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कल्पनाओं से यथार्थ का दर्शन कराता व्यंग्य संग्रह
January 1, 2019 • Devendra Singh Sisoudia

आठवीं कक्षा तक पढ़ाई के पश्चात मात्र 15 वर्ष की उम्र में विवाह के बंधन में बंध जाने एवं । लगातार विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए विसंगतियों से उद्वेलित होते हुए लिखा ये व्यंग्य संग्रह 'वेवजह यूँ ही नहीं कह सकते। विवाह पश्चात पढ़ाई जारी रखते हुए एक शिक्षका, व्यंग्यकार एवं लेखिका वीना जी का यह पहला संग्रह एक आम नागरिक के दर्द को उकेरता है। हितैषियों के निरुत्साहित करने के बावजूद कलम को विराम नहीं दिया और एक संग्रह की रचना कर डाली और सिद्ध कर दिया कि बेवजह कुछ भी नहीं होता।

प्रसिद्ध व्यंग्यकार श्री सुधाकर अदीब जी ने अपनी भूमिका में लिखा है कि 'सक्षम तैराक वह जो बिना हो-हल्ले के गम्भीरतापूर्वक तैरकर, सरोवर में इस पार से उस पार तक बिना डूबे निकल जाए। वह क्षमता वीना सिंह के अधिकांश व्यंग्य' लेख प्रदर्शित करते और पाठकों को आश्वस्त करते हैं। संग्रह के पहले व्यंग्य ‘हम दोनों सड़क पर हिंदी में किसान एवं राजभाषा की दुर्दशा की व्यथा को बखूबी दर्शाया है तो मेरी अपनी हिन्दी में लेखिका ने स्वयं एवं हिन्दी की विवशता को वर्णित किया है। ‘मेरी गरीबी उसकी अमीरी' में ईमानदारी और बेईमानी मध्य बहस को प्रभावीरुप से प्रस्तुत किया है‘जोड़-तोड़ ही है जिन्दगी में भ्रष्टाचार रुपी कैंसर रोग पर चिंता व्यक्त की है। इस जुबान का क्या भरोसा' नेताओं के यू टर्न लेने पर तंज कसा है।

जैसा कि अदीब जी लिखते है कि- व्यंग्य लेखों के शीर्षक भी प्रायः अर्थपूर्ण होते हैं, ‘जोड़-तोड़ ही है जिन्दगी’ ‘दमदार बूढ़े ‘बेशर्मी की हद', 'कुत्ते की सीधी दुम’ ‘आदत से मजबूर' इसके उदाहरण है। शीर्षक व्यंग्य ‘बस यूं ही में वीना जी यह बताने में सफल रही कि दुनिया का कोई काम बेवजह नहीं होता है चाहे वो ईश्वर का दर हो, गरीब का घर हो या नेता का अवतार ही क्यों न हो। ‘अभी भी अनमैरिड' व्यंग्य कहानी के रुप में है तो कुत्ते की सीधी दुम' में हास्य का भरपुर पूट है। ‘रंग विहीन चेहरे' में साली की अनुपस्थिति की टीस को दशार्या है तो कुछ तो खास है इस कैटरिंग व्यवस्था में, में साम्प्रदायिक एकता को स्थापित किया है। ‘मुंगेरीलाल जैसा सपना' में देश की व्यवस्था पर करारा व्यंग्य किया है तो 'बड़े आये अच्छे दिन' में नेताओं की प्रवृतियों पर खूब चकोटिया काटी है। ‘मास्टर जी सो गये' में लिखा है ‘मास्टरजी सोते हैं तो बच्चे मोज मस्ती करते हैं पर नेता और अधिकारी सोता है आम जनता रोती है' कथन करारा व्यंग्य कर रहा है। श्राद्ध कैंसिल' एक भावनात्मक व्यंग्य है, ‘अगले जन्म मोहे बाबा ही कीजो' में आधुनिक बाबाओं की कारस्तानियों को उजागर किया है तो ‘नमस्ते जी' में अंग्रेजी संस्कृति के बढ़ते प्रभाव पर कटाक्ष किया है।

‘साहब की साहबगीरी' में अफसरों की जीवन शैली एवं सामाजिक रौब पर करारा व्यंग्य किया है वहीं ‘बुद्धीमानों की बेवकूफियाँ' में लेखिका ने बुद्धीमानों से व्यवस्था एवं व्यवहार को लेकर कईं प्रश्न किए है तो ये मत कहियेगा में बहुत सारी बातों का बेवजह ही पूछ लेना अच्छा लगा। असामंजस्य का खेल ‘में लोगों की विरोधा भाषी मांगों को पूर्ण करने में हो रही परेशानी का वर्णन कल्पनालोक से वास्तविकता में पहुंचाते हुए बखूबी तरीके से किया है। एक बार पुनः ह्यबेवजह यूं ही में दैनिक कार्यक्रम में हो रही बेवजह बातों को उजागर किया है।

वीना जी के अधिकांश व्यंग्य कहानीनुमा होते है एवं कल्पनालोक से यथार्थ की यात्रा करवाते हुए संवेदनशील हो जाते हैंलेखिका ने अपनों व्यंग्य में कई बार पात्रों का सहारा लिया है विशेषकर शमार्जी का। कुछ विषयों की पुनरावर्ति जरुर हुई है किंतु शैली भिन्न होने से वे भी रोचक लगे है। अंत के व्यंग्य ‘असमंजस में प्रभु’, ‘मूर्ख हम या तुम?', 'बेवजह यूं ही लम्बे है किंतु आपकी वैचारिक कुशलता, विसंगतियों के प्रति चिंतन, मानवीय संवेदनशीलता एवं तीव्र कटाक्ष के भाव से ओतप्रोत है। आपकी भाषा शैली आम जन के बहुत करीब है। आपकी कुछ रचनाएं मानस पटल पर स्थाई स्थान बनाने की ताकत रखती है। 69 व्यंग्यों का ये संग्रह, कोर प्रकाशन इण्डिया प्रा.लि., नईदिल्ली ने आकर्षक कवर के साथ सुन्दर ले आउट में प्रकाशित किया है। पुस्तक का मूल्य मात्र 150 रुपये है जो हर पाठक की पहुँच तक है।