होती है। इसके तने की शाखाओं से अनेक पतले-पतले मूल निकल कर नीचे झूलते रहते है जो भूमि के अंदर घुसकर नये पौधे को जन्म देते हैं। पत्ते हृदयाकार, जालीदार और स्निग्ध होते हैं।

गिलोय (अमृता या गुडुची) चिकित्सा के आर्युवेदिक प्रणाली में एक महत्वपूर्ण दवा के रूप में प्रयोग होता रहा है। शास्त्रीय ग्रंथों के उल्लेख से वर्तमान समय में इसका प्रयोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों में हो रहा है जैसे पीलिया, बुखार, मधुमेह, और त्वचा रोग आदि। इसके तने से स्टार्च (Starch) निकलता है जिसे 'गुडूची-तत्व कहते हैं जो अत्यधिक पोषक और पाचक होता है।

रसायनिक संघटक

गिलोय के तने में लगभग 12 प्रतिशत स्टार्च के अतिरिक्त अनेक रसायनिक समूह जैसे टरपीनॉइडस, अल्कलॉइडस, क्लोवोनाइडस, लिनिन, स्टीरॉइडस तथा अन्य रासायनिक यौगिक पाये जाते हैं। कड़वे तत्व में वैवरान, ग्लेस्टीराल, गिलोइन, गिलाइनिन, टाइनोस्पोरिक अम्ल, आइनोस्परोल, परवैरलिन पाये जाते हैं। इसमें एक सगंधीय तेल एवं वसा, ग्लिसटराल तथा कई प्रकार के वसीय अम्ल होते हैं।

महत्व

गिलोय (टिनोस्पोरा कोर्डीफोलिया) मैनीस्पर्मेसी कुल का एक बहुपयोगी झाड़ीदार लता है। गिलोय अनेकों गुणों के कारण अकेले या अन्य वनोषधियों के साथ विभिन्न रोगों में प्रयुक्त किया जाता है। इसे गठिया, पेट की जलन, बवासीर त्वचा रोग, श्वसन संबंधी समस्याओं, तंत्रिका तंत्र संबंधी समस्याओं तथा खून की कमी को पूरा करने के लिए किया जाता है जोड़ों के दर्द में इसका लेप किया जाता है। जड़ तथा तने से प्राप्त स्टार्च को दस्तों तथा पोषक तत्व के रूप में भी प्रयोग किया जाता है। गिलोय सर्दी तथा पेट की गड़बड़ी से आए बुखार में लाभदायक रहता है।

इसके संदर्भ में प्रचलित प्राचीन पुस्तकों में यह उल्लेख मिलता है कि जब समुद्र मंथन हुआ उस समय राक्षसों और देवताओं में अमृत कलश प्राप्त करने के लिए होड़ मच गई थी। बड़ी चालाकी से जब राक्षसों ने अमृत कलश प्राप्त कर भागे तब जहाँ-जहाँ अमृत की बूंदे गिरी वहाँ-वहाँ गिलोय के पौधे निकल आएँ। यह एक अमृत है इसकी विशेषता है कि यदि इसके तने के छोटे भाग (कटिंग) को भी लगाए तो वे पनप उठती है, ये सूखती नहीं है। यह विषैली नहीं, जीवनदायीनी औषधि है। संपूर्ण भारत वर्ष में 1000 फीट की ऊँचाई से लेकर कन्याकुमारी तक जंगली अवस्था में सड़कों के किनारे तथा बगीचों आदि में पेड़ों से लिपटी हुई देखी जा सकती है।

