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खेलों की संस्कारशाला अर्थात् संघ की शाखा
January 1, 2018 • Vijay Kumar

भोजन, पानी और हवा की तरह खेल भी व्यक्ति की प्राथमिक आवश्यकता है। बालपन में तो यह उसका अधिकार ही है। बच्चे मुख्यतः शारीरिक प्रधान खेल खेलते हैं, जबकि बड़े होने पर उसमें कुछ मानसिक खेल भी जुड़ जाते हैं। विश्व की सभी सभ्यताओं में खेलों को महत्त्व दिया गया है। अनेक प्राचीन नगरों की खुदाई में बच्चों के खिलौने तथा शतरंज, चौपड़ आदि मिले हैं। बचपन में भगवान् श्रीकृष्ण ने तो जान-बूझकर यमुना में गेंद फेंक दी थी और फिर उस बहाने कालिया नामक दुर्दम्य गुंडे (नाग) का ही नाश कर दिया।

सभ्यता एवं सम्पन्नता के विकास के साथ उपकरण-आधारित खेल बने। इनमें क्रिकेट, हॉकी, फुटबॉल, वॉलीबॉल, बास्केट बॉल, बैडमिंटन, टेनिस, लॉन टेनिस आदि उल्लेखनीय हैं। इन सबका विकास पश्चिम में ही हुआ। टी.वी. के जीवन्त प्रसारण तथा महंगी प्रतियोगिताओं ने इन्हें लोकप्रिय बनाया है। क्रिकेट इसमें सबसे आगे है। फ़िल्मी कलाकारों की तरह उसके खिलाड़ियों का नाम और चेहरा भी बिकता है। इसीलिए विराट कोहली की शादी टी.वी. पर खूब चली। सचिन तेंदुलकर को इसी वजह से 'भारत रत्न' दिया गया और राज्यसभा में भी भेजा गया। कंप्यूटर और मोबाइल के विकास ने भी खेलों में क्रान्ति की है। बच्चे हों या बड़े, सब उन पर उंगलियां चलाते हुए अपना समय काटते हैं। और साथ में अपनी आँखें भी खराब करते हैं। इन खेलों का कितना उपयोग है, यह बहस का विषय है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में हुई थी। संघ के काम का आधार एक घंटे की शाखा है। इसके सदस्य स्वयंसेवक कहलाते हैं। शाखा में यद्यपि योग, आसन, सूर्यनमस्कार-जैसे शारीरिक तथा गीत, सुभाषित, अमृत वचन, चर्चा आदि बौद्धिक कार्यक्रम भी होते हैं, पर विद्यार्थी और युवा शाखा में 40-45 मिनट बिना उपकरण वाले खेल ही होते हैं। उपकरण न होने से इनमें कुछ खर्च नहीं होता। अतः गरीब हो या अमीर, सब इन्हें खेल सकते हैं। मैदान पर चूने, ईंट के टुकड़े या फिर चप्पल आदि से ही सीमा रेखा बनाकर ये खेल हो जाते हैं।

सच तो ये है ये बहुरंगी खेल ही शाखा के प्राण हैं। इनके आकर्षण में बँधकर ही बच्चे शाखा में आते हैं। भले ही संघ का विचार उन्हें बाद में समझ आता है। शाखा में तरुण, बाल, शिशु आदि अलग-अलग समूह (गण) में खेलते हैं। खेल करानेवाला ‘गणशिक्षक' कहलाता है; पर ये खेल केवल मनोरंजन या व्यायाम के लिए नहीं होते। उनकी विशेषता संस्कार देने की क्षमता भी है। इनसे स्वयंसेवक के मन पर संस्कार पड़ते हैं, जो उसकी वाणी, विचार और व्यवहार में सदा दिखाई देते हैं। स्वयंसेवक में कई गुणों का भी विकास होता है। इन खेलों का कोई निश्चित पाठ्यक्रम नहीं है। हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा' की तरह क्रिया के मामूली परिवर्तन से नया खेल बन जाता है। ये खेल सैकड़ों हैं तथा हर क्षेत्र में इनके अलग नाम हैं। खेलों के नाम में राम, हनुमान, गणेश, कृष्ण तथा कश्मीर, इजराइल, चीन आदि जोड़ने से स्वयंसेवक के मन में जिज्ञासा पैदा होती है, जिसका समाधान बड़े लोग करते हैं। कुछ खेलों के नाम तथा उनके प्राप्त गुणों की चर्चा करना यहाँ उचित रहेगा।

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