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खालीपन
May 1, 2017 • Madhav Rathod

शाम की थकी मेट्रो सी वह ऑफिस से घर आकर चाय का कप लेकर ' या तो टीवी देखती या फिर सुबह के अखबार के पन्ने फिर से पलटती। यह उसका रूटीन था। मगर कुछ महिने पहले बेटी ने फेसबुक चलाना सिखा दिया तो अब ये बोझिल शाम चाय के साथ फेसबुक पर सर्फिग करते हुए कटने लगी। उसे अच्छा लगता था लोगों के चेहरे और दिमाग पढ़ना, यहाँ हर रंग के मुखौटे पहने लोग मिलते, यहाँ अलग- अलग तरीके से लोग अपने दर्द को साझा करते हुए दिखाई देते तो कहीं सहारा देने के बहाने सहारा ढूँढ़ते लोग, हरेक ने अपने हिसाब से यह आभासी दुनिया बना रखी थी, सभी चाहते थे अपनी हर बात को बयाँ करना,चाहे बड़ा गम हो या छोटी खुशी- सभी को बेसब्री से इंतजार रहता था, पसन्द के साथ कमेंट्स का, भले ही वे झूठमूठ के हों, मगर ये सब अहम को पुष्ट और दिल को वहम देते थे। पता ही नहीं चलता था घण्टों कैसे गुजर जाते। इन्हीं चेहरों के बीच उसे वह दिखा। वह अक्सर रविवार को ही कोई कविता, कहानी और गज़ल पोस्ट करता था। वह अपने पात्र में उतरकर हौले से मन की परतें उघाड़ता था। वह अपने पात्रों को मन की उलझनों में गूंथता था और काळजे की कोर की उस दाजती हुई गंध को महसूस करवाता था। वह दर्द की नब्ज़ को उस छोर से दबाता था जहाँ शब्दों में रिसता था वर्षों से दबा अनछुआ दर्द। उसकी ग़ज़लों के मिसरों में कसक होती थी भूले हुए पुराने प्यार को याद करवाने की। उसकी कहानी देह से फिसलती हुई उतरती थी आहिस्ता- आहिस्ता मन में और छोड़ जाती थी रूह में अजीब-सी सरसराहट, जो पूरे सप्ताह उसे मीठा इंतज़ार करवाती थी। एक रात अचानक उसका इनबॉक्स में मैसेज चमका... उसने हाय हेलो से बात शुरू की।

खालीपन अच्छा लिखते हो।

 जी, शुक्रिया, ये सब आपका रहमो करम है।

नहीं, ये आपका टेलेंट है।

नहीं, ये आपका अपने बारे में कुछ बताओगी मैडम?

क्या करोगे जानकर? हमें आपका पाठक ही रहने दो।

ठीक है, जो आपकी मर्जी मेम, बाय, गुड नाईट।

इस तरह उससे बातें होने लगी। वो अक्सर शाम को ही बात करती। कभी-कभी पति घर पर नहीं होते तो रात को भी कर लेती। फिर पता नहीं, कब मेट्रो में आते-जाते मोबाइल नंबरों का आदान-प्रदान हो गया तो व्हाट्सअप पर भी उसे वह कई अजब-गज़ब के सवाल पूछता रहता, शायद वह उसके बारे में कुछ जानने की कोशिश कर रहा था, मगर वह हमेशा टाल देती। पर उसका इस तरह पूछना उसे अच्छा लगने लगा।

“आपके जीवन क्या कमी है?'' उसने एक दिन फोन पर पूछ ही लिया।

‘‘मेरे जीवन में क्या कमी होगी? सब कुछ है मेरे पास, पति सरकारी अफसर है, बेटी डॉक्टरी की पढ़ाई कर रही है, लड़का बैंक में है, दिल्ली में खुद का मकान है, सब तो है मेरे पास।

'' फिर भी उस सब में 'कुछ' तो गायब हैमैडम'' वह अभी भी अड़ा था।

“मुझे तो कुछ नहीं लगता, अगर तुम मन की बातें जानते हो तो तुम ही बताओ'

“मुझे लगता है आपके जीवन का कोई हिस्सा अधूरा ही रह गया'' उसने कहा।

अधूरापन के नाम से वह हिल गई, मगर जिज्ञासा और भी बढ़ गयी।

“वह क्या है, वह भी बता दो'' उसने संभलते हुए पूछा।

“शायद प्यार'' उसने कहा।

“अभी पति बुला रहे हैं, रात को फेसबुक पर बात करते हैं, कहकर फोन काटकर वहीं बालकनी में खड़ी हो गई। वह उदासी से भर गयी। बार-बार उसका सवाल जेहन में आ रहा खालीपन था। इस भागते हुए शहर में उसने कभी खुद के बारे में सोचा ही नहीं था। पहले पढ़ाई, नौकरी और फिर पिताजी की जिद से शादी।

आगे और---