यह एक बहुवर्षीय लता है जिसका तनाकाफी मांसल व 25 मी. तक लम्बा होता है। यह पेड़ों/झाड़ियों पर सर्पिलाकार में लिपटी रहती है। इसका तना कोमल तथा 1 से 12 सेमी तक मोटा होता है। इसकी पहचान यह है कि बाह्य छाल हल्के भूरे रंग की कागज जैसी लसदार परतों में होती है। इसके तने की शाखाओं से अनेक पतले-पतले मूल निकल कर नीचे झुलते रहते है जो भूमि के अंदर घुसकर नये पौधे को जन्म देते हैं। पत्ते हृदयाकार, जालीदार और स्निग्ध होते हैं। गिलोय में दो प्रकार (नर एवं मादा) के फूल लगते हैं, जो ग्रीष्म में खिलते हैं। नर फूल छोटे पीले या हरे रंग के समूहों में होते हैं तथा मादा फूल अकेले होते हैंइसमें फल सर्दियों में आते हैं जो मटर के आकार के मांसल लाल रंग के चमकदार होते हैं। बीज सफेद चिकने कुछ टेढ़े-मेढ़े दानों के समान होते हैं।

उसके लिए जलवायु और नमी वाला मौसम उचित है तथा खेती रेतिली, पथरीली, बंजर से लेकर दोमट चिकनी मिट्टी में की जा सकती है। गिलोय का प्रवर्धन बीज तथा वानस्पतिक कलमों दोनों से किया जाता है। चूंकि बीजों की अंकुरण क्षमता अच्छी नहीं होने के कारण कटिंग को मई-जून में नर्सरी तैयार करके हल्की छायादार स्थान पर लगाई जाती है। कलम की समय यह विशेष ध्यान दें कि कलम का 8 से 10 इंच हिस्सा भूमि से ऊपर रहे तथा प्रत्येक कलम की जड़ का हिस्सा जमीन में दो तिहाई अंदर होना चाहिए। कलम के फूटने तक नियमित हल्का पानी देते रहें। गिलोय की फसल में 10 टन/हे. गोबर की सड़ी हुई खाद भूमि की तैयारी के समय डाले तथा 20-25 किलोग्राम नत्रजन, 30 किग्रा फास्फोरस तथा 30 किग्रा पोटाश का प्रयोग करें। तीन महीने की फसल होने पर 15 किग्रा/ हे. की दर से नत्रजन का छिड़काव करें। गिलोय में कलम लगाने के उपरांत हल्की सिंचाई करें एवं उसके बाद शुष्क क्षेत्रों में 12-15 दिन तथा नम जलवायु वाले क्षेत्रों में 20-25 दिन के अंतर पर सिंचाई करें। फसल अधिक दिनों तक रखने पर पानी की आवश्यकता बढ़ जाती है। जिससे पौधों में पतझड़ शुरू हो जाता है लेकिन फिर भी पौधा जिन्दा रहता है।

गिलोय की फसल में 2-3 बार निराई- गुड़ाई अवश्य करें। प्रारंभिक अवस्था में निराई सावधानी से करें, क्योंकि उस वक्त तक कटिंग स्थापित हो रही होती है। कलम के आस-पास के खरपतवारों को खुप की सहायता से सावधानी पूर्वक निकालें। गिलोय की पत्तियों को कुछ सामान्य प्रकार के स्थानीय कीट पतंगे जैसे-ऑथ्रिस फुलोनियोंक्लो तथा आन्थ्ररिस मटेरना लिनियस इसकी फसल को काफी क्षति पहुँचाते हैं। वे इस पर प्रजनन कर अपनी संख्या बढ़ाते हैं तथा इसके फलों में छेद कर र उनका रस चूसते हैं। इसकी रोकथाम के लिए इन्डोसलफाल 35 ईसी का छिड़काव करें तथा संभवतः संतरों के बागानों के समीप इसकी खेती न करें। गिलोय में सूटी मोल्ड नामक बीमारी होती है जिसके लिए प्रोपीकेनाजोल में मांड या स्टार्च मिलाकर छिड़काव करना चाहिए। इसके उपरांत स्टार्च मोल्ड पर चिपक जाती है और बाद में सूखकर गिर जाती है। शीतकाल में गिलोय के पत्ते पीले हो कर गिरने लगते हैं। अतः जनवरी से मार्च माह के बीच में इसकी बेलों को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट कर सुखा लिया जाता है। इसकी फसल से एक वर्ष में 10 12 क्विंटल सूखे तने प्राप्त किये जा सकते हैं। इसके साथ-साथ बीज भी प्राप्त होते हैं। गिलोय के सूखे तने का वर्तमान मूल्य 15 20 रूपये प्रति किलोग्राम तक है। इसकी फसल से 20-25 हजार रु. प्रति हे. का शुद्ध लाभ प्राप्त किया जा सकता है।

