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कला एवं पुरातत्त्व जगत के कीर्तिकलश "पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर
March 20, 2020 • ललित शर्मा, इतिहासविद्

पद्मश्री की उपाधि, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन के पुरातत्त्व प्रमुख का पद, विदेश यात्राएं अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा कभी उनके जीवन में बाधक नहीं बनी। वे सचमुच में बहुत बड़े आदमी थे। उनके बड़प्पन के समक्ष कोई भी नतमस्तक हो जाता था पर वे उसे समान स्तर पर बैठाकर बात करते थे। आत्मीयता का ऐसा विस्तार उनके जीवन में था और ऐसी चर्चा से उन्हें आत्मीय सुख मिलता था। ऐसे महान विचारों को समर्पित डॉ. वाकणकर सचमुच में भारत की संत परम्परा के जीवन्त उदाहरण थे।

ह मारे देश में सन्तों, तपस्वियों और विद्धानों को ही वास्तविक महापुरूष की संज्ञा दी जाती है। इसलिए भारत में विद्वानों और आचार्यों को ही नमन किया जाता है। समाज में वे ही वन्दनीय होते हैं और आदर के पात्र भी। चरण भी उन्हीं के पखारे जाते हैं और उनके चरणों की रज मस्तक पर लगायी जाती है। इसी परम्परा में भारतीय कला और पुरातत्त्व जगत के कीर्तिकलश डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर भी रहे हैं जिन्होंने कभी भौतिक साधनों को अर्जित कर समाज में महान् होने का मुकुट धारण नहीं किया। उन्होंने अपने जीवन में ना तो किसी के आगे दस्तक दी और ना ही आकांक्षा की तथा ना ही उस ओर अपना मन बनाया। अपितु सब कुछ लुटाकर उन्होंने संस्कृति, कला और पुरातत्त्व की सेवा की।

4 मई, सन् 1919 ई. को मालवा के नीमच में जन्में विष्णु श्रीधर वाकणकर स्वयं बड़े बने परन्तु कभी उन्होंने आसमान नहीं देखा अपितु वह स्वतः ही घाव भरने उनके समीप आया। उत्सर्ग व संवेदनशीलता की महान परिकल्पना के साक्षात् स्वरूप डॉ. वाकणकर ने चित्र, मूर्ति के साथ चिंतन और विचार की समग्र संस्कृति को अंकित किया। 'सादा जीवन उच्च विचार' के साथ उनका अन्वेषण और लेखन बिना हिचक चट्टानों से टकराया। कठिन साधन को भी उनकी अनन्य निष्ठा सरल कर गयी। राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सम्मानों एवं अपार लोकप्रियता को प्राप्त करने के पश्चात् भी अहंकार और प्रमाद कभी उनके पास नहीं आया।

विद्वता, सौम्यता, सादगी, भोलापन, सहृदयता तथा मन की निर्मलता के विशिष्ट गुण उनकी लोकप्रियता के आधार स्तम्भ थे। काल ने उनके जीवन में कई बार आघात किये थे, परन्तु वे 'वंचिका' देकर हर बार अपनी चिर परिचित मुस्कान लिये कर्म क्षेत्र में सन्नद्ध दिखाई दिये। लक्ष्य संघान के प्रति उनकी एकाग्रता और महान पुरूषार्थ का इससे बड़ा क्या प्रमाण हो सकता है कि प्रशांत हिन्दू सम्मेलन में अपने जीवन की अन्तिम सांसे गिनते समय वे यह उद्घोष कर रहे थे कि - "हमारा लक्ष्य केवल निर्वाण या मोक्ष प्राप्त करना ही नहीं था किन्तु अभ्युदय तथा भौतिक समृद्धि भी प्राप्त करना था। इसी विराट दृष्टिकोण के कारण हमारे पुरखे हिमालय की बफीर्ली चोटियों को भी पार कर गये थे। उन्होंने समुद्र की उत्ताल तरंगों पर यात्रा कर नये-नये प्रवेश द्वार ढूंढ निकाले और संसार में आर्य बनाने का प्रयास किया थायह आर्य बनना मूलतः सभ्यता के सर्वोच्च शिखर पर प्रतिष्ठित होना था।

