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कृषि और पं. दीनदयाल उपाध्याय
March 1, 2017 • Dr. Ravindra Aggrawal

भारत की समाज-व्यवस्था और अर्थव्यवस्था में कृषि का जो महत्त्व है, वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। आज स्थिति यह है कि खेती-किसानी कई प्रकार की कृषि-मशीनरी, उर्वरक व कीटनाशक आदि के लिए बड़े उद्योगों पर निर्भर है तो चीनी, कपड़ा, जूट, चाय, एल्कोहल, ओषधि और खाद्य-प्रसंस्करण आदि उद्योग कृषि पर आश्रित हैं। यही नहीं प्रायः ऐसा देखा जाता है कि जब- जब सूखे आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण कृषि-पैदावार कम होने की आशंका होती है, तब-तब देश की आर्थिक प्रगति का दैनिक सूचकांक समझा जानेवाला मुंबई शेयर बाजार धड़ाम से गिर जाता है। इसका मुख्य कारण यह माना जाना है कि कृषि-पैदावार कम होने से एक ओर तो जहाँ प्रत्यक्ष रूप से किसान को आर्थिक हानि होने से उसकी खरीद क्षमता कम हो जाती है, वहीं पैदावार कम होने के कारण महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है, और इससे सामान्य उपभोक्ता की खरीद क्षमता भी प्रभावित होती है। क्योंकि महंगाई बढ़ने की स्थिति में उसकी प्राथमिकता दैनिक जीवन की आवश्यक वस्तुओं को ही खरीदने की होगी, कुछ बचत के उपरांत ही वह दूसरे औद्योगिक उत्पाद खरीदने की सोचेगा। उक्त दोनों ही स्थितियों में औद्योगिक उत्पादन प्रभावित होने की आशंका के चलते मुंबई शेयर बाजार धड़ाम से गिर जाता है। अतः शेयर बाजार गिरने का सीधा संबंध औद्योगिक उत्पादन गिरने और इसका देश की अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव पड़ने से है। इससे स्पष्ट है कि यदि खेती-किसानी की उपेक्षा होती है तो देश का विकास भी प्रभावित होता है और खेती फलती-फूलती है तो देश भी समृद्ध होता है। ऐसे में खेती-किसानी की उपेक्षा करने का सीधा अर्थ है कि देश की पूरी अर्थव्यवस्था को ईश्वर के भरोसे छोड़ देना। आज देश के किसानों की ऋणग्रस्तता और इसके कारण उनमें बढ़ती आत्महत्याओं की प्रवृत्ति से स्पष्ट है कि आज़ादी के इन 70 वर्षों के दौरान खेती-किसानी को पूरी तरह उपेक्षित रखा गया।

सिंचाई : यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि खेती के लिए सिंचाई पहली आवश्यकता है। बीज कितना भी उन्नत किस्म का हो, लेकिन खेती में सिंचाई की व्यवस्था न हो और सिंचाई के पानी के लिए किसानों को इंद्रदेव के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो किसान के खेत में कितनी पैदावार होगी, यह स्वयं समझा जा सकता है। अतः कृषि को ईश्वर के भरोसे छोड़ने का अर्थ है कि केवल देश की पूरी अर्थव्यवस्था ही नहीं वरन् समाज-व्यवस्था को भी ईश्वर के भरोसे छोड़ देना। क्या कोई देश और समाज इस प्रकार उन्नति कर सकता है? यही कारण है कि पं. दीनदयाल उपाध्याय ने खेती की चर्चा करते समय अदेवमात्रिका कृषि की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा है, ‘भारत की कृषि मुख्यतया इन्द्रदेव की कृपा पर निर्भर करती है।... अतः प्रारम्भ से ही हमारे भारतीय शासन का यह ध्येय रहा है कि वह सिंचाई की योग्य व्यवस्था करे। कृषि को ‘अदेवमात्रिका' बनाने का शास्त्रों का आदेश है।' (भारतीय अर्थनीति : विकास की एक दिशा)।

खेती में सिंचाई के महत्त्व का उल्लेख करते हुए दीनदयाल जी बताते हैं कि सिंचाई की व्यवस्था किस प्रकार की जाए जिससे हर खेत को पानी मिल सकें, '...हमें कृषि को मनसून या इंद्रदेव की कृपा पर ही नहीं छोड़ना चाहिए। इस दृष्टि से पर्याप्त मात्रा में छोटी सिंचाईयोजनाओं, कुओं, तालाबों, बावड़ियों एवं जलबन्ध (चौक डैम्स) के विस्तार पर अधिक बल देने की आवश्यकता है।...हम सिंचाई की ऐसी व्यापक एवं पक्की व्यवस्था कर दें जिससे कि हर खेत को पानी पहुँचाया जा सके।' (वही)।

आधुनिक कृषि-टेक्नोलॉजी : खेती में सिंचाई के साथ ही खाद, उन्नत बीज, कृषि-उपकरणों और कृषि-पद्धति आदि का भी विशेष महत्त्व है। इसीलिए उन्होंने कहा, 'कृषि विकास की दृष्टि से हमें प्राविधिक एवं संस्थागत- दोनों प्रकार के कार्यक्रम साथ-साथ चलाने होंगे। प्राविधिक दृष्टि से हमें आधुनिक कृषि-टेक्नोलॉजी का समुचित मूल्यांकन करते हुए भारतीय परस्थितियों के अनुरूप कृषि-पद्धति में सुधार करना होगा। इस दृष्टि से भूमि की उर्वरता बनाए रखनेवाले खाद व बीज फसल की अदला-बदली, बुवाई व कटाई के तरीकों, कृषियंत्रों के प्रयोग, भूक्षरण को रोकने-जैसी कई बातों पर विशेष ध्यान देना होगा।' ‘संस्थागत कार्यों की दृष्टि से भूस्वामित्व, भूमि के उपविभाजन एवं अपखण्डन को रोककर आर्थिक जोत बनाए रखने, सहकारी खेती, विपणन, भण्डारण, साख-सुविधाओं, मूल्य-निर्धारण की दृष्टि से भी समुचित व्यवस्थाएँ करनी होंगी। (वही)।

कृषि-उपज का लाभकारी मूल्य : किसान के समक्ष जहाँ अधिक फसल की पैदावार लेना एक चुनौतिपूर्ण कार्य है, वहीं पैदावार को बेचना और उसका लाभकारी मूल्य प्राप्त करना भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। उन्होंने सरकार को सुझाव दिया, ‘सरकार को किसानों के साथ सीधे व्यापारिक संविदा (वायदा सौदा) करनी चाहिए। इस प्रकार उनको दी गई सारी सहायता उत्पादन से जुड़ जायेगी। इसके साथ ही उन्होंने खाद्यान्न के मूल्यों में स्थायित्व लाने और इसके वितरण को सुचारु बनाने के लिए सुझाव दिया‘सरकार को खाद्यान्न व्यापार के राष्ट्रीयकरण और एकाधिकार की कल्पना का परित्याग कर देना चाहिए। इसके स्थान पर उसे एक बड़े व्यापारी की भाँति, आंशिक रूप से बाजार में उतरना चाहिए। उसे खाद्यान्न के संग्रह और वितरण के लिए देशभर में अपने अभिकरण (एजेंसी) भी स्थापित करने चाहिये। यदि वह कुल व्यापार के केवल दस प्रतिशत की भी व्यवस्था कर सके, तो उससे प्रशासन को व्यापारिक गतिविधियों और मूल्यों को नियमित करने की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण लाभ की स्थिति प्राप्त होगी। (पॉलिटिकल डायरी, 20 जुलाई, 1964)।

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