नर एवं मादा पौधों पर मौसम का प्रभाव

अध्ययन से पता चला है कि नर एवं मादा पौधों के गुणवत्ता में भिन्नता हैदोनों लिंगों में फिनोलिक्स और कुल चीनी की एकाग्रता गर्मी के मौसम में सबसे ज्यादा होती है तथा स्टार्च और टेनिन सर्दियों के मौसम में अधिकतम पाई गई है। हांलाकि, बयोमार्कर टीनोस्पोरा और बरबेरिन मानसून के मौसम में अपने उच्चतम एकग्रता पर पहुँच जाता है। इसके अलावा एंटीआक्सीडेंट की मात्रा सर्दियों तथा गर्मी के मौसम में सबसे ज्यादा होती है। इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं। कि मादा पौधों में नर की तुलना में अधिक चिकित्सीय गुण होते हैं। चिकित्सीय गुण के लिए मादा पौधों की कटाई का उचित समय मई है, एंटीआक्सीडेट क्षमता और इम्यूनोमाड्यूलेटर गतिविधियों के लिए सर्दी या गर्मी के अंत में तथा मधुमेह विरोधी गतिविधि के लिए मानसून उचित समय है। पादप रसायन स्क्रीनिंग एक महत्वपूर्ण कदम है जो नए और उपन्यास यौगिकों के अलगाव की ओर ले जाता है। विलायक रसायन अर्क की स्क्रीनिंग विश्लेषण से यह पता चला है कि टेनिन, फिनोल, फ्लेवोनोइड, अल्कालौइड, टरपीन और स्टेरॉयड की उपस्थिति सबसे अधिक इनके पत्तों में होती हैइसके बाद तने एवं हवाई जड़ों में पाई जाती है।

औषधीय उपयोग

(क) पीलिया के इलाज में इसका इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह शरीर की गर्मी को कम कर देता है।

(ख) इसका तना सामान्य दुर्बलता, अपच, बुखार और मुत्र रोगों में फायदेमंद रहता है 

(ग) कैंसर के उपचार के लिए जड़ और तने के पाऊडर को दूध के साथ प्रयोग किया जाता है।

(घ) एच आई वी (HIV) जैसी संक्रमणबिमारियों में भी गिलोय के चिकित्सीय गुण प्रभावकारी रहते हैं

(ड) अस्थमा के इलाज में शहद के साथ तने का रस इस्तेमाल में लाया जाता है

(च) चूंकि गिलोय एक अच्छा एंटीआक्सीडेंट है, पार्किंसंस के दौरान इसे एल-डोपा (L-DOPA) के साथ दिया जाता हैएल-डोपा डोपामाइन के गठन के दौरान मुक्त कण पैदा करता है तथा गिलोय इसके प्रभाव को बेअसर कर देता है।

(छ) मूत्र विकार में इसकी जड़ों का रस बहुत ज्यादा प्रभावी रहता है।

(ज) गिलोय का प्रयोग पाचन तंत्र में सूजन और श्लेष्मा झिल्ली के लिए भी कार्यरत है तथा यह पेट में म्यूसिन के उत्पादन को भी बढ़ाता है।

(झ) दुनिया भर में इंसुलिन की कमी के कारण रक्त में शर्करा की बीमारी बहुत पुरानी हो चली है। मधुमेह टाइप-1 और टाइप-2 में, गिलोय का प्रयोग लाभदायक समझा जाता है। 

(ज) यह पीलिया, यकृत और पूति जैसी बीमारियों में इम्यूनोमाङ्लेटर के रूप में काम करता है।