ऐसे महान विचार को समर्पित डॉवाकणकर सचमुच भारत की संत परम्परा के जीवन्त उदाहरण थे। वे पहाड़ों और जंगलों में कुदाली और फावड़ा चलाते तथा घर पर तूलिका से प्रकृति और मानवीय जीवन के रंग उकेरते थे। ज्ञान के वे अक्षय कोष थे। पद्मश्री की उपाधि, विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन का पुरातत्त्व प्रमुख का पद, विदेश यात्राएं अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा कभी उनके जीवन में बाधक नहीं बनी। वे सचमुच में बहुत बड़े आदमी थे। उनके बड़प्पन के समक्ष कोई भी नतमस्तक हो जाता था पर वे उसे समान स्तर पर बैठाकर बात करते थे। आत्मीयता का ऐसा विस्तार उनके जीवन में था और ऐसी चर्चा से उन्हें आत्मीय सुख मिलता था।

भारती कला भवन, शैलचित्र शोध भारती कला भवन, शलचित्र शोध संस्थान, उज्जैन के संचालक डॉ. वाकणकर अखिल भारतीय कालिदास चित्र व मूर्ति कला प्रदर्शनी उज्जैन के संस्थापक भी रहे। 1961 से 1963 ई. तक वे फ्रांस सरकार की स्कॉलरशिप के अन्तर्गत फ्रांस में रॉक पेन्टिंग की शोध हेतु गये थे। 1963 ई. में उन्होंने इसी कला के तहत दोराबजी टाटा ट्रस्ट की शोधवृत्ति पर यूरोप का पुरातात्त्विक भ्रमण किया। 1966 ई. में अमेरिका के आमंत्रण पर उन्होंने वहां के शैलचित्रों का वैज्ञानिक अध्ययन कर उनकी प्रमाणिकता प्रस्तुत की। 1984 ई. में उन्होंने अमेरिका में 'विश्व को भारतीय संस्कृति की देन' पर विशाल कला प्रदर्शनी एवं व्याख्यान का आयोजन किया तथा माया और अजटैक (मैक्सिको) सभ्यता से भारतीय सभ्यता का तुलनात्मक अध्ययन किया।

भारत में उन्होंने 1955 से लेकर 1980 ई. तक चम्बल, नर्मदाघाटी, असम व दक्षिण भारत में पुरातत्त्वीय सर्वेक्षण के दौरान पदयात्रा कर अनेक पुरास्थलों को खोजा। उन्होंने 1955 ई. में नवादाटोली, महेश्वर, 1959 ई. में इन्द्रगढ़, 1960 ई. में मनौटी, आवर तथा 1961 से 62 ई. तक रोम, इम्फाल तथा फ्रांस में पुरातात्त्विक सर्वेक्षण किया। 1966 ई. में उन्होंने मालवा के कायथा का प्रसिद्ध उत्खनन किया। इन्दौर, दंगवाड़ा, कसरावद तथा रूनीजा में उनके द्वारा किये उत्खनन से मालवा की प्राचीन संस्कृति में नवीन अध्याय जुड़े।

 

शैलचित्रों की खोज में उन्हें विशेष महारथ हासिल थी। भोपाल के निकट भीम बैठका की खोज कर उन्होंने भारतीय पुरातत्त्व को अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित किया था, वहीं उन्होंने शिवालिक की दुर्गम पहाड़ियों से लेकर अरब सागर तक लगभग 4000 किमी की पैदल यात्रा कर अन्तःगर्भा वैदिक विलुप्त सरस्वती नदी की खोज से भारत को परिचित कराया। इन्हीं विराट खोजों पर उन्हें भारत सरकार ने 1974-75 में “पद्मश्री' से समलंकृत किया। उन्होंने भीम बैठका की गुफाओं पर 'ए-लास्ट पैराडाईज' ग्रन्थ लिखकर विश्व की प्राचीन गुफाओं में इन गुफाओं के महत्व को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने अपने शोध जीवन में लगभग 4000 से अधिक शैलाचित्रों की खोज की। उनके द्वारा उज्जैन में स्थापित भारती कला भवन (वाकणकर न्यास) आज भी उनके द्वारा संग्रहित चित्रों, मुद्राओं, मूर्तियों तथा शिलोखों का एक उत्कृष्ट संग्रहालय है जिसमें भारतीय संस्कृति एवं कला की झलक परिलक्षित होती है। 1988 ई. में वे प्रशांत हिन्दू सम्मेलन में भाग लेने सिंगापुर (जापान) गये थे और वहीं 3 अप्रैल को भारतीय पुरातत्त्व जगत की यह महान हस्ती इतिहास के पन्नों में समा गई। 

