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ऐसे साधक वर्तमान समय की आवश्यकता
January 1, 2019 • Parmod Kumar Kaushik

राष्ट्रवादी इतिहासकार, निर्भीक पत्रकार और चिन्तक, 93वर्षीय, आदरणीय डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी मकर संक्रान्ति के शुभ दिन, सूर्य के उत्तरायण होते ही, संध्या 05:24 बजे, आपने अपने नश्वर शरीर का त्यागकर गोलोक को पधार गए। डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी लम्बे समय से अस्वस्थ चल रहे थे और एम्स में भर्ती थे।

इतिहासवेत्ता, लेखक, चिंतक व संघ विचारक देवेंद्र स्वरूप जी को डॉ. अम्बेडकर इंटरनेशनल सेंटर में भावभीनी श्रद्धांजालि अर्पित की गई। आयोजित स्मृति सभा में उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह, गुजरात के राज्यपाल ओपी कोहली, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत जी समेत अन्य विशिष्ट अतिथियों ने श्रद्धासुमन अर्पित किए।

इस अवसर पर सरसंघचालक जी ने देवेंद्र स्वरूप जी को ऋषि बताया और कहा कि देवेंद्र स्वरूप जी ने एक ऋषि के समान लोकहित में ज्ञान की साधना की। ज्ञान के द्वारा सत्य को पाना ही उनकी इच्छा थी। उनके निधन से मर्माहत मोहन भागवत जी ने कहा कि देवेंद्र जी जैसे व्यक्ति और साधक आज के समय की आवश्कता हैं। जिस प्रकार उन्होंने बौद्धिक लड़ाई में अपना प्रचंड योगदान दिया, उनका व्यापक और गहरा अध्ययन मार्गदर्शन करता रहावह बिना किसी भूमिका के खरी-खरी बात रखते थे। जिस कार्य को वे लेकर चले, वह चलता रहे, यही उनको सच्ची श्रद्धांजलि होगी। ‘पांचजन्य' पत्रिका के पूर्व संपादक देवेंद्र स्वरूप एवं ‘दी कोर' मासिक पत्रिका के परामर्शदाता का 93 वर्ष की अवस्था में 14 जनवरी को निधन हो गया था। उन्होंने ज्ञान, जीवन के साथ देहदान तक का संकल्प किया।

उनके साथ के संस्मरणों का जिक्र करते हुए गुजरात के महामहिम राज्यपाल श्री ओपी कोहली जी ने कहा कि वह अपनी बात तथ्यों के साथ रखते थे। उनका खुद का एक पुस्तकालय था।

उनकी स्मरण शक्ति अन्तिम समय तक तेज थी। उनके लिखे से संघ के व्यक्तित्व, कृतित्व और चरित्र को भी सही रूप से समझा जा सकता है। इस मौके पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व गोवा की राज्यपाल मृदुला सिन्हा का शोक संदेश भी पढ़ा गया। विश्व हिन्दू परिषद के केंद्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय जी ने राम मन्दिर आंदोलन में उनके योगदान का जिक्र किया।

इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आइजीएनसीए) के अध्यक्ष राम बहादुर राय ने बताया कि आइजीएनसीए में उनकी जन्मतिथि 30 मार्च को हर वर्ष स्मारक व्याख्यानमाला की जाएगी। साथ ही भारत की ज्ञान परम्परा पर शोध फेलोशिप शुरू की जाएगी। मोबाइल, कंप्यूटर-इंटरनेट का उपयोग और जीवन में कभी भी कोई पुरस्कार- सम्मान ग्रहण नहीं करूंगा। जीवन के अन्तिम समय तक इस नियम का पालन किया। डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी दुनिया के किसी भी विषय में अद्यतन जानकारी रखते थे। वह समसामयिक घटनाक्रम के प्रति इतना अधिक अद्यतन रहते थे जितना इंटरनेट पर सोलह-सोलह घंटे बिताने वाले लोग भी नहीं रहते होंगे। ‘इंटरनेट' का नाम लेने पर वह झुंझलाकर कहते थे कि मेरे सामने इंटरनेट का नाम न लो, बल्कि मुझे बताओ कि मैं कहाँ कम जानकारी रखता हूँ। उनकी स्मरण-शक्ति विलक्षण थी। किन्तु एक बार उन्होंने ने यह भी कहा था की टेक्नॉलाजी के साथ न जुड़ना उनकी बड़ी भूल भी थी। डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी पुस्तकों के बड़े प्रेमी थे और इनके पास लगभग 25,000 दुर्लभ ग्रंथों का अमूल्य संग्रह था। वर्ष 2017 में उन्होंने अपनी पुस्तकों का संग्रह इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र को भेंट कर दिया था।

श्री देवेन्द्र स्वरूप जी ने सन् 1947 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से बी.एस.सी. उत्तीर्ण किया था1947 से 1961 तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक व पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे। 1966-67 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्, दिल्ली के अध्यक्ष रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भाग लेने पर विद्यालय से छह मास के लिए निष्कासित भी हुए थे। 1961 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से प्राचीन भारतीय इतिहास विषय में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। 197577 के आपातकाल में कारावास-दंड भी भोगा। बाद में वह दिल्ली के पी.जी. डी.ए.वी. कॉलेज में इतिहास-विभाग में व्याख्याता-पर पर सेवा में आए जहाँ से 1991 में उपाचार्य (रीडर) पद से सेवानिवृत्त हुए।

डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी अयोध्या विवाद के ऐतिहासिक पक्ष पर विश्व हिंदू परिषद और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संवाद में सहभागी रहे। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् के ‘ब्रिटिश जनगणना नीति (1871-1941) का दस्तावेजीकरण प्रकल्प के मानद निदेशक रहे। आप ‘दीनदयाल शोध संस्थान के निदेशक व उपाध्यक्ष भी रहे। डॉ. देवेन्द्र स्वरूप जी दो बार ‘पाञ्चजन्य' साप्ताहिक के सम्पादक के पद पर रहे। बाद में ‘पाञ्चजन्य' के स्तम्भलेखक के रूप में भी चर्चित रहे। संघ की अनेक पत्रिकाओं- चेतना', 'स्वतंत्र भारत' और 'मंथन' में भी कार्य किया। संघ में वह गाँधीवादी विचारधारा के पोषक थे। विवेकानन्द शिला स्मारक के उद्घाटन के अवसर पर प्रकाशित ‘इण्डियाज कॉन्ट्रीब्यूशन टू वल्र्ड थॉट' ग्रन्थ के सम्पादन में सहयोगी रहे। उनकी ‘संघ : बीज से वृक्ष', 'संघ : राजनीति और मीडिया', 'जातिविहीन समाज का सपना', ‘अयोध्या का सच' और 'चिरन्तर सोमनाथ' जैसी अनेक प्रसिद्ध पुस्तके हैं।

‘दी कोर' परिवार ईश्वर से प्रार्थना करता है कि इस पवित्र आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें।