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कैंसर का आयुर्वेदिक निदान
June 1, 2017 • Vedh Rajesh Chauhan

कैंसर एक ऐसा प्राणघातक रोग है, जिसका रोगी को समय रहते पता न चले तो उसकी मृत्यु निश्चित होजाती है और कोई भी दवा समय निकलने के बाद काम नहीं करती है। चिकित्साविज्ञानी अभी तक इसका सफल इलाज नहीं खोज पाए हैं। यह रोग काफी तेजी से फैलता है, कभी-कभी तो इस रोग का फोड़ा वर्षों तक अपने आप नहीं फूटता, लेकिन जब फूटता है तो घातक सिद्ध होता है। गायत्री शक्तिपीठ के संस्थापक पूज्य श्रीराम शर्माजी आचार्य के अनुसार कैंसर को संस्कृत में अधिमांश, कर्कटार्बुद, अर्बुदग्रन्थि, यूनानी हिकमत में रसौली तथा आधुनिक चिकित्साविज्ञान में ट्यूमर कहते हैं। कैंसर शरीर-कोशिकाओं की एक ऐसी अभिवृद्धि है जो अपनी संरचना, पोषण के प्रक्रम एवं चयापचय में सामान्य कोशिकाओं से भिन्न होती है। इसमें बागी कोशिकाएँ अनियमित रूप से गुणन क्रिया द्वारा उत्तरोत्तर अभिवृद्धि करती हैं। शरीर के किसी भी अर्थात् रस, मज्जा, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, आदि में उसकी अत्यंत वृद्धि विकृति या दूषण से उत्पन्न हो सकती है।

कैंसर के प्रमुख कारण

चिकित्साविज्ञान के अनुसार शरीर में किसी भी भाग में कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि को कैंसर या ट्यूमर कहते हैं। किन्हीं कारणों के फलस्वरूप शरीर की कोशिकाओं का विभाजन अनियन्त्रित एवं तीव्र गति से होता है, तो कैंसर उत्पन्न होता है।

कुछ फंगस, जो विशेषकर गेहूँ, मूंगफली, मक्का, चावल को प्रदूषित करते हैं, कैंसरकारक होते हैं। मशरूम या कुकुरमुत्ते की कुछ प्रजातियों में भी कैंसरकारक तत्त्व पाए जाते हैं। खेतों में रासायनिक खादों व कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से खाद्य-पदार्थ प्रदूषित होते हैं। भोजन द्वारा पेट में पहुँच कैंसर पैदा करते हैं। बीड़ी, सिगरेट, पान, तम्बाकू, सुपारी, गुटखा, आदि का सेवन तथा मद्यपान सभी प्रकार के कैंसर उत्पादन के प्रमुख स्रोत हैं। इससे गाल ग्रासनलिका, गले का कैंसर होता है। कॉफी के अधिक सेवन से अग्नाशय का कैंसर होता है। चॉकलेट, टॉफी, डिब्बाबंद भोजन, मशीनों द्वारा पिसे मसाले, शीतल पेय, जंक फूड, चाट, चाय, चायनीज़ भोजन, बासी भोजन, आदि से भी यह रोग उत्पन्न हो सकता है।

अनिद्रा, रात्रि में पर्याप्त निद्रा न लेने से भी ब्रेन ट्यूमर आदि जन्म लेते हैं।

ऐंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक सेवन भी कैंसर सहित अनेक व्याधियाँ उत्पन्न करता है।

उत्पन्न कभी-कभी हॉर्मोन थेरेपी भी महिलाओं में स्तन कैंसर-जैसी व्याधियों को जन्म देती है।

कभी-कभी हॉर्मोन थेरेपी भी महिलाओं में स्तन कैंसर-जैसी व्याधियों को जन्म देती है।

विषैली धूल, धुआँ, मॉटिन (ऑलआउट) के धुएँ, फेफड़े - जैसे अंगों में कैंसर उत्पन्न करते हैं।

हाईलाइटवाले वैद्युती तारों के नीचे रहनेवालों के हॉर्मोन्स गड़बड़ा जाते हैं।

एक सर्वेक्षण के अनुसार जो लोग भीख मांगकर रेलवे पुलों के नीचे रहते हैं, उनमें हॉर्मोन्स की बड़ी गड़बड़ी पाई गयी। इससे अंदरूनी कोशिकाएँ असामान्य हो जाती हैं और कैंसर होने की संभावना रहती है।

एक बार पूज्य गुरुदेव ने हमें बताया था कि कैंसर के यह भी कारण हैं- आघात या चोट, मांसभक्षण, स्नेहन, वमनविरेचन, मिथ्या योग, जीर्ण वमन, पुराने दस्त, बवासीर, भगंदर, मूत्रकृच्छ, गर्भपात, मिथ्या आहार, तीक्ष्ण भक्षण, आदि मांस और रक्त में आक्षित होकर उन्हें विषाक्त बना देते हैं और कैंसर की उत्पत्ति का कारण बनते हैं।

गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य कहते थे कि कच्चे फोड़े पर बार-बार चीरा लगाने, परिपक्व विद्रधि पर चीरा न लगाकर ओषधियों द्वारा सुखाने पर सतत चित्वित रहने से, मल-मूत्रादि वेगों को रोकने से, अधिक वसायुक्त आहार लेते रहने से, अति मैथुन, मिलावटी खाद्य-पदार्थों का सेवन, दिन-रात अधिक सोना, अति आलस्य, स्वप्नदोष या धातु का निरंतर गिरना भी कैंसरकारक हो सकता है। वीर्यदोष में कैंसर की सम्भावना रहती है। वीर्यवेग रोकना भी घातक सिद्ध होता है। किसी प्रकार के वेग को रोकने से वायु प्रदूषित हो जाती है और कैंसर के कारक-तत्त्वों को उत्पन्न करती है।

कैंसर के प्रकार ।

चिकित्सा-जगत् में दो प्रकार के कैंसर होते हैं:

1. सामान्य और 2. घातक।

1. सामान्य ट्यूमर से व्यक्ति को हानि नहीं होती और शल्यक्रिया द्वारा आसानी से शरीर से बाहर किया जा सकता है।

2. दूसरा घातक ट्यूमर अत्यंत शीघ्रता से बैठता है और हर अंग में फैल जाता है।

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