पुरातत्त्वविदों का तीर्थ भीम बैठका

डेक्कन विश्वविद्यालय के प्रख्यात पुरातत्त्वविद् डॉ. हंसमुख धीरजलाल सांकलिया ने लिखा है कि- विश्व में कही भी प्रागैतिहासिक काल के चित्रों की चर्चा होगी तो 'भीम बैठका' अवश्य याद किया जाएगा और उसके अन्वेषक डॉ. वाकणकर के अध्यवसाय व लगनशीलता की विशेष सराहना की जाएगी। उन्होंने विश्व का ध्यान उस स्थल की ओर आकर्षित किया है जो आगे चलकर विश्व के पुरातत्त्वविदों के लिए एक महान तीर्थ स्थल सिद्ध होगा।

उल्लेखनीय है कि विश्वविख्यात पुरातत्त्वविद् "डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर" एवं "भीम बैठका" दोनों एक दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। डॉ. वाकणकर का अन्वेषण स्थल 'भीम बैठका' विश्व के मानचित्र पर आज अपना विशेष स्थान रखता है।

1979 ई. में भारत में आयोजित 'विश्व पुरातत्त्व सम्मेलन' में पधारे विश्व के ख्याति प्राप्त पुरातत्त्वेत्ताओं को जब भीम बैठका ले जाया गया तो विश्व की प्राचीनतम तथा सबसे बड़ी उस कला दीर्घा में डॉ. वाकणकर के कार्य को देखकर सभी विशेषज्ञों को उनके कार्य के समक्ष नतमस्तक होना पड़ा। अन्तरराष्ट्रीय प्रागैतिहासिक चित्रकला के क्षेत्र में नई क्रान्ति पैदा करने वाले डॉ. वाकणकर ने 'ए-लॉस्ट पैराडाइज' नामक ग्रन्थ लिखकर भीम बैठका के महत्त्व को विश्व स्तर पर चर्चित कर दिया था। डॉ. वाकणकर को इसी कार्य से अन्तरराष्ट्रीय ख्याति मिली थी और आज यह स्थल 'विश्व पुरातत्त्व धरोहर' में शामिल है।

मध्यप्रदेश में भोपाल-होशंगाबाद मार्ग के मध्य ओबेदुल्लागंज रेल्वे स्टेशन से 35 किमी दूर दक्षिण की ओर विंध्याचल के उच्च शिखर पर स्थित भीम बैठका की 600 गुफाएं हैं, जो 10 किमी के क्षेत्र में फैली हुई हैं। इसमें से 475 गुफाएं चित्रित है। अभी तक 10 गुफाओं का ही उत्खन्न हुआ है, जिसका समूचा श्रेय डॉ. वाकणकर को जाता है। उन्होंने 1957 ई. में इन गुफाओं की खोज की थी। वहां प्राप्त पुरावशेषों तथा शैलचित्रों से वैज्ञानिक गणनानुसार ज्ञात होता है कि भीम बैठका में मनुष्य समूचे प्रागैतिहासिक काल में बराबर रहता था। डॉ. वाकणकर को उत्खनन में यहां से लगभग एक लाख वर्ष पूर्व के कुछ धार वाले उपकरण प्राप्त हुए। उन्होंने इन्हें पुरापाषाण काल का माना। जबकि इन छ: सौ गुफाओं में से प्राप्त पुरा सामग्री से पता चलता है कि- इनमें वास्तविक रूप से मानव समुदाय रहता था। उसके द्वारा बनाए व उपयोग में लाए गए औजार एवं हथियार अपने मूल स्थानों पर ही दबे रह गए। देश के किसी अन्य भाग में प्रागैतिहासिक काल का इतना लम्बा तथा अविछिन्न इतिहास अपने मूल स्थान पर सुरक्षित दशा में प्राप्त नहीं हुआ है और न ही अन्य किसी स्थल पर प्राग-मानव के वास्तविक निवास के इतने अधिक प्रमाण प्राप्त हुए हैं।

