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कृषि-वानिकी और पर्यावरण
March 1, 2017 • Dr. Mehta Ngendra Singh

कृषि-वानिकी, वानिकी की वह व्यवस्था है जिसमें ग्रामीण जमीन तथा खेतों पर कृषीय पेड़-पौधों का वनों के साथ एक तारतम्य बनाते हुए लगाना होता है। इसके अन्तर्गत वृक्षारोपण के लिए। साथ-साथ खाद्यान, फल सब्जी और पशुचारे की पैदावार सम्मिलित है।

हमारा भारत कृषिप्रधान देश है, जिसकी लगभग सत्तर प्रतिशत आजीविका कृषि पर आधारित है। वैसे कृषि का सामान्य अर्थ खेती, कास्त और किसानी है, लेकिन आज इसे उद्योग के श्रेणी में रखे जाने का प्रयास जारी है। कृषि एक कर्म-मीनार है जिसके चार आधारभूत स्तम्भ- प्राकृतिक मिट्टी, उत्तम बीज, पर्याप्त जल और उपयुक्त तापमान हैं। उत्तम बीज को छोड़कर शेष का सम्बन्ध पर्यावरण से भी है, जिसके प्रति हमें निरन्तर सचेत रहना है।

यह ज्ञातव्य है कि वर्ष 1960 में हरित- क्रान्ति को बढ़ावा देने के उदेश्य से भारत सरकार ने एक ऐसे भूमि उपयोग की नीति अपनाई जिसके तहत हजारों एकड़ की वनीय भूमि को कृषि-क्षेत्र में बदल दिया गया, जिसके कारण वनों का फैलाव रुक-सा गया। इसका कुप्रभाव प्राकृतिक वनों पर पड़ा और साथ- साथ पर्यावरण भी बिगड़ता गया। इसके बाद प्राकृतिक वनों के ह्रास को बचाने, अतिरिक्त वनों के फैलाव को बढ़ावा देने तथा पर्यावरण

सन्तुलित रखने के लिए सामाजिक वानिकी कार्यक्रम लागू किया गया। सामाजिक वानिकी के अन्तर्गत ही ‘कृषि-वानिकी’ आता है। सामाजिक वानिकी और कृषि-वानिकी में बहुत ही कम अन्तर है। दोनों कार्य अधिकतर ग्रामीण-स्तर पर निष्पादित होते हैं। सम्पूर्ण सामाज के कल्याण को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक वनक्षेत्रों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में वृक्षारोपण को सामाजिक वानिकी की संज्ञा दी गई है। राष्ट्रीय कृषि आयोग के अनुसार 'सामाजिक वानिकी' के मुख्य अवयव कृषिवानिकी, विस्तार-वानिकी, कटे हुए वनों की पुनस्र्थापना तथा नये वनों का विकास होना है। आयोग ने कृषि-वानिकी को विशेष रूप से इस प्रकार पारिभाषित किया है- ‘वानिकी की वह व्यवस्था, जिसमें ग्रामीण जमीन तथा खेतों पर कृषीय पेड़-पौधों का वनों के साथ एक तारतम्य बनाते हुए लगाना होता है। इसके अन्तर्गत वृक्षारोपण के लिए साथ-साथ खाद्यान, फलसब्जी और पशुचारे की पैदावार सम्मिलित है।

इसके अतिरिक्त जलावन के लिए लकड़ी की भी आवश्यकता को ध्यान रखते हुए ईंधन-लकड़ी के उत्पादन को भी कृषि-वानिकी के तहत रखा गया है। सुरसा की तरह बढ़ती जनसंख्या के भोजनार्थ अन्नों की पैदावार को बढ़ा भी दिया जाता है तो उसे पकाने के लिए ईंधन चाहिए। शहरों में घरेलू-ईंधन के लिए बिजली और गैस आदि उपलब्ध हैं, लेकिन वैसे ग्रामीण क्षेत्रों, जो किसी प्रकार के वनों से बहुत दूर हैं, के लिए गोबर और खर-पतवार ही एकमात्र विकल्प है। गोबर की व्यवस्था के लिए पशु-धन में इजाफा करना होगा जो आज के युग में सम्भव नहीं है। अतः ईंधन और पशु-चारे के लिए कृषि-वानिकी पर निर्भर रहना सामयिक हो गया।

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