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क्यों जरूरत पड़ी
December 1, 2016 • Sachin Singh Goud

भारत के लोकतान्त्रिक इतिहास में 8 नवम्बर, 2016 और विमुद्रीकरण - जैसा साहसिक फैसला लेनेवाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों ही ऐतिहासिक और अभूतपूर्व हो चुके हैं। देश की अर्थव्यवस्था में 86% के भागीदार 500 और 1,000 के नोट एक ही झटके में चलन से बाहर कर दिए गए। यह इतना बड़ा फैसला था जिसे कोई बेहद मजबूत नेता ही ले सकता था और प्रधानमंत्री मोदी ने साबित कर दिया कि वह देशहित में कड़े-से कड़ा कदम भी ले सकते हैं। साथ ही-साथ इस फैसले से उन्होंने यह भी सिद्ध कर दिया कि देशहित उनके लिए दल और चुनावी राजनीति से बहुत ऊपर है। विमुद्रीकरण निःसन्देह देश के लिये वरदान साबित हो सकता है जिसके अनेक लाभ हैं लेकिन पहाड़ जैसी चुनौतियाँ भी हैं जिनका यदि कुशलता से सामना नहीं किया गया तो स्थिति बिगड़ सकती है।

क्यों जरूरत पड़ी विमुद्रीकरण की?

देश की अर्थव्यवस्था में लगभग 86 प्रतिशत नोट 500 और 1000 के थे। यह कहना कतई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लगभग पूरी अर्थव्यस्था 500 और 1000 के नोट पर ही चल रही थी और पूरी अर्थव्यस्था इन्हीं नोटों पर टिकी हुई थी। ऐसे में इन नोटों को चलन से बाहर करना अर्थव्यस्था को एक भारी झटका देने जैसा था जिससे देश का हर आमोखास आदमी प्रभावित होता और ऐसा ही हुआ भी। विमुद्रीकरण का यह एक बहुत बड़ा निर्णय था जो काले धन पर एक जबरदस्त चोट भी है।

भारत की कुल आधिकारिक जीडीपी (काला और सफेद धन मिलाकर) 225 लाख करोड़ रुपये की है। एक अनुमान के मुताबिक इनमें से काला धन 75 लाख करोड़ रुपये और सफेद धन 150 लाख करोड़ रुपये है। यद्यपि देश में कुल कितना जरूरत पड़ी कालाधन है, इसका कोई आधिकारिक आँकड़ा मौजूद नहीं है, तथापि एक आकलन में कहा गया कि देश में मौजूद काले धन का 6 फीसदी हिस्सा नकदी रूप में है। यानी 75 लाख करोड़ का 6 फीसदी हिस्सा करीब 4.5 लाख करोड़ रुपये नकद है। सरकार को उम्मीद है कि विमुद्रीकरण के बाद यह काला धन अर्थव्यवस्था की मुख्य धारा में आ जायेगा।

लेकिन विमुद्रीकरण को सिर्फ काले धन को बाहर निकालने तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसके कई अन्य पहलू भी हैं जिनमें जाली नोटों के कारोबार को निष्प्राण करना भी है, जो अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारत में नकली नोट झोंकने की गतिविधियाँ पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और म्यांमार-जैसे पड़ोसी देशों तक ही सीमित न रहकर कम्बोडिया और थाईलैण्ड तक फैली हुई हैं। हमारे देश में कितनी राशि के नकली नोट प्रचलन में हैं, इसकी कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं है। सुरक्षाएजेंसियों के अनुसार नकली नोटों के रूप में अरबों-खरबों रुपए की धनराशि भारत में झोंकी जा चुकी है जो एक अनुमान के अनुसार 1.70 लाख करोड़ रुपए तक हो सकती है।

हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक इस आँकड़े को प्रामाणिक नहीं मानता, परन्तु इतना तो स्पष्ट है कि भारत में नकली नोटों की समस्या गंभीर रूप धारण कर चुकी थी और इसीलिए रिजर्व बैंक ने 2005 से पहले छपे 100, 500 और 1000 रुपए मूल्यवाले नोटों को वापस लेने का फैसला किया था क्योंकि पाकिस्तान पर इनकी हू- ब-हू नकल करने में सफल हो जाने का पूरा शक था।

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