शैलचित्र की प्राप्ति -

डॉ. वाकणकर को भीम बैठका की गुफाओं से 627 शैलचित्र प्राप्त हुए थे। ये प्राचीनतम शैलचित्र उत्तर पराश्म यग से उत्तर ऐतिहासिक काल तक के हैं। यहां से प्राप्त अधिकतर शैलचित्र लाल व सफेद रंग के हैं। कुछ चित्र हरे व पीले रंगों के भी हैं। ये रंग यहां के भूगर्भीय जमाव में पाए गए पदार्थों - प्रमुखतः गैरू, हिमरची व मैग्नीज से बनाए जाते थे। ये रंग पानी या किसी अन्य पदार्थ में घोले जाते थे जो आज तक 'भीम बैठका' की गुफाओं में देखे जा सकते हैं।

अधिसंख्यक शैलचित्र मध्यपाषाण कालीन हैं। इनमें हाथी, गैड़ा, भालू, चीता, जंगली सुअर, हिरन आदि के चित्र प्रमुख हैं। कुछ शैलचित्र प्रारम्भिक इतिहासकालीन हैं, जिनमें नृत्य वेशभूषा, आभूषण, सामूहिक नृत्य आदि के चित्र हैं।

ये शैलचित्र कला की एक विधा मात्र ही नहीं अपितु मानव के विकास का निश्चित सोपान प्रस्तुत करते हैं। इन शैलचित्रों के माध्यम से आखेट वाले आदिमानव ने न केवल अपने संवेगों को बल्कि रहस्यमयी प्रवृत्ति और जंगल के खूखार प्रवासियों के विरूद्ध अपने अस्तिव के लिए किए गए संघर्ष को भी अभिव्यक्त किया है। यहां हम घात-प्रतिघात की उत्तेजना, कबीलों का शिकार-प्रयाण, गतिपूर्ण हिरणों का सौन्दर्य, नृत्य, लय व मृत्यु की त्रासदी के चित्र देखते हैं।

उपकरण प्राप्ति - 

भीम बैठका में डॉ. वाकणकर द्वारा किए गए उत्खन्न की प्रमुख उपलब्धि है यहां पर गौलाश्म उपकरणों की स्तरबद्ध प्राप्ति। पुरा सामग्री से ज्ञात हुआ है कि पुराश्मीय युग के द्वितीय उपकरण काल में यहां हिमप्रलय आया था। यहां मध्यैतिहासिक काल तक की मानवीय प्रगति के दर्शन होते हैं। पुरापूर्वाश्मयुगीन उपकरण (प्रथम) अल्यूमिना व लौह युक्त लेटराइट की चिकनी मिट्टी में मिले हैं जबकि द्वितीय गोलाश्म उपकरण दानेदार लेटराइट में मिले हैं।

भीम बैठका में पुरापूर्वाश्म युगान्तर्गत उपकरणों के दो काल हैं। प्रथम काल में उपकरण मोटे, बड़ी शक्लों वाले और अश्मकुठारों से अधिक्य वाले हैं। जबकि द्वितीय काल में उपकरण सामान्यतः पतले हैं व इनमें अश्मकुठारों का प्रमाण अधिक है। इसके पश्चात् मध्य पूर्वारम्भ काल आता है जिसमें तक्षण उपकरणों का (स्क्रपर्स) प्रमाण अधिक है। इन उपकरणों के चयन अन्तर के कुल भाग को मध्याश्म युग कहते हैं यहां ताम्राश्मयुगीन अस्थिपंजर भी एक शवाधान में मिला है। इसी के निकट मध्य ऐतिहासिक युगीन दो अस्थि पंजर भी मिले हैं और साथ ही भारत की सबसे प्राचीन मानव अस्थियां भी मिली हैं।

इस प्रकार ये शैलचित्र और उत्खनन सामग्री इस तथ्य की साक्षी हैं कि भारत के आदिमानव का यह गुफा क्षेत्र (भीम बैठका) सभ्यता के अभ्युदय के कहीं बहुत पहले सृजनात्मक चेतना व कार्यों से अनुप्राणित था।

सरस्वती नदी के उद्गम की खोज

मध्यकालीन भारतीय इतिहास के प्रख्यात विद्वान डॉ. रघुवीर सिंह (सीतामऊ) के अनुसार - डॉ. वाकणकर की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी रही कि उन्होंने सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्राएं कर ऋग्वेद से वर्णित पुण्य सलिला नदी सरस्वती के उद्गम स्थल से लेकर उसके सिरसा जिले में दृशब्दती (हाकड़ा) नदी में विलीन तथा अन्तः सलिला होकर अन्तः सिंधु में मिलने तक के अधिकांश मार्गों में देखकर उसे सप्रमाण मानचित्र पर अंकित किया।

