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कब-कब हुआ भारत में विमुद्रीकरण
December 1, 2016 • Pramod Kaushik

जनवरी, 1946 में 1,000 और 10,000 रुपए के नोटों को वापस ले लिया गया था और 1000, 5000 और 10000 रुपए के नये नोट 1954 में पुनः शुरू किए गए थे। देश में इमरजेंसी हटने के कुछ महीनों बाद मोरारजी देसाई सरकार ने शासन संभालते ही 16 जनवरी, 1978 को 1000, 5000 और 10,000 रुपए के नोटों को वापस ले लिया था ताकि जालसाजी और काले धन पर अंकुश लगाया जा सके। नोटों पर पाबन्दी का लोगों पर बड़ा असर हुआ था क्योंकि उस समय इन नोटों का बड़ा मोल था। 1,000 रुपये में उस समय मुंबई शहर में 5 स्कैयर फीट की जमीन खरीदी जा सकती थी जबकि 2016 में 1000 रुपए में एक स्कैयर फीट का 100वां हिस्सा भी खरीद पाना मुश्किल है। उस समय, जिनके पास बेनामी संपत्ति के तौर पर घर में नोट पड़े थे, वे इसे बैंक में जमा नहीं करना चाहते थे। यदि वे ऐसा करते तो इसमें फँसने काडर था इसलिए उन्होंने कम कीमत पर नोटों को बेचना शुरू कर दिया। बम्बई के क्रॉफोर्ड मार्केट और जावेरी बाजार में लोग 1,000 रुपये के नोट 300 रुपए में बेच रहे थे। बैंक में पुराने नोटों को बदलने से पहले लोगों से फॉर्म भरवाया जाता था। यदि कोई व्यक्ति ज्यादा मात्रा में नोट लेकर आता था तो उसके बारे में बैंक-अधिकारी आयकर-अधिकारियों को सूचना दे देते थे। फिर आईटी अधिकारी से पूछताछ में कोई आमदनी का स्रोत नहीं बता पाता था तो उस पर उस समय के हिसाब से पेनल्टी लगाकर कर वसूला जाता था जो 90 प्रतिशत तक होता था। 1978 में पुराने नोटों को बदलने का काम बिना किसी विशेष परेशानी के हो गया था क्योंकि 1,000 रुपए के बड़े नोट आम आदमी के पास नहीं थे। आज 500 और 1,000 के नोट आम आदमी के पास हैं।

विकट चुनौतियाँ भी हैं सामने

सरकार ने साफ कर दिया है कि सरकार का लक्ष्य कैशलेस इकोनॉमी की तरफ बढ़ना है जिसकी शुरूआत लेस-केश इकोनॉमी से की जा रही है। इस लक्ष्य को पाने के लिए इंटरनेट, मोबाईल फोन और इलेक्ट्रसिटी की महती भूमिका रहेगी। लेकिन डिजिटल इण्डिया मिशन को हासिल करने की राह में ही अभी कई चुनौतियाँ कायम हैं। एसोचैम डेलायट की रिपोर्ट में कहा गया है कि महानगरों में स्पेक्ट्रम की उपलब्धता विकसित देशों के शहरों की तुलना में मात्र 10% है। यह द्रुत गति की डेटा-सेवाएँ उपलब्ध कराने के रास्ते की एक प्रमुख बाधा है, इसी वजह से सार्वजनिक वाई- फाई की पहुँच बेहद निचले स्तर पर है।

रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक स्तर पर 150 नागरिकों पर एक वाई-फाई हॉटस्पॉट है। भारत में इस पहुँच के स्तर पर पहुँचने के लिए 80 लाख से अधिक हॉटस्पॉट की जरूरत होगी। अभी सिर्फ 31,000 हॉटस्पॉट उपलब्ध हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल 55,000 गाँव मोबाइल कनेक्टिविटी से वंचित हैं। इसकी वजह यह है कि इस तरह के स्थानों पर मोबाइल कनेक्टिविटी उपलब्ध कराना व्यावसायिक दृष्टि से व्यावहारिक नहीं है। देश में 4जी और 3जी की पहुँच बढ़ने के साथ इंटरनेट प्रयोगकर्ताओं का आँकड़ा 2020 तक 70 करोड़ पर पहुँचने की उम्मीद है जो फिलहाल 40 करोड़ है। लेकिन अभी जिन्हें इन्टरनेट नहीं आता, वे कैसे डिजिटल पेमेंट करेंगे- यह एक बड़ा प्रश्न है।

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