डॉ. वाकणकर ने वैदिक कालीन विलुप्त सरस्वती के मार्गों व उसके तटवर्ती नगरों, मन्दिरों और घाटों के अवशेष ढूंढ निकालने के लिए 1985 ई. में हिमालय की शिवालिक पर्वतमाला में स्थित आदिबदरी से पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में कच्छ (अरब सागर) तक की 4000 किलोमीटर की पैदल यात्रा की तथा अन्तःगर्भा सरस्वती नदी की धारा की खोज करने में अद्वितीय सफलता प्राप्त की।

डॉ. वाकणकर के अनुसार सरस्वती नदी के खोज अभियान में उन्होंने सैकड़ों महत्वपूर्ण भग्नावशेषों के अलावा मुद्राओं और जीवाश्मों का संग्रह भी किया जिनसे ज्ञात होता है कि सरस्वती नदी के मुख्यतः उत्तरी क्षेत्रीय तटों पर (पंजाब, दिल्ली हरियाणा) विकसित संस्कृति पूर्व विख्यात हड़प्पा संस्कृति से भिन्न नहीं है। इस शोध यात्रा में डॉ. वाकणकर की प्रबल मान्यता थी कि प्राग मानव उत्तरादि क्षेत्र से मध्यभारत तक आया था और वह मुख्यतः सिन्धु सरस्वती के मध्य क्षेत्र का ही वासी रहा है। डॉ. वाकणकर के अनुसार-इस नदी के अवशिष्ठ अंश को 'सर' शब्द से भी प्रयुक्त किया गया, जिसका अर्थ सरोवर वाली नदी (सरस्वती) से ही है। इस नदी के तट क्षेत्र से प्राप्त अवशेषों के आधार पर उनकी मान्यता रही है कि हड़प्पीय स्थानों की संस्थिति सरस्वती के उक्त तटीय स्थानों में 900 से अधिक ऐसे स्थान मिले जो हड़प्पीय सभ्यता के समकक्ष है। तत्कालीन सरस्वती नदी का पाट इसके प्रवाह स्थलों में 8 किमी तक चौड़ा था। इस नदी का प्राचीनतम प्रवाह आज से 25000 वर्ष पूर्व तक और इसके पूर्व 5,00,000 वर्ष पूर्व तक (जिसमें मध्य अरावली का भाग ऊपर उठा और सरस्वती का प्रवाह उत्तर की ओर सरका) डीडवाना होते हुए लूणी नदी के रास्ते बलोल पहुंचता था और लूणी के ही मार्ग से उत्तर पूर्व कच्छ के रण में मिलकर नानूरण तथा नल सरोवर होते हुए खंभात की खाड़ी में मिलता था। यह लूणी नदी आज भी खंभात की खाड़ी में मिलती है। लेकिन यह सरस्वती के पूर्व -प्रवाह में बहती है तथा हिमालय में भी उस युग में भौगोलिक उत्थान हो रहा था। अतः बद्रीनाथ के निकट ‘माणा' गांव से निकट निकलने वाला यह प्रवाहमार्ग बीच-बीच में अवरूद्ध होता गया जिससे वेदोक्त 'नदीतया' सरस्वती में जल का प्रवाह घटता गया। महाभारत पूर्व यह प्रवाह पंजाब, दिल्ली, हरियाणा क्षेत्रों की अपेक्षा बीकानेर क्षेत्र तक ज्यादा अवरूद्ध हो गया था। यहां का विशाल रेतीला संचय पूर्व प्रवाहित सरस्वती द्वारा ही लाया गया था। इसके प्रवाह को सिन्ध प्रान्त में 'नारा' रूप में माना जाता है।

महाभारत युद्ध जो कुरूक्षेत्र (हरियाणा) में हुआ था, का स्थल इसी सरस्वती नदी का विशाल क्षेत्र है, क्योंकि युद्ध के समय इस नदी का प्रवाह कालीबंगा और अनूपगढ़ तक था। इसी कारण सरस्वती के इन तटवर्ती प्रदेशों (दिल्लीहरियाणा, पंजाब आदि के पुरातात्त्विक स्थलों) में महाभारत युद्ध के पूर्व तक की सघन बस्तियों व उसमें वर्णित समुन्न्त नगर व्यवस्था के दर्शन होते है।